यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे अतीत के कर्म आपका पीछा नहीं छोड़ते। हर कुछ वर्षों के अंतराल में कथित तौर पर समस्या को सुलझा लिया जाता है, लेकिन राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनकर फिर यह सामने आ जाती है और फिर इसे ढकने के लिए होने वाली बहस अतीत की पुनरावृत्ति की तरह लगती हैं, मानो यह फिल्म का सीक्वल हो।
19 जनवरी, 2012 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने बिजली क्षेत्र के दिग्गजों से मुलाकात की थी। दो लाख करोड़ रुपये का सार्वजनिक धन, जिसे रिजर्व बैंक ने फंसे धन के रूप में सूचीबद्ध किया था, जोकि विभिन्न कारणों से अटकी परियोजनाओं में फंसे हुए थे। ये परियोजनाएं ईंधन की कमी, विभिन्न तरह की मंजूरियों और कर्ज से लदे राज्य बिजली बोर्डों से भुगतान के अभाव में अटकी हुई थीं। एक कमेटी गठित की गई, जिसे इनसे जुड़े मुद्दों को 30 दिन, 60 दिन और 90 दिन में सुलझाने के लिए योजनाएं बनाने की जिम्मेदारी दी गई। इनमें से अधिकांश मुद्दे कई दौर की बैठकों और 850 दिनों के बीतने के बाद जब मई, 2014 में यूपीए सरकार सत्ताच्युत हुई, अनसुलझे ही थे।
12 फरवरी, 2018 को रिजर्व बैंक ने अधिसूचना जारी कर बैंकों से कहा कि कर्ज चुकाने में एक दिन की भी देरी करने वालों को डिफाॅल्टर के रूप में वर्गीकृत करें। सात मार्च, 2018 को ऊर्जा से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने खुलासा किया कि हजारों मेगावाट के संयंत्र वित्तीय संकट में फंसे हुए हैं और ये फंसे कर्ज (एनपीए) बनने की कगार पर हैं। मार्च, 2018 बैंकों पर 40,130 मेगावाट क्षमता की 34 परियोजनाओं के 4.82 लाख करोड़ रुपये का बोझ था और इसमें से 1.74 लाख करोड़ रुपये का बकाया कर्ज फंसे कर्ज (एनपीए) में बदल चुका था। इसी महीने की शुरुआत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बिजली कंपनियों की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए वित्त मंत्रालय को निर्देश दिए थे कि वह सभी हितधारकों से मिलकर मुद्दे को सुलझाए।
जून, 2018 में अटकी बिजली परियोजनाओं की कथा एक बार फिर सरकार के लिए परेशानी बन गई है। बिजली संयंत्रों के पास पीपीए यानी पॉवर पर्चेस एग्रीमेंट (बिजली खरीद समझौता) तो है, लेकिन ईंधन नहीं है। राज्य पीपीए से इन्कार कर रहे हैं। और यह सब व्यापक 'उदय' ढांचे के तहत 2015 से बिजली मंत्रालय द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों के बाद है। दिवालिया राज्य बिजली बोर्डों के कर्ज को राज्य के बजट में स्थानांतरित कर दिया गया है और बिजली बोर्डों को सुधार तथा पारेषण और वितरण ह्रास, जोकि अनिवार्यतया चोरी है, उसे कम करने के लिए कहा गया है। बेशक, कर्ज की लागत और नुकसान में कमी आई है।
लेकिन स्पष्ट तौर पर इतना ही पर्याप्त नहीं है। राज्य जब खुद को बदलने को तैयार न हों, तो फिर केंद्र सिर्फ इतना ही कर सकता है। कटिया (बिजली चोरी पर बनी डाक्यूमेंट्री को याद कीजिए) आज भी राज्य बिजली बोर्डों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्थिति सुधरी है, लेकिन ह्रास अब भी 27.6 फीसदी है, बिहार में 33 फीसदी, झारखंड में 31 फीसदी और जम्मू-कश्मीर में चिंताजनक ढंग से 53 फीसदी है। जबकि हिमाचल और केरल जैसे राज्य भी हैं, जहां ह्रास इकाई अंक में है। इससे भी बदतर यह है कि राज्य पीपीए से हटकर राहत पैकेज के लिए कतार में खड़े हैं।
बिजली क्षेत्र भी अंततः किसी अन्य कारोबार की तरह है, जिसमें आपूर्ति शृंखला, उत्पादक, वितरक और खरीदार होते हैं। भारत में अभी 3.43 लाख मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है, जिसमें से 1.55 लाख मेगावाट यानी करीब पैंतालीस फीसदी से संबंधित संयंत्र निजी क्षेत्र में हैं। प्लांट लोड फैक्टर यानी संयंत्र की अधिकतम उत्पादन क्षमता और वास्तविक उत्पादन में अंतर, के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। निजी परियोजनाओं में प्लांट लोड फैक्टर 57.8 फीसदी है।
क्या किसी ऐसे कारोबार को व्यावहारिक कहा जा सकता है, जहां उसकी 40 फीसदी क्षमता बेकार या सुस्त पड़ी हो। क्या किसी ऐसी परियोजना को व्यावहारिक कहा जा सकता है, जोकि लागत का अग्रिम भुगतान करे और जिसे अपने बकाये के लिए राज्य बिजली बोर्डों की अनिश्चितिता का सामना करना पड़े? सरकार ने संसद को बताया है कि कुल पैदा की गई बिजली में से 2,40,86,431 लाख यूनिट या 21.81 फीसदी बिजली का ह्रास हो गया। एक प्रतिशत के ह्रास से 4,146.60 करोड़ रुपये का नुकसान होता है, इसे 21 से गुणा करें, तो सार्वजनिक धन की बर्बादी की पूरी तस्वीर उभर आएगी।
सबसे बड़ी चुनौती है बिजली क्षेत्र में व्यावहारिक मॉडल का विकास। इस स्तंभकार ने फरवरी, 2015 में नेशलन डिस्कॉम की पैरवी की थी और कहा था कि क्या कोई ऐसा बाजार हो सकता है, जहां कोई दुकानदार ऐसे किसी ग्राहक के बिना कारोबार कर सकता है, जो भुगतान ही न करे। क्या दिवालिया राज्य बिजली बोर्ड किसी टिकाऊ आर्थिक मॉडल के बिना चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराने का वायदा कर सकते हैं?
आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि किसी भी चीज को बार-बार दोहराकर हर बार अलग नतीजे की उम्मीद करना पागलपन है। दो दशक से भारत एक समस्या को उसी समाधान के जरिये हल करने की कोशिश कर रहा है। बिजली क्षेत्र को अपनी सबसे उपेक्षित और सड़-गल गई वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने की जरूरत है।
वास्तव में भारत को एक नेशनल डिस्कॉम की जरूरत है, जोकि पीजीसी, पीएफसी, एनटीपीसी और आरईसी जैसे उपक्रमों का कोई सरकारी स्वामित्व वाला केंद्रीय समूह हो सकता है। यह संस्था अटकी परियोजनाओं के साथ समझौते कर राज्य बिजली बोर्डों के नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकती है। इससे एनपीए का बोझ कम होगा और राज्य में बिजली की कटौती कम हो सकेगी।
आर्थिक रूप से कमजोर और किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिये सब्सिडी दी जा सकती है। एक निश्चित समय में नेशनल डिस्कॉम स्मार्ट ग्रिड की स्थापना कर और किसानों को डीजल के बजाय हाइब्रिड पंप अपनाने में मदद कर परिवर्तन ला सकता है। ध्यान रहे, कोई भी अर्थव्यवस्था ऊर्जा सुरक्षा के बिना आगे नहीं बढ़ सकती।