छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की सिलसिलेवार हमले की घटनाओं के चलते स्वभाविक रूप से यह लग सकता है कि वे फिर मजबूती से खड़े हो रहे हैं, और उन तक पहुंचने में हमारा सुरक्षा और खुफिया तंत्र कमजोर हो रहा है। इस आशंका को बल इसलिए मिल रहा है कि वे पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में हिंसा और तोड़फोड़ को अंजाम देने में कामयाब हो गए। इन घटनाओं के आलोक में किसी के भी लिए यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि हम नक्सलवाद पर अंकुश लगाने के करीब हैं। लेकिन व्यापक रूप से देखें, तो इन हमलों के आधार पर नक्सलवाद के पूरी ताकत से उभरने का भी आखिर कितना दावा किया जा सकता है? सच यही है कि नक्सल समस्या अब छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों तक ही सिमट गई है। सेना, सुरक्षा तंत्र और पुलिस के अभियानों के बाद वस्तुतः नक्सलवाद कमजोर ही हुआ है। बेशक नक्सली हमलों की ये घटनाएं हमें डराती हों, मगर माओवादियों का संगठन कमजोर ही हुआ है, जिसे खुद माओवादियों ने अपने दस्तावेज में स्वीकार भी किया है।
वर्ष 2010 में माओवादी घटनाओं में कुल 1,080 लोग मारे गए थे। जबकि अगले तीन वर्षों में इसमें खासी कमी हुई। यह सब एकाएक नहीं हुआ। इसके लिए रणनीतिक अभियान चलाए गए, सेना और पुलिस ने आदिवासी क्षेत्रों में लोगों से संपर्क बनाने की शुरुआत कर उनके अंदर भरोसा जगाया। सुरक्षा तंत्र की कारगर रणनीतियों का ही नतीजा रहा कि माओवादी धीरे-धीरे कमजोर हुए। पहले महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में उनका आधार था, लेकिन अब वे एक सीमित हिस्से में ही सिमट कर रह गए हैं। उनकी गतिविधियों का आधार भी उसी खास क्षेत्र के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। मगर यहां रेखांकित करने वाली बात यह है कि उसी सीमित क्षेत्र में अपनी बची-खुची शक्ति से वे खुद का एहसास करा रहे हैं।
मगर छत्तीसगढ़ में हुए हमलों को नक्सलियों की हताशा नहीं मानना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि कश्मीर में आतंकी हताशा में हल्की वारदात कर देते हैं। वे बसों में आग लगा देते हैं। आम इलाके में बम विस्फोट करवाते हैं। उनकी कोशिश किसी भी तरह लोगों को भयभीत करने की होती है। लेकिन नक्सली अपने लक्ष्य और खास रणनीति के साथ अपना काम करते हैं। पुलिसकर्मियों को मारना या निर्माण कार्यों में सहायक होने वाले लोगों को निशाना बनाना उनकी रणनीति का हिस्सा होता है। दरअसल मानसून आने के बाद नक्सलियों के ऑपरेशन और सुरक्षा बलों के जवाबी ऑपरेशन, दोनों रुक जाते हैं। बारिश के मौसम में नक्सलवादी अंदरूनी इलाकों में जाकर लोगों से संवाद बनाने की कोशिश करते हैं, लोगों के मन में यह बात बिठाने की कोशिश करते हैं कि नक्सलवाद की जरूरत किन कारणों से बनी हुई है। जाहिर है, बरसात से पहले के इन हमलों की मंशा लोगों को नक्सलवाद की ताकत का परिचय देना भी है। इनके जरिये वे अपने कैडरों को संदेश भी देना चाह रहे होंगे कि नक्सलवाद लक्ष्य से भटका नहीं है, और न ही वह लचीला हुआ है।
दरअसल, नक्सलवाद के देश भर में फैलने के मंसूबे कई वजहों से पूरे नहीं हुए। नक्सली जिस तरह खड़े हो रहे थे, उसमें दोनों तरह की रणनीतियों से उसे तोड़ा जा सकता था। एक तरफ जहां नक्सली नेतृत्व पर प्रहार करना शामिल था, वहीं नक्सली क्षेत्रों में लोगों को उनसे दूर करना था। दोनों ही कठिन काम थे। एक में सेना-पुलिस को लंबी जद्दोजहद करनी थी, दूसरी रणनीति में लोगों के मन का विश्वास जीतना था। यहां नक्सलवादियों की ताकत अपनी कमियों और गलत रणनीति के कारण कमजोर हुई। सरकार और खुफिया तंत्र के पास उनके बारे में जानकारियां इकट्ठा करने का तंत्र अब अधिक मजबूत है। इसके अलावा नई जगहों पर पांव जमाने के नक्सलियों के मंसूबे तो पूरे नहीं ही हुए, उल्टे इससे उनकी अपनी शक्ति भी कम हो गई। हाल के दौर में कई बड़े नक्सली नेता या तो मारे गए या पकड़े गए। अब यही कहा जा रहा है कि नक्सलियों में उच्च स्तर पर नेतृत्व का अभाव है। नेतृत्व के अभाव के अलावा उन्हें नए लड़ाके भी नहीं मिल रहे। जिस नक्सलवाद के लगातार फैलाव की चिंता की जाती थी, तथ्य यह है कि अब वह बस्तर के कुछ इलाकों, खासकर तीन जिलों सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर तक सिमटा हुआ है। बस्तर के कुछ इलाकों में तो वह पहले से कमजोर हुआ है।
नक्सलियों के खिलाफ संवाद बनाने में पुलिस और सेना को शुरू में मुश्किल हुई थी। लेकिन एक समय जब लोगों ने पाया कि पुलिस की तुलना में माओवादी आतंक उन्हें ज्यादा परेशान कर रहा है, तो वे माओवाद से दूर होने लगे। हाल के दौर में पुलिस उन अंदरूनी इलाकों में भी जाने में सफल हुई है, जहां आदिवासी रहते हैं, और जहां नक्सलियों की पैठ बताई जाती रही है। इसके अलावा सीआरपीएफ के कैंप स्थापित होने से भी लोगों को धीरे-धीरे अपनी सुरक्षा का एहसास होने लगा। हालांकि अभी यह नहीं कह सकते कि नक्सलियों को पूरी तरह से हाशिये पर डाल दिया गया है। लेकिन उनके कदम काफी पीछे रह गए हैं। वैसे नक्सल-विरोधी इस पूरे अभियान में सुरक्षा तंत्र को भी सबक मिला है। कई जगह उनके ऑपरेशन सफल नहीं हुए, तो कई जगह नक्सलियों की संख्या पुलिस पर भारी पड़ी। कई बार पुख्ता सूचना का भी अभाव दिखा। लेकिन कुल मिलाकर सरकार के स्तर पर नक्सलवाद पर दवाब बनाने की जो रणनीति बनी थी, उसके परिणाम ठीक रहे हैं।
बेशक अभी नक्सली दबाव में हैं। लेकिन आगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार अपने कदम कितनी मजबूती से बढ़ाती है। उसे याद रखना होगा कि अगर जरा भी वह फिसली, तो हाथ से डोर छूट सकती है। क्योंकि नक्सलवाद कमजोर हुआ है, मिटा नहीं है।
इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट, दिल्ली के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर