फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

किस राह पर अफगानिस्तान

Wed, 15 Apr 2015 07:38 PM IST
कुलदीप तलवार
विज्ञापन
विज्ञापन
अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पद संभालने के बाद हाल ही में अपनी पहली अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा से प्रार्थना की थी कि अफगानिस्तान में तैनात लगभग 10 हजार अमेरिकी सैनिकों को पहले के कार्यक्रम के अनुसार, इस साल के अंत तक वापस न बुलाएं। ओबामा ने गनी का प्रस्ताव मान लिया है। अमेरिकी सैनिक वहां 2016 तक टिके रहेंगे। वे अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण देना जारी रखेंगे। जबकि तालिबान ओबामा के इस फैसले से नाराज हैं। उन्होंने अमेरिकी व अफगान सैनिकों पर हमले तेज कर दिए हैं।
विज्ञापन


अशरफ गनी के सामने तालिबान से समझौता करके देश में शांति कायम करने की परीक्षा है। इसके लिए वह पाकिस्तान और चीन से सहयोग लेने की कोशिश में भी लगे हुए हैं। गनी चाहते हैं कि ये दोनों देश तालिबान को वार्ता हेतु राजी करने में उनकी मदद करें। नए अफगान राष्ट्रपति प्रोटोकॉल तोड़कर रावलपिंडी सैनिक मुख्यालय जाकर पाक फौज के मुखिया जनरल राहील शरीफ से मुलाकात भी कर चुके हैं। जनरल राहील भी पिछले कुछ अर्से में दो बार अफगानिस्तान जाकर वहां के फौजी और शासकों से मिल चुके हैं। पाक-अफगान सीमा पर शांति बनाए रखने और आपसी रिश्ते सुधारने के लिए अफगानिस्तान-पाकिस्तान का एक संयुक्त आयोग भी गठित हो चुका है। यह पहली बार हुआ है कि छह अफगान कैडेट पाक सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण ले रहे हैं। दोतरफा कारोबार सुधारने के लिए पेशावर से काबुल तक मोटर-वे बनाने के अलावा रेल के जरिये आपस में जुड़ने की कोशिश भी हो रही है।

पर हकीकत बहुत उम्मीद जगाने वाली नहीं है। असल में, तालिबान से वार्ता करना पेचीदा काम है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और कतर पहले भी उनसे बातचीत कर चुके हैं, पर कोई नतीजा नहीं निकला। तालिबान, अल कायदा, इस्लामिक स्टेट और अल शवाब जैसे संगठनों को फौजी ताकत से दबाया तो जा सकता है, पर असल लड़ाई जेहादी कट्टरपंथी विचारधारा की है, जिसे पराजित करना आसान नहीं। पूर्व अफगान राष्ट्रपति करजई भी तालिबान से पिछले दरवाजे से वार्ता में लगे थे, पर उन्हें भी कोई सफलता नहीं मिली थी।
विज्ञापन


बातचीत सफल तभी हो सकती है, जब तालिबान हिंसा छोड़ें और मानवाधिकारों की कद्र करें। पाक अफगानिस्तान में एक कठपुतली सरकार चाहता है, जो उसके इशारे पर नाचे। पूर्व राष्ट्रपति करजई का मानना है कि गनी को पाक से नजदीकी भारी पड़ सकती है। चीन की निगाह भी अफगानिस्तान में तेल और खनिज के व्यापक संसाधनों पर टिकी है, जिनका दोहन अब तक नहीं हुआ है। पाक के बाद वह चीन ही है, जहां की यात्रा पर गनी गए थे। उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से तालिबान को वार्ता के लिए राजी करने का अनुरोध किया था।

पाक और चीन की मंशा भारत को अफगानिस्तान से बाहर निकालने की है। जबकि अफगानिस्तान की स्थिरता के लिए भारत का समर्थन पाक और चीन के लिए कोई खतरा नहीं। भारत अफगानिस्तान में दो अरब डॉलर का निवेश कर चुका है और भी बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। ऐसे में, अशरफ गनी का पाक और चीन की तरफ झुकाव न केवल अफगानिस्तान, बल्कि भारत के लिए भी हानिकारक हो सकता है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें