सीधे या गठबंधन में बीस राज्यों में सत्ता हासिल करने के बाद सत्तारूढ़ भाजपा ने पूर्वोत्तर की योजनाओं और दक्षिण भारत में प्रवेश पाने के अपने प्रयासों के बारे में काफी कुछ कहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश जैसे प्रायद्वीपीय पूर्वी क्षेत्र और तेलंगाना में उसकी योजनाओं के बारे में बहुत कम पता है। इन चारों राज्यों में मजबूत, करिश्माई क्षेत्रीय नेताओं का शासन है, जो राष्ट्रीय दलों से स्वतंत्र एवं उनके विरोध में खड़े हैं। ये ऐसे गढ़ हैं, जिन पर भाजपा की नजर है, लेकिन अभी तक उसे इन राज्यों में महत्वपूर्ण सफलता नहीं मिली है।
ये राज्य महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अगले कुछ महीनों में उनमें से तीन राज्यों-ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में आम तौर पर चुनाव लोकसभा के साथ होते हैं। समय से पहले संसदीय चुनाव की स्थिति में हमेशा की तरह इन राज्यों में भी चुनाव होंगे। इस बात की मजबूत अटकलें हैं कि दीपावली और क्रिसमस के बीच संसदीय चुनाव होंगे। केंद्र सरकार और भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव कराना चाहती है। इसका मतलब है कि मात्र चार या पांच महीने बचे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं और वे इन क्षेत्रीय क्षत्रपों और उनके शासन की गलतियों पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।
हालांकि ये क्षेत्रीय नेता भाजपा के लिए कठिन साबित हो रहे हैं। वे अपने अस्तित्व रक्षा और समृद्धि की रणनीति तय करने के लिए दिल्ली की गतिविधियों पर बारीक नजर रखते हैं। उनमें से तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव तटस्थ माने जाते हैं और यदि उन्हें विशेष पैकेज मिले (जिसे हासिल करने में उनके विरोधी एन. चंद्रबाबू नायडू विफल रहे), तो केंद्र के साथ सहमति बनाने के लिए तैयार हैं। दरअसल नायडू अपने राज्य को विशेष पैकेज न मिलने और नई राजधानी अमरावती के कारण राजग से अलग हो गए, इससे राव के लिए रास्ता साफ हो गया। इसलिए नायडू, जिन्होंने राजग से अपना रिश्ता तोड़ लिया, केंद्र में राजग सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के मुख्य सर्जक बने। वह अब इसका आकलन कर रहे हैं कि उन्हें विपक्ष के साथ कैसे और कितनी दूर तक जाना चाहिए, जो अभी संसदीय चुनाव के लिए भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने की प्रक्रिया में है।
पश्चिम बंगाल का मामला केंद्र और राज्य के बीच होने वाले उच्च स्तरीय संघर्ष के कारण बिल्कुल अलग है। भाजपा मानती है कि पश्चिम बंगाल पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है और उससे भी अधिक राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए महत्वपूर्ण है। अब तक ममता स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत से मजबूत साबित हुई हैं-हिंसा और धांधली के आरोपों के बावजूद। बंगाल फतह करने के लिए भाजपा कांग्रेस और वाम दलों का वहां जो भी अस्तित्व बचा है, उसे खत्म करना चाहती है। यह इतिहास में जगह बनाने की कोशिश है, जिसका सपना श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कभी देखा था। क्या ऐसा संभव है?
इसके लिए हमें उपरोक्त राज्यों में से सबसे कम महत्व के गरीब राज्य ओडिशा की राजनीति पर नजर डालनी चाहिए। आगामी 31 जुलाई को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की जीवनी बाजार में आएगी, जिसे वरिष्ठ पत्रकार रुबेन बनर्जी ने लिखा है। पटनायक की खुद एक लेखक और सोशलाइट के रूप में थोड़ी प्रतिष्ठा है और जो राजनीति में आने से पहले मुश्किल से ओडिया बोलते थे। इस पुस्तक से न सिर्फ पटनायक, बल्कि ओडिशा में उनके लंबे शासन के बारे में जानने का मौका मिलेगा। यह केवल दूसरी पुस्तक है, जो इस नेता के अद्भुत राजनीतिक करियर के निर्माण के तरीके पर करीबी व कठोर नजर डालती है, जिन्होंने अपनी पार्टी के भीतर और बाहर के कई कद्दावर नेताओं का खेल खत्म कर दिया। मसलन, राज्य में कांग्रेस को खत्म करने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की। उनके ऊपर लिखी पहली किताब चेसिंग हिज फादर्स ड्रीम्स भी पिछले साल जनवरी में आई, जिसे बिश्वजीत मोहंती ने लिखा है।
भाजपा द्वारा भविष्य में खत्म किए जाने के भय के बावजूद अगर नवीन पटनायक विपक्षी गठबंधन में शामिल नहीं होते हैं और केंद्र के साथ सहमति बनाते हैं, तब भी उनकी भूमिका देश के पूर्वी और दक्षिण पूर्वी क्षेत्र की राजनीति पर गहरा असर डालेगी। उनकी हार का मतलब भाजपा के लिए पैर पसारने से ज्यादा है। और उनकी जीत का मतलब दो दशक लंबे सत्ता विरोधी रुझान को खत्म करना है। नवीन बीजू पटनायक के बेटे हैं, जिनसे ओडिशा की राजनीति आज तक प्रभावित है।
नवीन ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने दिल्ली के अपने उन्मुक्त दिनों से बेहद सहजता से खुद को ऐसे नेता में तब्दील कर लिया, जिसने योजनाबद्ध ढंग से अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। यहां तक कि उन्होंने लंबे समय तक अपने प्रिय रहे बैजयंत पांडा तक का कद छोटा कर दिया। बैजयंत पांडा अब बीजद छोड़ना चाहते हैं और नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश में हैं। क्या भाजपा उन्हें गले लगाएगी? नवीन अपने लोगों को समायोजित करना चाहते हैं। इसलिए ओडिशा सरकार तेलंगाना की तर्ज पर विधान परिषद स्थापित करने के लिए एक प्रस्ताव लाने पर विचार कर रही है। लेकिन केंद्र सरकार लगातार ओडिशा पर दबाव बनाए हुए है। इस हफ्ते केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार राज्य में लाखों युवाओं को कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए दिए गए केंद्र सरकार के धन का उपयोग करने में विफल रही है। आलोचकों का कहना है कि दो दशक लंबे अपने शासन के दौरान नवीन ने ओडिशा के लिए बहुत कुछ नहीं किया है। पर वे इस बात पर सहमत हैं कि ओडिशा में विकल्पहीनता की स्थिति काम कर सकती है। हो सकता है कि नवीन भाजपा के लिए बड़ी चुनौती पेश करें। पर यह तो केवल समय और चुनाव ही बताएगा कि वास्तविकता क्या है।