गंगा की आजादी के लिए पिछले बारह वर्षों से प्रोफेसर जीडी अग्रवाल स्वामी सानंद जी गंगा तपस्या कर रहे हैं। गंगा की अविरलता व निर्मलता एक सत्य है। इसका आग्रह अहिंसा में, तरीका तपस्या है। इसलिए यह गंगा का सत्याग्रह बन गया है। भारत की आजादी के लिए 70 वर्षों तक सत्याग्रह चला था। उस काल में अंग्रेजों से भारतीय आजादी का आग्रह कर रहे थे। अंग्रेज भारत की आजादी के सत्य को टाल नहीं सके, इसलिए आजादी का सत्याग्रह सफल हुआ था। गंगा की आजादी का सत्याग्रह सफल होगा या नहीं, यह सवाल गंगा प्रेमियों के मन में है, क्योंकि गंगा की आजादी देने वाले भारतीय हैं और आजादी का आग्रह करने वाले भी भारतीय हैं। सत्ता जब झूठ को पोषित करती है, तो जन सामान्य के मन से सत्य की आस्था हिल जाती है।
स्वामी सानंद का कहना है, 'मेरा काम मां गंगा के लिए तपस्या करते हुए प्राणों का बलिदान देना है। मैं वही करूंगा। मुझसे पहले स्वामी निगमानंद मातृ सदन, हरिद्वार, स्वामी नागेश्वर नाथ, मणिकर्णिका घाट, बनारस ने भी गंगा मां के लिए अपना बलिदान देकर मोक्ष की प्राप्ति की है। मेरी भी अंतिम इच्छा मां गंगा के लिए तपस्या करते हुए प्राणों का बलिदान देकर मोक्ष प्राप्त करना है। लेकिन झूठ बोलकर धोखा देने वालों को अभिशाप देकर जाऊंगा। जिससे झूठमेव जयते रुक सके और सत्यमेव जयते पुनर्स्थापित हो सके। इसकी स्थापना तभी होगी, जब भारत सरकार गंगा को राष्ट्रीय दर्जा देने वाला अविरलता व निर्मलता का कानून पास कर देगी।'
मंत्रालय में बहुत दिनों से इस बिल पर चर्चा करके संसद में पेश करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन अभी तक यह बिल संसद के दरवाजे तक नहीं गया है। कानून नहीं बनने से ठेकेदार, नेताओं और इंजीनियरों सबके मजे हैं। इसीलिए पिछले छह वर्षों से गंगा के कानून का प्रारूप दर-दर की ठोकर खा रहा है।
सरकार में गंगा मैया के लिए प्रतिबद्धता नहीं दिखाई पड़ रही है। चुनाव से पहले प्रधानमंत्री खुद गंगा स्वच्छता अभियान की बात करते थे। अब उनके राज्य मंत्री ही संसद में लिखित में जवाब देते हैं। वह कहते हैं कि 2016 के मुकाबले 2017 में मां की हालत में सुधार हुआ था, लेकिन आज की हालत नहीं बता पाते। जबकि 2018 आधे से ज्यादा बीत गया है। इस वर्ष गरमी में गंगा सूख गई या मर गई है। वहीं बारिश में बाढ़ का शिकार बन रही है। आज वह मैला ढोने वाली मालगाड़ी बन गई है। मैला नदी में गिरकर उसे बीमार बना देता है। मां कैंसर की बीमारी से ग्रस्त है। हम एसटीपी लगाकर बुखार उतारने वाली पैराशिटामाल खिलाकर स्वस्थ बनाने का स्वप्न देख रहे हैं। जब रोगी का निदान होता है, तभी चिकित्सा संभव है।
भारत की संसद में 21 जुलाई को सभी राजनीतिक दलों ने अपने बौद्धिक घोड़े दौड़ाते हुए सभी वायदों को पूरा करने का बखान किया, लेकिन किसी भी दल ने गंगा से किए अपने वायदों का तनिक भी उल्लेख नहीं किया। इससे पता चलता है कि भारत की 132 करोड़ जनता की आस्था गंगा पर किसी का भी ध्यान नहीं है। गंगा केवल वोट दिलाने वाली मशीन है। जब चुनाव का वक्त आता है, तब तो गंगा का नाम लेना कोई नहीं भूलता। चुनाव जाने के बाद कोई नाम भी याद करना नहीं चाहता। प्रोफेसर जीडी अग्रवाल और देश के गिने-चुने गंगा भक्त गंगा की आजादी के सत्याग्रह में जुटे हैं। यह सत्याग्रह गंगा की आजादी पाने तक चलेगा, रुकेगा नहीं। पिछले 12 सालों से गंगा की अविरलता निर्मलता का सत्याग्रह चल रहा है, आगे भी चलता रहेगा।
- लेखक मैगसेसे एवं स्टॉक होम वाटर प्राइज से सम्मानित