होली मात्र एक दिन का त्योहार नहीं है, बल्कि यह उत्सव की एक ऋतु है। फागुन चढ़ते ही खेतों में फसलें पकने लगती हैं और अन्न की चमक अभाव से लदी आंखों में चमक भर देती है और वही चमक कंठों से फाग बनकर फूटने लगती है-गांव की गलियों में, ओसारों में, राहों पर। होली के मौसम में हवाओं में एक नई उष्मा जाग जाती है, जो राहों को बुहारने लगती हैं। होली में रंग-भीगे राहियों से राहें जगमगाने लगती हैं। पेड़ पुराने पत्ते झाड़कर तैयार करने लगते हैं अपने को नए पत्तों के लिए और प्रकृति में गूंजने लगता है नवसृजन-राग। महीने भर की उमंग पूंजीभूत हो जाती है होली में। होली जलती है, तो समय का जीर्ण-शीर्ण जलता है। नए समय के स्वागत में रंगों से होली खेली जाती है। लोगों के बीच की दीवारें टूट जाती हैं और आदमी स्वयं को रंगमय कर लेता है। मतभेदों की दीवारें गिराकर आदमी केवल आदमी रह जाता है प्यार में नहाया हुआ। बचपन से ही होली से लगाव रहा है मुझे, लेकिन बीएचयू और बनारस की होली मेरी यादों में अब भी बसी है।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) प्रकृति के बीच और प्रकृति को अपने में समाए हुए बसा है। यहां हर मौसम अपनी पूरी गरिमा के पास प्रकट होता है। बीएचयू के परिवेश में मेरे अपने गांव-जवार का परिवेश सम्मिलित हो जाता था। मौसम सभी प्रिय लगते थे, लेकिन जब मेरा अत्यंत प्रिय वसंत ऋतु आता था, तो मेरा मन अकथनीय उल्लास से भर उठता था। सुबह-सुबह मैं बॉटेनिकल गार्डन की तरफ निकल जाता था और वहां देर तक घूमता रहता था। सहज वन का आभास देने वाला यह उपवन वसंत के रूप, रस, गंध, स्पर्श, स्वर का पूरा अनुभव उतार देता था। महिला छात्रावास से घूमने आने वाली छात्राएं वसंत में जाग्रत रोमानी कल्पनाओं को स्पंदित करती थीं। कभी-कभी खेतों की ओर निकल जाता था और उनकी वासंती रंगमयता से सराबोर हो उठता था। फागुनी हवा के अल्हड़ झोंके फसलों को छेड़ते हुए स्वयं में बजते हुए दिगंतों तक चले जाते थे, पत्ते उड़ते हुए एक विषण्ण संगीत की तरह चारों ओर फैल जाते थे। पेड़ों की डालियां नंगी हो जाती थीं और उनके भीतर से फूटती हुई नई आभा चमकने लगती थी। और एक दिन लाल-लाल किसलय उन पर लद जाते थे। इस वातावरण में मैंने फागुन और वसंत पर कई कविताएं लिखीं, जो मुझे आज भी बहुत प्रिय हैं।
बीएचयू और बनारस की होली के उमंग का क्या कहना! हर व्यक्ति मस्ती में सराबोर होता था। कुछ दिन पहले से ही वातावरण हुड़दंग और रंग से भर जाता था। काशी के कुछ पत्रकार और साहित्यकार इस अवसर पर होली से संबंधित साहित्य निकालने के लिए प्रख्यात थे। हां, इन दिनों बीएचयू में लड़कियों का बाहर निकलना कम हो जाता था। होलिका दहन के दिन शाम को डॉ. राजबली पांडेय के सभापतित्व में ऊपरी मंजिल के बरामदे में गोष्ठी जमती थी, जिसमें हास्य, व्यंग्य, कविता पाठ, गीत आदि का उन्मुक्त कार्यक्रम चलता था। नीचे हॉस्टल के ग्राउंड में हॉस्टल के अनेक छात्र नाचते, गाते, बजाते थे।
होलिका दहन की रात गहमागहमी में बीतती थी और सुबह की प्रतीक्षा रहती थी। वैसे तो शरारत सबके साथ होती थी, लेकिन शरारतियों की दृष्टि कुछ विशेष लोगों पर ज्यादा टिकी होती थी। मेरे बगल के कमरे में रहने वाले भगतसिंह शरारतियों का निशाना बनते थे। कभी-कभी तो वह शहर छोड़कर चले जाते थे, लेकिन एक बार उन्होंने मुझे कहा कि मुझे कमरे में बंद करके बाहर से ताला मार दो और कह दो कि वह शहर से बाहर चले गए हैं। मैंने ऐसा ही किया। लड़के बार-बार उन्हें पूछते हुए आए और मैंने कहा कि वह बाहर गए हुए हैं। पर उन्हें विश्वास नहीं होता था। लड़के ताला खटखटाकर चले जाते थे, करते भी क्या!
होली के दिन एक विशेष खेल होता था-लड़कों को हौज में पटकना। छात्रावास के सामने फव्वारा लगा था। उसके पानी में रंग घोल दिया जाता और दो-चार लड़के किसी को पकड़कर लाते और उसमें पटक देते थे। कोई कहता कि भाई, मैं स्वयं उसमें कूद रहा हूं, छोड़ दीजिए। किंतु जो मजा उठाकर फेंकने में था, वह सहमति से कूदने में कहां! इसमें कोई भेदभाव नहीं किया जाता-मुसलमान, ईसाई, देसी-विदेशी का कोई अंतर नहीं। सभी होली के रंग में खुशी-खुशी शरीक होते थे। सभी इसके कीचड़ को भी मानवीय उमंग का प्रसाद मानकर अंगीकार करते थे। इस खेल के बाद लड़के झुंड बनाकर प्रोफेसरों के यहां निकलते थे और प्रोफेसर भी उन्मुक्त भाव से इनसे मिलते थे, मिठाइयां खिलाते थे और फिर दोपहर को मेस महाराजाओं का प्रसादस्वरूप भोज मिलता था। शाम को हम शहर में निकलते थे। गौदोलिया, दशाश्वमेध घाट, विश्वनाथ गली, चौक, मैदागिन तक जैसे भीड़ ही भीड़। रंग उड़ाती, हंसी-ठठ्ठे करती, हुड़दंग मचाती भीड़। उसी भीड़ में अश्लील साहित्य भी बंटता। काशी के ठेठ साहित्यकार इस भीड़ में दिखाई पड़ते।
होली बीतने के बाद भी बनारस की मस्ती बनी रहती। उसे देखकर लगता कि होली कुछ दिन और बनी रहे। और जगहों पर होली मस्ती के शिखर पर पहुंचकर दूसरे दिन एकाएक ढेर सारा खालीपन छोड़ जाती हैं, किंतु बनारस वाले उसे एकाएक जाने नहीं देते हैं। उसके प्रभाव को अगले मंगलवार (बुढ़वा मंगल) तक खींच ले जाते हैं। और इस तरह उनका होली का खुमार धीरे-धीरे ही उतरता।
चैत लगता था, उष्मा तेज होने लगती थी, हवा गरमाने लगती थी, लेकिन सुबहें, शामें और रात प्यारी होती थीं। चार बजे सुबह पास के कमरे से शिवसागर मिश्र खुमारी भरे स्वर में गाने लगते थे-सेजिया से सैंया रूसि गइलें हो कोइलरि/तोरी मीठी बोलियां। चैत की अलसाई सुबह में उनकी आवाज में बहता गीत मुझे जगा देता। मैं उठकर पढ़ने बैठ जाता था, फिर फ्रेश होकर बाहर घूमने निकल जाता था। चैत की सुबह की ठंडी-ठंडी सुगंधित हवा, पेड़ों के नंगेपन को फोड़कर उगते हुए किसलय, फूलों से लदा हुआ बॉटेनिकल गार्डन, किसी कुंज में कूकती हुई कोयल-ये सब मुझे पुकारते थे और मैं इनमें खो जाता था।