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बीमारी बदल रही पता: गंभीर पारिस्थितिक बदलावों से खराब हो रही सेहत; स्वास्थ्य व्यवस्था को भी बदलना होगा रास्ता

Wed, 26 Aug 2026 09:11 AM IST
ज्योति भास्कर परीक्षित निर्भय, अमर उजाला।
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स्वास्थ्य व्यवस्था को बदलना होगा रास्ता - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
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शायद यह बात अजीब लगे, लेकिन बीमारियों का भी अपना पता होता है। कुछ बीमारियां गर्म इलाकों में ज्यादा होती हैं, तो कुछ ठंडे इलाकों में। कुछ बारिश आते ही बढ़ने लगती हैं, तो कुछ गर्मी के साथ। डॉक्टर और स्वास्थ्य विभाग भी इसी अनुभव के आधार पर बीमारी से निपटने की तैयारी करते हैं। पर, अब मौसम का मिजाज बदल रहा है और उसके साथ बीमारियों का नक्शा। जो बीमारी कल तक किसी इलाके के लिए दूर की बात थी, वह आज वहां नई चिंता बनकर सामने आ रही है।

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एक समय था, जब डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया का खतरा मुख्य रूप से गर्म और नम इलाकों में ज्यादा माना जाता था। लेकिन, अब पहाड़ों में भी इन बीमारियों के मामले सामने आ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में डेंगू के मामले 2021 के 1,709 से बढ़कर 2022 में 8,269 हुए, हालांकि 2025 में घटकर 3,343 रह गए। हिमाचल प्रदेश में भी 2021 के 349 मामलों के मुकाबले 2024 में 3,359 मामले दर्ज हुए। उत्तराखंड, मेघालय, सिक्किम और नगालैंड में भी मच्छरजनित बीमारियों के बदलते स्वरूप ने चिंता बढ़ाई है।

इन आंकड़ों को केवल जलवायु परिवर्तन से जोड़ना सही नहीं होगा। शहरीकरण, जलभराव, लोगों की आवाजाही, सफाई और निगरानी जैसे कई कारक भी जिम्मेदार हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन इन सबके बीच एक नया खतरा जरूर पैदा कर रहा है। बढ़ता तापमान, बदलता बारिश चक्र और नमी मच्छरों के पनपने के नए इलाके और अनुकूल परिस्थितियां बना रहे हैं। इसलिए मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जापानी इंसेफेलाइटिस, कालाजार और फाइलेरिया जैसी बीमारियों को जलवायु से प्रभावित होने वाली बीमारियों में रखा जाता है।
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 2024 भारत के हाल के दशकों के सबसे खराब मौसम वाले वर्षों में रहा। इस दौरान रिकॉर्ड गर्मी, बाढ़, तूफान और लंबे समय तक चली असामान्य गर्मी ने लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया। 2025 में भी कई जगहों पर बाढ़ के बाद तेज गर्मी का सामना करना पड़ा। मई 2026 में तूफान से उत्तर प्रदेश में 117 लोगों की मौत हुई। वहीं, हाल में जारी मौसम का असर : भारत में जलवायु और स्वास्थ्य का आपसी संबंध व लचीलापन पाने के रास्ते  रिपोर्ट के अनुसार, केवल गर्मी के कारण 2021 में भारत को अनुमानित 160 अरब काम के घंटों का नुकसान हुआ। यह देश की जीडीपी के करीब 5.4 प्रतिशत के बराबर था। वायु प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हर साल देश की जीडीपी का करीब दो प्रतिशत नुकसान होने का अनुमान है।

सरकार को इस बदलती तस्वीर का एहसास है। 2019 में केंद्र सरकार ने जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य को लेकर राष्ट्रीय कार्य योजना बनाई, जिसमें 2021 में संशोधन किए गए। राज्यों को भी अपनी योजनाएं बनाने के लिए कहा गया। इसमें गर्मी, वायु प्रदूषण, बाढ़ और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों को शामिल किया गया है। मई 2025 में राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र ने जलवायु परिवर्तन और मच्छरजनित बीमारियों के संबंध को समझने के लिए समिति बनाई। इसका एक अहम काम मौसम के आंकड़ों के आधार पर पहले ही बीमारी के खतरे का अनुमान लगाने वाली व्यवस्था तैयार करना है।

यहीं हमारे स्वास्थ्य तंत्र के सामने बड़ा सवाल है। हमारे पास तापमान, बारिश और नमी का रिकॉर्ड है। स्वास्थ्य विभाग के पास डेंगू, मलेरिया और दूसरी बीमारियों के आंकड़े हैं। फिर, इन दोनों जानकारियों को जोड़कर पहले से चेतावनी क्यों नहीं दी जा सकती? अगर किसी जिले में तापमान बढ़ रहा है, बारिश का पैटर्न बदला है, नमी ज्यादा है और जगह-जगह पानी जमा हो रहा है, तो बीमारी के खतरे का अनुमान पहले लगाया जा सकता है। ऐसे में, मरीजों के अस्पताल पहुंचने का इंतजार क्यों किया जाए? पहले ही सफाई अभियान चलाया जा सकता है, जलभराव खत्म कराया जा सकता है, मच्छर नियंत्रण बढ़ाया जा सकता है और अस्पतालों को जांच व दवाओं के लिए तैयार किया जा सकता है। इसके लिए मौसम वैज्ञानिक, डॉक्टर, कीटविज्ञानी, महामारी विशेषज्ञ, स्थानीय निकाय और स्वास्थ्य विभाग को साथ काम करना होगा।

सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि आज कितने मरीज आए। यह भी होना चाहिए कि मौसम के अनुसार अगले महीने कितने मरीज आ सकते हैं। यही बदलाव जरूरी है। अभी व्यवस्था बीमारी आने के बाद ज्यादा सक्रिय होती है। अब उसे बीमारी आने से पहले तैयार होना होगा। भारत के सामने चुनौती पुराने बीमारी के नक्शे को बचाए रखने की नहीं, नए नक्शे को समय रहते पढ़ लेने की है, क्योंकि कल की बीमारी आज का पता बदल रही है। अगर बीमारी का पता बदल रहा है, तो स्वास्थ्य व्यवस्था को भी अपना रास्ता बदलना होगा।

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