कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) ने जून 2023 में यह एलान कर दिया था कि कई दिनों तक औसत वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक था। 2024 में फिर यह बात दोहराई कि ग्लोबल वार्मिंग इस साल 1.5 डिग्री की लक्ष्मण रेखा पार कर गई। एक हालिया स्टडी शिफ्टिंग जोनस ऑफ ऑक्युरेंस ऑफ एक्सट्रीम वेदर इवेंट-हीट वेव्स के मुताबिक, अब हीटवेव सिर्फ राजस्थान या विदर्भ तक सीमित नहीं रही। अरुणाचल प्रदेश, केरल और जम्मू-कश्मीर जैसे पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले राज्यों में भी पिछले दो दशकों में हीटवेव देखी गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है। हाल ही में किए गए आकलन के अनुसार, उत्तराखंड के पहाड़ों में खाद्यान्न और तिलहन 27 फीसदी फसल भूमि नष्ट हो गई, उपज में 15 फीसदी की कमी आई। आलू का उत्पादन पांच वर्षों में 70 फीसदी तक गिर गया, जिसमें सबसे बड़ी गिरावट अल्मोड़ा और रुद्रप्रयाग में आई।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. केजे रमेश के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण दक्षिण-पूर्वी वायुमंडल में नमी का स्तर बढ़ गया है। तापमान में हर एक डिग्री की वृद्धि के साथ, हवा की जलवाष्प धारण करने की क्षमता में सात फीसदी की वृद्धि हुई है। सभी पहाड़ी राज्यों में दो से चार डिग्री तापमान वृद्धि देखी गई है। आईपीसीसी की रिपोर्ट में वेट-बल्ब तापमान का जिक्र किया गया है, जो मूल रूप से तापमान रीडिंग की गणना करते समय गर्मी और उमस को जोड़कर देखता है। एक आम इन्सान के लिए, 31 डिग्री सेल्सियस का वेट-बल्ब तापमान बेहद खतरनाक है। 35 डिग्री सेल्सियस में तो छाया में आराम कर रहे किसी स्वस्थ वयस्क के लिए भी लगभग 6 घंटे से अधिक समय तक जीवित रहना मुश्किल हो जाएगा।
नए शोध बताते हैं कि दक्षिण भारत में तेज हवाएं नमी को बेहतर तरीके से फैला रही हैं। ये हवा के बड़े पैमाने पर हो रहे बदलाव का संकेत हैं, जो शायद मानसून प्रणाली की चाल को भी प्रभावित कर रहे हैं। अब जरूरत है प्रभावी हीट एक्शन प्लान, मजबूत अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और शहरों के लिए क्लाइमेट-रेजिलिएंट इन्फ्रास्ट्रक्चर की।