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प्राकृतिक आपदा और बाल विवाह...ऐसे समझिए इनके बीच का संबंध

मधुलिका खन्ना एवं निशिता कोछर Published by: मधुलिका खन्ना निशिता कोचर Updated Tue, 29 Dec 2020 01:27 AM IST
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पिछले कुछ महीने भारत में भारी संकट का समय था। हालांकि आर्थिक सुस्ती और कोविड-19 संकट मीडिया में प्रमुखता से छाए थे, लेकिन इससे अलग दो अन्य समाचार भी तेजी से बदलते समाचार चक्र में दिखाई पड़े- विवाह के लिए महिलाओं की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव और पूर्वी भारत में आई बाढ़। हालांकि बाल विवाह अधिनियम (2006) के अस्तित्व में आने के बाद से पिछले एक दशक में बाल विवाह 38.69 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया, लेकिन पूर्वी भारत में यह अब भी जारी है। लगभग 30 फीसदी बाल विवाह इस क्षेत्र के चार राज्यों-बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में होते हैं। जाहिर है, कम उम्र में शादी पर लगे कानूनी प्रतिबंध भी इस क्षेत्र के युवाओं को विवाह से नहीं रोक पाते। इसके साथ ही बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में तेजी से विस्तार हो रहा है और आने वाले वर्षों में बाढ़ से होने वाले नुकसान में वृद्धि होने की आशंका है।



इस क्षेत्र में कम उम्र में विवाह होने के क्या कारण हैं? ताजा शोध में हमने कम उम्र में विवाह और प्राकृतिक आपदाओं के बीच संबंध का पता लगाया है। दरअसल आर्थिक विनाश का कारण बनने वाली प्राकृतिक आपदाएं बाल विवाह की व्यापकता को बढ़ा सकती हैं। प्राकृतिक आपदाओं और बाल विवाह के बीच के सूत्रों को समझने के लिए हमने 2008 में कोसी में आई बाढ़ का अध्ययन किया, जिसने प्रभावित क्षेत्र को भारी आर्थिक झटका दिया था। 18 अगस्त, 2008 को नेपाल के सुनसरी जिले के कुसहा गांव में पूर्वी तटबंध टूट जाने से कोसी अपने दो सौ साल पुराने रास्ते पर चल पड़ी थी। कोसी के पुराने रास्ते से सौ किलोमीटर आगे बहते ही उत्तर बिहार के कई हिस्से पूरी तरह डूब गए। अररिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल और पूर्णिया जिले के करीब 1,000 गांव गंभीर रूप से प्रभावित हुए। उस बाढ़ से दस लाख लोग तात्कालिक रूप से विस्थापित हुए, जबकि और बीस लाख लोग सीधे प्रभावित हुए। हालांकि मौत का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से कम था, 527 लोगों की ही जान गई थी, पर उस बाढ़ से राज्य को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। अपने अध्ययन में हमने पाया कि कोसी की बाढ़ ने पुरुष और महिलाओं के विवाह की उम्र घटा दी, जिसके चलते पुरुष बाल विवाह की घटनाओं में 6.9 फीसदी और महिला बाल विवाह की घटनाओं में 3.6 फीसदी की वृद्धि हुई। उन बाढ़ग्रस्त जिलों में बाल विवाह अधिक हुए, जहां संपत्ति का नुकसान बहुत ज्यादा हुआ।


कोसी की बाढ़ और बाल विवाह के बीच का यह संबंध क्या दर्शाता है? यह बताता है कि बाढ़ के आर्थिक झटकों से निपटने के लिए वे परिवार, जिनके घर में कुंवारे बेटे हैं, अपने बेटे की कम उम्र में शादी कर देते हैं, ताकि दहेज मिले और मुश्किल समय में सहारा मिल सके। यदि परिवार पहले से गरीब है, तो इसकी संभावना ज्यादा रहती है। यह देखते हुए, कि पुरुष आम तौर पर अपने से छोटी महिलाओं से शादी करते हैं, ज्यादातर लड़कियां भी कम उम्र में शादी करती हैं; ऐसी शादियों में पुरुष और महिला की उम्र क्रमशः दस महीने और 4.5 महीने कम हो जाती है। बाढ़ का प्रभाव पुरुषों पर चूंकि ज्यादा होता है, इसलिए इस तरह की शादियों के पीछे संभवतः लड़के के परिवारों का दबाव ज्यादा रहता है।


हमने पाया कि कोसी की बाढ़ का असर क्षेत्र के हिंदू परिवारों में अधिक पड़ा था, जिनमें दहेज की कुप्रथा ज्यादा है, और भूमिहीन परिवारों में, जो सबसे अधिक प्रभावित होते थे। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि बाढ़ ने स्कूल के बुनियादी ढांचे और छात्रों के नामांकन को प्रभावित नहीं किया, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों ने बाल विवाह में वृद्धि नहीं की। हालांकि विवाह के कारण प्रवासन कम दूरी के भीतर होता है, और आम तौर पर एक ही जिले में, पर यह अब भी संभव है कि कोसी (गैर-कोसी) जिलों की महिलाएं गैर-कोसी (कोसी) जिलों की सीमा में पुरुषों से शादी कर रही हों। ये परिणाम बताते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े आर्थिक नुकसान की भरपाई करने के लिए बाल विवाह एक महत्वपूर्ण कारक है। लेकिन बाल विवाह से लड़के-लड़कियों का नुकसान होता है। ऐसी शादी को मंजूरी देने वाले माता-पिता अपने तात्कालिक हित की पूर्ति के लिए बच्चों के दीर्घकालिक परिणामों पर विचार नहीं करते; यह तथ्य है कि कोसी की बाढ़ ने विवाहित पुरुषों और महिलाओं में माध्यमिक विद्यालय में शिक्षा पूरी करने की दर कम कर दी है।


हमने बाढ़ के कारण महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का भी दस्तावेजीकरण किया और पाया कि न केवल ऐसी महिलाओं के काम करने की संभावना घटी, बल्कि उनके अपने पैसे होने की संभावना भी कम हो गई। यह स्थिति उसी सच्चाई को बताती है कि कम उम्र में विवाह महिलाओं की भलाई के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रमबल में भागीदारी और उनके बच्चों की मानव पूंजी आदि को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इसलिए आर्थिक झटके की स्थिति में भले ही माता-पिता के नजरिये से कम उम्र में शादी सही लगती हो, पर युवा दंपति, खासकर दुल्हनों को इसकी दीर्घकालीन कीमत चुकानी पड़ती है। 


ऐसे समय में, जब पूर्वी भारत को बाढ़ का लगातार सामना करना पड़ता है, बाल विवाह और प्राकृतिक आपदा को कम करने वाली नीतिगत प्रतिक्रियाओं के बारे में विचार करना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के दौरान आजीविका का नुकसान अनेक युवाओं, खासकर पहले से ही गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने वालों को कम उम्र में विवाह के बंधन में धकेल देगा। पहले से ही खबरें हैं कि पिछले कुछ महीनों में बाल विवाह में वृद्धि हुई है। नीतिगत नजरिये से यह समझना महत्वपूर्ण है कि यदि आपदा बीमा या कम ब्याज वाला कर्ज आसानी से उपलब्ध हो, तो प्रभावित परिवारों के पास आर्थिक झटके का सामना करने के लिए दहेज के अलावा अन्य तरीके भी होंगे, जिससे प्राकृतिक आपदा और बाल विवाह के बीच की कड़ी कमजोर हो जाए। 


(-लेखिका द्वय जॉर्जटाउन यूनिवसर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग से पीएच.डी कर रही हैं।) 

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