हम जानते हैं कि थार का पर्यावरण बहुत ज्यादा संवेदनशील है। हम यह भी जानते हैं कि दुनिया में पाए जाने वाले सभी रेगिस्तान में से सबसे ज्यादा जैव विविधता यहीं पाई जाती है। सीमा क्षेत्र जैसलमेर में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए आजीविका के नाम पर पैराग्लाइडिंग और पैरासेलिंग जैसी गतिविधियां चलाई जा रही हैं, जबकि आए दिन पाकिस्तान से ड्रोन के भारतीय सीमा में आने की गतिविधियां घटित होती रहती हैं। क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां होती रहती हैं। युद्ध का अभ्यास चलता रहता है। अगर कभी इन जेट फाइटर और ग्लाइडर्स का बीच में आमना-सामना हो गया, तो इसका जवाब कौन देगा? एक अनुमान के मुताबिक, अकेले जैसलमेर सीमा क्षेत्र में 50 के करीब ग्लाइडर उड़ाए जा रहे हैं।
इससे ज्यादा गंभीर विषय दूसरा है। किसी भी विदेशी व्यक्ति को भले ही वह पर्यटक हो, हमारे सीमा क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं है। किंतु इन ग्लाइडर्स के जरिये वह सीमा क्षेत्र का आसानी से निरीक्षण कर सकता है। और क्या पता, कितने लोग अब तक यह काम कर चुके होंगे? इसका कितना बड़ा खामियाजा देश को भुगतना पड़ सकता है, इसका जवाब कौन अधिकारी देगा? कौन राज्य सरकार देगी?
हाल ही में कुछ स्वतंत्र शोधार्थियों ने अपनी रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि मिट्टी के धोरों पर रात भर चलने वाली जीप सफारी, कैंपिंग और ऊंची आवाज में डीजे साउंड के बजने से पिछले पांच वर्षों में वाइपर सांप की संख्या में 40 फीसदी कमी आई है, जबकि रेगिस्तानी लोमड़ी को देखे जाने की घटना मात्र आठ फीसदी रह गई है। इतना ही नहीं, इससे जीव-जंतुओं की प्रजनन चक्र भी प्रभावित हुआ है। डग बिटल, जिसे रेगिस्तान का गेट कीपर कहा जाता है, नामक नन्हा-सा जीव बड़े काम का है। यह जीव ऊंट के मिंगन को उठाकर मिट्टी की गहराई में ले जाकर उसे तोड़ता है, जिससे मिट्टी की उत्पादकता बढ़ती है। जब यह जीव रहेगा ही नहीं, तो इस मिट्टी को जिंदा कौन करेगा? स्थानीय किसानों का कहना है कि यह जीव कम दिखाई देता है, इसलिए मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता में कमी आई है।
हर भूगोल की अपनी एक तासीर होती है, उसी के अनुरूप वहां का फसल चक्र व अन्य पेड़-पौधे रहते हैं। थार रेगिस्तान में कैर, सांगरी, खेजड़ी, बोर, बूई, सनिया, धामण जैसी वनस्पति इसे खास बनाती हैं। वहां होने वाली बाजरी और ज्वार भी खास हंै। लेकिन हमने विकास का एक चश्मा पहन लिया है। उसको हरा-भरा करने में लगे हुए हैं, जिससे सीमापार पाकिस्तान की टिड्डियां हरियाली से आकर्षित होकर यहां की फसलों पर आक्रमण करने लगीं, जिसका नतीजा हमारे सामने है। यही नहीं, रेगिस्तान की धड़कन यहां की रंग-बिरंगी संस्कृति है। अलग-अलग पहनावा, उनका खान-पान, वेशभूषा, नृत्य, संगीत और उनके साज उसे खास बनाते हैं, लेकिन जब हम उन समुदायों से उनके परंपरागत रोजगार छीन लेंगे, तो जाहिर-सी बात है, वे इस काम से हटकर दूसरे काम करना शुरू करेंगे।
रेगिस्तान में जमीन का पट्टा तो किसी के पास नहीं है। सदियों से बाप-दादाओं के समय से घुमंतू समाज उन मिट्टी के धोरों पर अपना तंबू लगाकर रहते हैं। खेल-करतब दिखाकर गुजारा करते हैं। अचानक से रातों-रात प्रशासन ने उस जमीन को कैंपिंग के लिए आवंटित कर दिया और उन घुमंतुओं के कच्चे झोपड़ों को हटा दिया। जबकि अकेले सम क्षेत्र में करीब एक हजार कैंप बने हुए हैं, जो रेगिस्तान को समाप्त करने में लगे हुए हैं।
ये ऐसे क्रियाकलाप हैं, जिनका प्रभाव तुरंत सामने नहीं आएगा, किंतु जब प्रभाव आएगा, उसका समाधान किसी के पास नहीं मिलेगा। हम उस विचार को बदलना चाहते हैं, जो रेगिस्तान को लेकर हमारे जेहन में रहता है। किंतु इसका खामियाजा आने वाली कितनी पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा, इसका हमारे पास कोई विचार नहीं है।