नरेंद्र मोदी ने राज्यों के चुनावों को राष्ट्रीय जामा पहनाने में अपनी गजब की लोकप्रियता का सफल उपयोग किया है। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के नतीजे इसकी तस्दीक करते हैं। ये चुनाव पूरी तरह से मोदी के नाम पर लड़े गए। न तो महाराष्ट्र में, और न ही हरियाणा में पहले से स्थापित किसी क्षेत्रीय नेता पर कोई फोकस किया गया, जबकि भाजपा अमूमन ऐसा करती रही है। दरअसल अब तक कांग्रेस पार्टी में विधानसभा चुनाव ज्यादातर अपने राष्ट्रीय नेताओं, मसलन, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और फिलहाल सोनिया गांधी के नाम पर लड़ने की परंपरा रही है। बतौर नियम, कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के अपने उम्मीदवार का नाम चुनाव से पहले घोषित नहीं करती। विधानसभा चुनाव में जीत के बाद ही इस पर फैसला होता है। मगर इस मामले में अब मोदी के मजबूत नेतृत्व में भाजपा ठीक कांग्रेस के नक्शे-कदम पर चलती दिख रही है। तो कुछ अर्थों में कहा जा सकता है कि कहीं यह भाजपा का कांग्रेसीकरण तो नहीं? वहीं, अगर कांग्रेस के सिमटते दायरे को देखें, तो साफ होता है कि पार्टी पर क्षेत्रीय पार्टी भर रह जाने का संकट मंडरा रहा है। ऐसे में, अगले दो-तीन वर्षों में खुद को उबारने के लिए कांग्रेस को काफी गहराई से मंथन करना पड़ेगा। वह केवल इस इंतजार में हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकती कि आने वाले वर्षों में मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आ जाएगा, जैसा कि दुनिया भर के नेताओं के साथ होता है। यह रणनीति राजनीतिक आलस्य का नमूना होगी।
कांग्रेस के पुराने मजबूत गढ़ रहे महाराष्ट्र और हरियाणा में जिस आश्चर्यजनक ढंग से भाजपा ने अपने वोट प्रतिशत में दो से तीन गुनी बढ़ोतरी की है, वह सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) के लिए शुभ संकेत नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कुछ अलग घटित हो रहा है? जाने-माने शोध संगठन सेंटर फॉर दि स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद किए गए एक शोध के मुताबिक दुनिया के किसी भी देश की तुलना में भारत के लोकसभा चुनावों का चरित्र सबसे कम 'राष्ट्रीय' होता है। भारतीय राजनीति के तेजी से क्षेत्रीकृत होने की ओर भी इस शोध ने इशारा किया। इतना ही नहीं, लोकसभा चुनावों तक में राष्ट्रीय से ज्यादा क्षेत्रीय मुद्दों पर वोट पड़ते हैं। कहने का तात्पर्य है कि स्थानीय मुद्दे ही ज्यादातर हावी रहते हैं। इसका साक्ष्य यह है कि 1996 के बाद गठबंधन राजनीति के युग की शुरुआत से कांग्रेस और भाजपा, दोनों को अलग-अलग औसतन 160 से 170 सीटें ही मिली हैं। फिर एआईडीएमके / डीएमके, बसपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, जद (यू), अकाली दल, शिवसेना और तेलुगू देशम पार्टी जैसे दलों की चिंताएं लोकसभा चुनावों में भी क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर ही होती हैं।
साफ है कि मोदी भारतीय राजनीति की इस प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। लोकसभा चुनावों में भाजपा को जिस तरह से 282 सीटें मिली, उससे पता चलता है कि उन्हें इस दिशा में कुछ कामयाबी मिली है। मगर मोदी राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्रीकरण की प्रक्रिया को उलटने से एक कदम आगे बढ़ते हुए स्थानीय राजनीति को राष्ट्रीय रूप-रंग देने की कोशिश में हैं। इसके लिए समावेशी आर्थिक विकास पर आधारित एक उभरती हुई ताकत के रूप में भारत को लेकर वह अपना नजरिया पेश कर रहे हैं। हालांकि यह रणनीति नई नहीं है, मगर फिलहाल तो मोदी बहुत से विचारों पर मौलिक का ठप्पा लगाने की जुगत में दिख रहे हैं। शायद इसीलिए महाराष्ट्र चुनावों के दौरान भी मेडिसन स्क्वॉयर के अपने भाषण को प्रदर्शित करने का उन्होंने फैसला किया। कांग्रेस तो विधानसभा चुनाव में अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका की कामयाब यात्रा पर फोकस करने की सोच भी नहीं सकती थी। हां, इंदिरा गांधी और नेहरू का विदेश नीति को लेकर नजरिया कभी-कभी स्थानीय चुनावों में भी जरूर दिखता था। शायद इस संदर्भ में मोदी कांग्रेस के पुराने नेताओं से ही प्रेरणा ले रहे हैं।
दरअसल, मोदी राज्यों के चुनावों में अपना राष्ट्रीय, या यूं कहें कि राष्ट्रवादी नजरिया सामने ला रहे हैं। मगर सवाल उठता है कि क्या इस राजनीतिक रणनीति से मोदी को कोई दीर्घकालीन फायदा होगा। जवाब के लिए शायद दो से तीन वर्ष का इंतजार करना होगा। वैसे झारखंड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखना भी दिलचस्प होगा, कि क्या मोदी महाराष्ट्र और हरियाणा जैसी कामयाबी दोहरा पाते हैं। हालांकि इस रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी, जहां, भाजपा के पास राज्य स्तर का कोई भी लोकप्रिय नेता नहीं है। इस तरह से देखें, तो उत्तर प्रदेश और बिहार में, जहां की राजनीति मंडल आंदोलन के बाद पूरी तरह से विखंडित और क्षेत्रीकृत हो गई, मोदी की असल परीक्षा होगी। दोनों राज्यों में भाजपा के पास कोई मजबूत स्थानीय नेता नहीं है, इसलिए मोदी को फिर से पूरे अभियान को अपनी छवि पर केंद्रित करना होगा, जैसाकि उन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा में किया।
अगर मोदी ऐसा करने में कामयाब हो गए, तो यह भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। मगर सवाल है कि क्या मोदी अपनी लोकप्रियता को ऐसे ही बरकरार रख पाएंगे, खासकर सभी जातियों और समुदायों के युवा मतदाताओं के बीच। समय के साथ उन्हें विकास के उन वायदों की कसौटी पर कसा जाएगा, जो उन्होंने किए हैं, और जिन्हें पूरा करना वाकई मुश्किल है। सवाल यह भी है कि क्या कुछ चुनींदा वायदों को पूरा करने से वह अपनी लोकप्रियता बचा पाएंगे। सच तो यह है कि मोदी ने अपने लिए ऐसी मुश्किल चुनौती खड़ी कर ली है, जो काफी हद तक खुद उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है।