मैंने खुद से वायदा किया था कि मैं यह नहीं करूंगा, मगर मैंने ऐसा किया। हुआ यों कि पिछले हफ्ते वाशिंगटन डीसी से डलास जाने के दौरान जैसे ही मैंने यह खबर सुनी कि इबोला से संक्रमित एक नर्स को बुखार के दौरान हवाई यात्रा की अनुमति दी गई है, मैं वापस लौट आया और स्टीफन किंग का उपन्यास द स्टैंड का शुरुआती पन्ना पढ़ने लगा। किंग के इस उपन्यास में, एक सुपरफ्लू, जिससे संक्रमित व्यक्ति में मृत्यु की आशंका 99.4 प्रतिशत होती है, दुर्घटनावश रेगिस्तान की एक प्रयोगशाला से बाहर निकल आता है और पूरी सभ्यता को बर्बाद कर देता है। राजा होने के नाते किंग बचे लोगों के लिए अलौकिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। लेखक ने किताब में फ्लू की भयावहता का जिस तरह वर्णन किया है, वह पठनीय है।
जिस समय राष्ट्रीय स्तर पर सीमा के भीतर इबोला से निपटने की बेचैनी है, तब स्टीफन किंग के उपन्यास को पढ़ने से महसूस होता है कि राजा द्वारा संकट का सामना करने और हमारे मौजूदा डर के बीच अंतर और समानताएं भी हैं। समानताएं दरअसल सरकारी अक्षमता से जुड़ी हैं। किंग का सुपरफ्लू इसलिए बाहर निकल आया, क्योंकि सुरक्षा के कई कंप्यूटरीकृत उपाय विफल साबित हुए थे, जबकि अभी इबोला इसलिए फैल रहा है, क्योंकि अमेरिका की अंतरराज्यीय एजेंसी में काफी अराजकताएं हैं। वह सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल पर निर्भर रही, जिसके सुरक्षात्मक उपाय बाद में नाकाफी साबित हुए। डलास में इबोला संक्रमण से निपटने का तरीका कुछ यों था-मरीज को जांचे बिना घर भेज देना, अस्पताल की अधूरी तैयारी और संक्रमित नर्सें, सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की अजीब सुस्ती, राजनीतिक दोषारोपण और फिर इबोला से निपटने के लिए एक राजनीतिक नियुक्ति। लेकिन सुपरफ्लू और इबोला में अंतर भी बहुत मजेदार है। किंग के उपन्यास में राजा को लगातार बड़ी गलतियां करते दिखाया गया है, फिर भी तानाशाही की हद तक विध्वंसकारी है; वह इतना शातिर है कि लगभग पूरी मानवता को खत्म करने का औजार तैयार कर लेता है और मार्शल लॉ और हत्याओं के जरिये मीडिया रिपोर्टों पर अंकुश लगाने में सक्षम है।
अब जरा वास्तविक धरातल पर आएं। इराक युद्ध से लेकर कटरीना तूफान और ओबामा के कार्यकाल की अन्य नाकामियों को देखें, तो जनता षड्यंत्रों से अधिक भयभीत सरकारी अक्षमता से रहती आई है। इबोला में भी कई षड्यंत्रकारी सिद्धांत देखे जा सकते हैं, पर इससे निपटने के लिए शरीर ढकने वाले बैग खरीदने और इस मुद्दे पर पत्रकारों को खामोश रखने जैसे सरकारी प्रयास हास्यास्पद हैं। बुनियादी चिंता नौकरशाही की अक्षमता पर है, जिसे लापरवाही ने और अक्षम्य बना दिया। दकियानूस नौकरशाही में लगातार यह आशंका है कि एक उदार प्रशासन इबोला को फैलने देने से रोकने के लिए यात्राओं पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा। अगर यात्रा प्रतिबंध जैसी मांगों को खारिज करते हुए भी हम घरेलू स्तर पर इबोला को रोकने में सफल होते हैं, तो इससे ओबामा की छवि और मजबूत ही होगी। पर हमारी नाकामियों को देखते हुए ऐसे चमत्कार की उम्मीद कम है। ऐसे में, देर-सबेर यात्रा पर प्रतिबंध लग जाए, तो आश्चर्य नहीं।