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उठेंगे साथ-साथ, गिरेंगे साथ-साथ

Sat, 27 Dec 2014 02:32 AM IST
मदन मोहन मालवीय
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देशभक्ति का तकाजा है कि हम बगैर किसी भेदभाव के सभी देशवासियों का भला चाहें। महान गुरु वेद व्यास ने सदियों पुरानी प्रार्थना की इन पंक्तियों के जरिये सभी धर्मों को मानने वालों और देशभक्तों का आह्वान किया।
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सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दु:खभाग भवेत्।

यही वह आदर्श है, जिसे कांग्रेस ने अपने उद्भव के समय से ही हमारे सामने रखा। हिंदू धर्म पर मेरा विश्वास है। मगर जब मैं यह कहता हूं कि दुनिया की सारी दौलत भी मुझे अपने विश्वास को बदलने पर मजबूर नहीं कर सकती, तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरे मन में दूसरे धर्मों के लिए कोई असम्मान है। मैं एक झूठा हिंदू होऊंगा, और ब्राह्मण कहलाने लायक भी नहीं होऊंगा, गर मैं मुसलमानों, ईसाइयों या भारत में रहने वाले किसी दूसरे समुदाय की तुलना में हिंदुओं या ब्राह्मणों के लिए अनुचित लाभ की इच्छा रखूं।

इतिहास के बेहद नाजुक मोड़ पर मुस्लिम लीग के हमारे भाइयों ने अपने सांप्रदायिक आक्रोश से उस राष्ट्रीय प्रगति को पीछे धकेल दिया है, जिसकी हम वर्षों से कोशिश कर रहे थे। अतीत को तो बदला जा नहीं सकता, ऐसे में इसे लेकर झल्लाहट कोई अच्छी बात नहीं है। क्यों न उसे भूलने की कोशिश करें। राहत की बात है कि उनमें से कई लोग मानते हैं कि उनसे गलती हुई है। कइयों को यह भी एहसास है कि एक समुदाय के कुछ लोगों द्वारा उठाए गए तुच्छ फायदों पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए, जब व्यापक राष्ट्रीय हित दांव पर लगे हों। अगर कुछ हिंदू, कुछ मुसलमानों से ज्यादा फायदा उठा ले जाएं, या कुछ मुसलमान, हिंदुओं की तुलना में अपने ज्यादा हित साध्ा लें, तो पूरे भारत के लिए इसका भला क्या मतलब हो सकता है? देशभक्ति के उस मूल्य के बारे में सोच कर ही फक्र होता है कि हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई भाइयों की तरह कंधे से कंधा मिलाकर देश के व्यापक हित में काम कर रहे हों। इसके बरक्स उस स्थिति को सोच कर ही शर्म आती है, जिसमें किसी वर्ग विशेष या संप्रदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए बाकी सभी समुदायों की अनदेखी की जाए। मैं अपने भाइयों से आह्वान करता हूं कि अलगाववादी सोच से हम अपने राष्ट्रीय जीवन को बेहतर नहीं बना सकते। हम उठेंगे साथ-साथ, और गिरेंगे भी साथ-साथ।
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मैं अपने हिंदू भाइयों से भी दो शब्द कहना चाहूंगा। मैं यह भी साफ करना चाहूंगा कि मेरे इन शब्दों का उद्देश्य महज यही है कि दोनों महान समुदायों में बेहतर समझ विकसित हो। मुस्लिम लीग के हमारे भाइयों की जैसी गतिविधियां रही हैं, और इस दौरान उनकी ओर से जैसी कड़वी बातें कही गईं, उससे पूरे देश में, खासकर पंजाब और संयुक्त प्रांत में हिंदू और मुसलमानों के बीच दरार बढ़ती गई है। जवाब में कुछ हिंदू भाइयों ने भी साझे राष्ट्रीय जीवन के ख्वाब से किनारा करते हुए अपने संकीर्ण हितों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। जो हिंदू भाई कांग्रेस पर सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं, उनसे मैं पूछना चाहूंगा कि आखिर कांग्रेस ने अब तक हिंदुओं के साथ क्या अन्याय किया है। कांग्रेस की नीतियों में हिंदू और दूसरे समुदायों के हितों का बराबर ख्याल रखा गया है। कुछ मामलों में अगर मुस्लिम भाइयों के प्रति थोड़ा झुकाव दिखाया गया है, तो उसकी वजह सिर्फ यह है कि उन्हें हिंदुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे आने के लिए प्रेरित किया जा सके।

फिर भी अगर एक मुसलमान, हिंदू या ईसाई अपनी योग्यता के आधार पर सार्वजनिक पद पर नियुक्त होता है, तो इसमें किसी को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। हां, अगर नियुक्ति का आधार योग्यता न हो, तो ऐसी नियुक्ति पाने वाला शख्स, चाहे वह हिंदू हो, या किसी दूसरे समुदाय का, लोगों की शिकायत जायज होगी। मगर फिर भी देश के भविष्य पर भरोसा जताते हुए मुझे उम्मीद है हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों में देशभक्ति और भाईचारे की भावना बढ़ती जाएगी, और आस्थाओं की ये नदियां सभी समुदाय के लोगों को साथ में जोड़ते हुए एक महान राष्ट्र का निर्माण करेंगी, और इसी की बदौलत भारत का नाम पूरी दुनिया में इज्जत से लिया जाएगा।
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