अधिकांश पाकिस्तानी जैनियों के बारे में अनजान हैं, क्योंकि इस समुदाय के लोग उतने चर्चित नहीं हैं, जितने कि अन्य गैर मुस्लिम नागरिक। मैंने भारत के एक प्रवास के दौरान कुछ जैनियों से मुलाकात की थी। उनसे उनके धर्म और उनकी प्रथाओं के बारे में जानना आकर्षक लगा था, जिसे उन्होंने इस आधुनिक युग में भी संरक्षित रखा है। अम्मद अली बताते हैं कि स्थानीय मौखिक इतिहासकारों ने गौर किया कि विभाजन के बाद यहां रह गए जैन समुदाय के लोग 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान छोड़कर भारत चले गए। यहां से जाने वाले जैनियों ने इन प्रतिमाओं को नगरपारकर में सुरक्षित रखने के लिए जमीन में दबा दिया था। पुराविदों द्वारा और नई खोज करने पर मैं अमर उजाला के पाठकों को उनसे अवगत कराती रहूंगी, क्योंकि सिंध के इस समृद्ध, ऐतिहासिक और धार्मिक हिस्से की खोज आकर्षक है, जहां कभी जैन समुदाय के लोग शांति से रहते थे और पूजा करते थे।
बहरहाल, मैं पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) तथा पाकिस्तान के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) कमर बाजवा के बीच चल रही नई जुबानी जंग के बारे में बताना चाहती हूं। हर दिन ये दोनों मीडिया से बात करते हैं और अधिकांश पाकिस्तानियों को हंसने का अच्छा मसाला मिल रहा है, क्योंकि इमरान खान के लिए यह तलाक जैसा है, जब एक पूर्व प्रेमी जनरल बाजवा ने उन्हें ठुकरा दिया है। जनरल बाजवा ने उर्दू के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अपने एक पसंदीदा पत्रकार को अपने घर बुलवाया और उसे एक इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने इमरान खान की तीखी आलोचना की। जनरल बाजवा ने अपने इस पूर्व चहेते को 'पाकिस्तान के लिए बेहद खतरनाक करार दिया'। वास्तव में इससे हैरत नहीं हुई, क्योंकि रोजाना यह नाटक नई कड़ी के साथ खेला जा रहा है।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि हर कोई किसी मौजूदा सेना प्रमुख की शक्ति से वाकिफ है कि कैसे वह और उनकी संस्था उनमें निहित शक्ति के साथ लोकतंत्र का मार्गदर्शन करती है और एक निर्वाचित संस्था के सभी राजनीतिक मामलों में अंतिम निर्णय लेती है। लेकिन इसने जनरल बाजवा की विवादास्पद छवि और सत्ता के उनके लालच को भी उजागर किया है, कि कैसे वह एक सेवावृद्धि के साथ छह साल तक पद पर रहने के बाद एक और विस्तार चाह रहे थे। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इससे इनकार कर दिया था और अपने संसद सदस्यों से कहा था कि वह इसकी अनुमति नहीं देंगे और अगर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने उनके दूसरे विस्तार की अनुमति देने का फैसला किया, तो वे उसके विरोध में मतदान करेंगे।
तब तक सत्ता का खेल एक नए सेना प्रमुख को लाने के लिए शुरू हो गया था और प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल एन) के प्रमुख और अपने बड़े भाई नवाज शरीफ के साथ लंदन में कई बार परामर्श किया और यह निर्णय लिया गया कि जनरल बाजवा का समय समाप्त हो गया है और नए सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर होंगे। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और उसके प्रमुख पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने भी जनरल आसिम मुनीर के नाम पर सहमति जताई।
इस हफ्ते इमरान खान ने लाहौर से आह्वान किया कि पाकिस्तानी सेना को जनरल बाजवा पर राजनीतिक हस्तक्षेप और उनकी सरकार को बर्खास्त करने का आरोप लगाते हुए मुकदमा चलाना चाहिए। यह देखना बाकी है कि क्या जनरल आसिम मुनीर और उनके कोर कमांडर इस सुझाव से सहमत होंगे, क्योंकि आमतौर पर जीएचक्यू यानी पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय अपने पूर्व सैन्य प्रमुखों को लेकर अत्यंत सुरक्षात्मक होता है। यह दिवंगत जनरल परवेज मुशर्रफ के मामले में देखा गया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें समन भेजा था, तब उन्हें कैसे देश से बाहर दुबई भेज दिया गया था। जबकि पेशावर हाई कोर्ट ने उन्हें देशद्रोही करार दिया था। हालांकि जीएचक्यू ने जनरल परवेज मुशर्रफ के शव को दुबई से लाने के लिए प्रोटोकॉल प्रदान किया था और उन्हें दफनाने के लिए सुविधा दी थी। जबकि देश का आमतौर पर माहौल पूर्व सैन्य तानाशाह के खिलाफ था और राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया गया था।
लाहौर से खेले जा रहे नाटक को देखते हुए कोई सोच सकता है कि जब इस साल आम चुनाव होंगे, तब क्या जनरल आसिम मुनीर और कोर कमांडर उसमें दखल देने से खुद को रोक पाएंगे और तटस्थ रहते हुए निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की इजाजत देंगे। जनरल बाजवा ने 2021 में एक पत्रकार से कहा था कि 90 फीसदी सैन्य अधिकारी पुराने नेतृत्व यानी नवाज शरीफ और आसिफ अली जरदारी की वापसी के खिलाफ थे। 2018 के चुनाव में उनके दखल देने और इमरान खान को सत्ता में लाने की एक बड़ी वजह थी, जो कि संसद में मामूली बहुमत हासिल कर सके थे। उससे पहले बीस बरसों तक इमरान खान संसद की कुछ ही सीटें हासिल कर पाते थे।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, 'दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने इस अनुभव से कोई सबक नहीं सीखा है और वह सैन्य मुख्यालय के शतरंज के खेल में प्यादा बनने को तैयार है। ऐसे समय जब देश अनेक संकटों का सामना कर रहा है, राजनेता बेमतलब के सत्ता के खेल में उलझे हुए हैं। व्यवस्था को बचाने के लिए एक साथ आने के बजाय वरिष्ठ राजनेता अपने संकीर्ण हितों से बाहर नहीं देखना चाहते।'