कोविड महामारी और केंद्र से मिलने वाले केंद्रीय कर का हिस्सा न मिलने के कारण राज्य सरकार पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रही है। हजारों शरणार्थियों के आवास, भोजन और अन्य व्यय पर राज्य सरकार को तीन करोड़ रुपये हर महीने खर्च करने पड़ रहे हैं, जिसके चलते बहुत से सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन का समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है। पड़ोसी देश म्यांमार में उपजे राजनीतिक संकट के चलते हमारे देश में हजारों शरणार्थी अभी आम लोगों के रहम पर अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं। गौरतलब है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास किसी भी विदेशी को 'शरणार्थी' का दर्जा देने की शक्ति नहीं है। यही नहीं, भारत ने 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन और इसके 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
हमारे यहां शरणार्थी बनकर रह रहे इन लोगों में कई तो वहां की पुलिस और अन्य सरकारी सेवाओं के लोग हैं, जिन्होंने सैन्य तख्तापलट का विरोध किया था। अब जब म्यांमार की सेना हर विरोधी को मारने पर उतारू है, तो वे अपनी जान बचाने के लिए भारत आ गए। लेकिन पूर्वोत्तर भारत में म्यांमार से आए शरणार्थियों का संकट बढ़ रहा है। उधर असम में म्यांमार की अवैध सुपारी की तस्करी बढ़ गई है और इलाके में सक्रिय अलगाववादी समूह म्यांमार के रास्ते चीन से इमदाद पाने में इन शरणार्थियों की आड़ ले रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय कई अलगाववादी संगठनों के शिविर और ठिकाने म्यांमार में ही हैं और चीन के रास्ते उन्हें मदद मिलती है। ऐसे में असली शरणार्थी और संदिग्ध में अंतर कर पाने का कोई तंत्र विकसित हो नहीं पाया है, जो देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा हो सकता है।
म्यांमार से आ रहे शरणार्थियों का यह जत्था, जिसमें ज्यादातर गैर-मुस्लिम शरणार्थी हैं, केंद्र सरकार के लिए दुविधा बना हुआ है। असल में केंद्र सरकार नहीं चाहती कि म्यांमार से कोई भी शरणार्थी यहां आकर बसे, क्योंकि रोहिंग्या के मामले में केंद्र का नजरिया स्पष्ट है। ऐसे में यदि इन नए आगंतुकों का स्वागत किया जाता है, तो धार्मिक आधार पर शरणार्थियों से भेदभाव करने के आरोप लगेंगे और दुनिया भर में भारत की किरकिरी हो सकती है।
उधर मिजोरम के सबसे बड़े नागरिक समाज संगठन यंग मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) के बैनर तले सैकड़ों लोगों ने बांग्लादेश से जातीय कुकी-चिन (मिजो) शरणार्थियों को प्रवेश से कथित इनकार के विरोध में प्रदर्शन किया। ध्यान रहे कि मिजोरम की कई जनजातियों और सीमाई इलाके के बड़े चिन समुदाय में रोटी-बेटी के ताल्लुकात हैं। मिजोरम के मुख्यमंत्री जोर्नाथान्ग्मा इस बारे में एक खत लिखकर बता चुके हैं कि यह महज म्यांमार का अंदरूनी मामला नहीं रह गया है। यह लगभग बांग्लादेश के उदय के बाद जैसी शरणार्थी समस्या बन चुका है। मिजोरम सरकार केंद्रीय गृह मंत्रालय को स्पष्ट बता चुकी है कि वह म्यांमार में शांति स्थापित होने तक किसी भी शरणार्थी को जबर्दस्ती नहीं निकालेगी।