कुछ चीजें और लोग कच्चे अच्छे लगते हैं, तो कुछ चीजें और लोग पके हुए। तोतली बातें सिर्फ बच्चों की क्यों अच्छी लगती हैं, बड़ों की क्यों नहीं, इस पर अभी तक कोई शोध नहीं हुआ। इसी तरह फेंकना छोटों का अच्छा लगता है, बड़ों का नहीं। लगातार फेंकते रहने पर फेकू की उपाधि मिलती है, और फेंकने की कला भी न आती हो, तो पप्पू कहलाओ।
अब अच्छे दिनों को ही ले लीजिए। हर आदमी तय नहीं कर पा रहा कि उसके दिन कैसे हैं।
अब जब दिन पहले जैसे ही हैं, तो कोई कैसे कहे कि अच्छे दिन आ गए हैं। बल्कि दूसरे लोग बता रहे हैं कि अभी बुरे दिन ही हैं, शनि की ढैया चल रही है। कुछ की साढ़े साती, तो कुछ पर राहु-केतु की वक्र दृष्टि। ज्योतिषी बुरे दिन दूर करने के महंगे उपाय बता रहे हैं। काले तिल, तेल और दान-दक्षिणा से अलग पीपल के नीचे हर शनिवार को तेल का दीया जलाना, गौ माता की सेवा, चींटियों को भोजन, बंदरों को गुड़-चना। यानी जो कहे सो करने को तैयार। बस आने चाहिए अच्छे दिन। बुरे दिन सिर्फ दुश्मनों के हिस्से।
हमारे मुहल्ले में अखंड रामायण पाठ और जागरण से जिनके कान पक चुके हैं, उन्हें भी अच्छे दिनों के निरंतर जाप की आदत पड़ चुकी होगी। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ेगा। इन अखंड पाठों में मुहल्लों के बूढ़े मार्गदर्शकों की बड़ी भूमिका है।
मार्गदर्शक वरिष्ठ नागरिकों को वैसे भी गरिष्ठ होना चाहिए। वर्ना उनकी बात कोई क्यों सुनेगा। यह अलग बात है कि अच्छे दिन लाने वाले अपने वरिष्ठ मार्गदर्शकों की बात नहीं सुनते। लेकिन मुहल्ला कोई सरकार तो है नहीं कि यहां एक ही आदमी की चलेगी। यहां तो हर गली का आदमी खुद को प्रधानमंत्री समझता है। ऐसे में दिन को रामायण पाठ और रात को जागरण से कान पकने के बावजूद गली के लोग चुप हैं, तो इसलिए कि उनका मार्गदर्शक उन्हें इसके लिए मना चुका है। ठीक है, कान पक गए हैं, पर फ्री के प्रसाद और पुण्य के साथ अच्छे दिनों का भोला विश्वास भी हो, तो कुछ रतजगों से आखिर नुकसान ही क्या है?