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मतदाता के साथ मेरे प्रयोग

Fri, 16 Oct 2015 01:12 AM IST
शरद उपाध्याय
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मैं मतदाता को लेकर चकित हूं। लोकतंत्र की प्रयोगशाला में मैं नाना प्रकार की सामग्री लेकर बैठा हूं, लगातार प्रयोग कर रहा हूं, पर कोई परिणाम सामने नहीं आ रहा। मैंने मतदाता को बीकर में डाल रखा है।
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कभी उस पर वायदों का पाउडर छिड़कता हूं, कभी उस पर सांप्रदायिकता का एसिड डालता हूं, कभी जातिवाद का फास्फोरस छिड़कता हूं, तो कभी पैसे-मदिरा का इंजेक्शन लगाता हूं। वह प्रत्येक प्रयोग पर हिलता-डुलता जरूर है। जब भी कोई अनर्गल प्रलाप उसके कान में पड़ता है, तो वह हरकत में आ जाता है। लेकिन वह किस करवट बैठेगा, कुछ समझ में नहीं आता।

ऐसे में मैं असमंजस में हूं। मीडिया असमंजस में है। मतदाता की अंतरात्मा कौन-से केमिकल से जागेगी? मैंने लोकतांत्रिक बीकर में एक पार्टी का रुपया डाला, मतदाता ने उसे झट से ले लिया। मुझे लगा, मेरा प्रयोग सफल हो गया।
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मैंने दूसरी पार्टी के नाम रुपया डाला, उसने उसे भी रख लिया। मैंने कुछ अल्कोहल की बूंदें दोनों तरफ से डालीं, उसने निरपेक्ष भाव से दोनों ओर से ग्रहण कर डाली। मैंने कुछ विकास की बातें की, तो वह खुश हुआ।

दूसरी ओर, जाति की बात पर भी उसने हरकत की। मैंने उसे गौ माता की विचलित कर देने वाली तस्वीरें भी दिखलाई, धर्म की अफीम का डोज भी दिया। लेकिन उसकी तरफ से कोई स्पष्ट संदेश नहीं आया कि वह किसे वोट देने वाला है।
मैं हार नहीं मान रहा। प्रयोग लगातार जारी रखे हुए हूं।

आखिर मतदाता कब सजग होगा? उसकी अंतरात्मा की मोटी चमड़ी सांप्रदायिक और जातिवाद के रिएक्शन से कब मुक्त होगी? कब वह मुफ्त के प्रलोभनों से अपने को आजाद कर सकेगा? मैं उम्मीद से हूं। अब तो इतने साल हो गए। भारतीय राजनीति से वह इतनी राजनीति तो सीख ही गया है कि आसानी से समझ में आने वाला नहीं है।
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फिर भी मैं उम्मीद से हूं। ईमानदारी का केमिकल मैं मतदाता पर उछालता हूं। क्या पता उसकी अंतरात्मा में समझ का कोई सूराख ही पैदा हो जाए!

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