ऋतुराज एक पल का-बुद्धिनाथ मिश्र
भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-110003 ,मूल्य 140 रुपए
नवगीत अपने युग से कदमताल करने वाला काव्य है। इन गीतों में सरलता और सादगी के साथ जीवन की निश्छल ताजगी बसी होती है। मगर इसके नयेपन में सामाजिक विसंगतियां, कुंठा, संत्रास, एकाकीपन, मूल्यहीनता और निरर्थकताबोध का यथार्थवादी स्वर भी मुखर होता नजर आता है।
हालांकि, नवगीतों में आजादी के बाद के अन्य काव्य आंदोलनों की तरह ठेठ शुष्क व कठोर जमीन पर कविता कहने की परिपाटी नहीं है। इनमें जीवन के अनुभव गेय रूपों में पिरोए हुए होते हैं। इन गीतों में पारंपरिक और आधुनिक काव्य रूपों का गजब का समावेश होता है। रचना की जमीन के लिए कहीं कोई बंदिश नहीं है।
तभी तो ऐसे समय में जब अतुकांत, लय से बहकी हुई, बेछंद शैली में गद्य को आड़े-तिरछे प्रस्तुत करके कविता कहने की परंपरा चल निकली हो, उसमें जाने-माने प्रतिनिधि गीत कवि बुद्धिनाथ मिश्र का गीतिकाव्य संग्रह ‘ऋतुराज एक पल का’ मन को बेहद सुकून दे जाता है। इनकी गेय कविताओं में जीवन की धूप-छांव, संघर्ष व इंसान के ओस से भीगे सपनों के बाद ही प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य आते हैं, जिनसे जिंदगी को संघर्ष से जूझने वाली अक्षय ऊष्मा हासिल होती है।
इसके अलावा इन गीतों में प्रयोगवादी कविताओं के नैराश्य और पलायन के बजाय जीवन के प्रति एक खास किस्म का लगाव दिखाई देता है, जो जीवन में हर पतझड़ के बाद ऋतुराज यानी बसंत के आगमन का प्रतीक है। उपमा, अलंकारों के बजाय नए-नए बिंबों और प्रतीकों के सहारे गढ़े गए इन गीतों में जीवन में हर हाल में मुस्कुराने की ललक है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि बुद्धिनाथ की रचनाओं में जिंदगी के कड़वे सच से दूरी बनाकर रखी गई हो। उनके गीतों में आम आदमी के सपने आंसू की चादर ओढे़ हुए हैं। संग्रह का एक गीत ‘फटेहाल भारत’ की बानगी है-‘फटेहाल भारत ने जब भी अर्ज किया दुखड़ा, नए इंडिया ने गुस्साकर फेर लिया मुखड़ा।’ और जनवादी चेतना तो इनमें सहज रूप में मुखर हुई है, क्योंकि उनके गीतों का इंसान जब भी जागता है तो धरती भी जागती है।
कतरा-कतरा जिंदगी का हरेक पल उनके गीतों में नजर आता है जो अनायास नहीं है। यहां प्रकृति अगर आती भी है, तो उसके सौंदर्य से ज्यादा रचनाकार को उसे सहेजने और संवारने की चिंता है। जैसे देवदार कविता में- ‘जंगल से आया है समाचार। कट जाएंगे सारे देवदार।’ लोकतंत्र पर उनकी व्यंग्यात्मक कविताओं का तेवर तो देखते ही बनता है। जनप्रतिनिधियों के बारे में यह कविता-‘पहले तुम था, आप हुआ फिर, अब हो गया हुजूर.....।
हर चुनाव के बाद आम मतदाता गया छला। जिसकी पूंछ उठाकर देखा, वही मादा निकला।’ इन व्यंग्यों की धार कहीं-कहीं इतनी तीखी हो गई है कि वे धूमिल की रचनाओं जैसे पैनापन लिए हुए नजर आती हैं। आज समय इतनी तेजी से भाग रहा है, उसमें बहुत कुछ पीछे छूटा जा रहा है। इतना कि कुछ ठहरकर किसी अहसास को महसूस करने की भी फुरसत नहीं है। खुद रचनाकार के शब्दों में ‘पैदा होकर खडे़ हो गए मेरे गीत, बछडे़ जैसे बडे़ हो गए मेरे गीत’।