चुनावी राजनीति में व्यवहार्यता और दृश्यता के दबाव में विचारधारा हमेशा नेपथ्य में जाती रही है।
देश में वैकल्पिक पार्टियां तो बहुतायत में आईं, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति से अलग वैकल्पिक राजनीति कोई नहीं दे पाया- जिसकी इस देश को हमेशा से दरकार रही।
इसलिए जब दिल्ली के चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की सफलता को चुनाव विश्लेषक और कई लोग उसे मिलने वाली संभावित सीटों और वोटों के प्रतिशत से नाप रहे हैं, तब देश के दूरदराज के इलाकों में जमीनी स्तर पर लोगों के बीच जनांदोलनों से राजनीति का काम कर रहे मेरे जैसे सैकड़ों कार्यकर्ता की सफलता का मापदंड विचारधारा का फैलाव होगा, वोट नहीं।
वैकल्पिक राजनीति विचारधारा के फैलाव से पनपती है, वोटों के पैमाने से तो वैकल्पिक पार्टी भर निकलती है।
आप ने अपनी वैचारिक नींव पक्की करने या उम्मीदवार को विचारधारा के मापदंड पर परखे बिना, उसकी ऊपरी छवि को अपना मुख्य बिंदु बनाया। और, इसमें उम्मीदवार से ज्यादा अरविंद केजरीवाल की ईमानदार छवि और भ्रष्टाचार की मुखालफत मुख्य मुद्दा था, जबकि छवि को विचार से ऊपर रखने से नींव पक्की नहीं होती है और पार्टी में टिकाऊपन नहीं होता है। लोहिया के सहयोगी रहे समाजवादी चिंतक किशन पटनायक कहते थे, भ्रष्टाचार की मुखालफत के लिए एक वैकल्पिक पार्टी भर बना लेने से वैकल्पिक राजनीति नहीं आती।
वैकल्पिक राजनीति में वोट तो सिर्फ एक अंग भर होगा, उसमें सतत संघर्ष और निर्माण की एक अहम भूमिका होगी; वह मूल्यों पर आधारित होगी। वैकल्पिक राजनीति का मूलमंत्र है- लोकोन्मुखी सरकार, जो हर व्यक्ति को सामान अधिकार दे और आर्थिक, सामाजिक, लिंग, वर्ग, भाषा- हर तरह की गैरबराबरी का अंत करे।
यह राजनीति देश के सूदूर इलाकों में आदिवासी, दलित, मजदूर, किसानों, महिलाओं के अन्याय के खिलाफ जारी जनांदोलनों से उपजी ऊर्जा से निर्मित होगी। इसमें शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के सहयोग और सक्रिय भागीदारी की जरूरत भी होगी- जिसके लिए उन्हें अपने करियर की फिक्र छोड़ देश के दूरस्थ इलाकों में बदलाव के काम का सघन क्षेत्र बनाना होगा।
इसलिए आपातकाल के बाद जब सारा देश जनता पार्टी के प्रयोग से उत्साहित था- या यों कहें कि आजादी के बाद पहली बार राजनीतिक भूचाल से गुजर रहा था, देश की गली-गली में क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या युवा, सबने हिस्सेदारी निभाई।
ऐसे दौर में किशन पटनायक ने इस प्रयोग से दूर रहने का निर्णय लिया। उनका यह निर्णय उस समय की एक भयंकर भूल, अहं या बेवकूफी मानी गई होगी, पर अंततः वह सही साबित हुए।
भ्रष्टाचार की मुखालफत के रास्ते नई पार्टी बना सत्ता पलट का प्रयास पहली बार नहीं किया गया है। लगभग हर 20 साल में ऐसा होता है, जब जनता भ्रष्टाचार से ऊब जाती है, तो वह मुख्य स्थापित पार्टियों से अलग साफ छवि के नेताओं को चाहती है, ऐसे में एक नया समूह आगे आता है।
1977 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी के नाम से, और 1989 में वी पी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा के नाम से देश के स्तर पर यह प्रयोग हुआ था। जेपी का प्रयोग तो अतुलनीय था। उस प्रयोग की राजनीति के गर्भ से निकले मुलायम, लालू और नीतीश को काफी हद तक पिछड़ों की राजनीति करने का श्रेय दिया जा सकता है- उन्होंने कांग्रेस और भाजपा का विकल्प जरूर दिया, मगर वे वैकल्पिक राजनीति देने में विफल रहे। वहीं वी पी सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे का हाल भी कोई जुदा नहीं रहा।
इस सबसे अलग किशन पटनायक ने जनसंगठनों के जरिये लोगों को जागरूक करने के लिए 1980 में संगठन बनाया, और फिर 15 साल तक लोगों के बीच जनांदोलन का काम करने के बाद 1995 में देश के अन्य जनसंगठन के साथ मिलकर समाजवादी जन परिषद् (सजप) नामक पार्टी बनाई।
लेकिन आम आदमी पार्टी के इस दौर में एक बार फिर दिल्ली से दूर, देश के दूरस्थ इलाकों में काम रही सजप अव्यावहारिक-सी दिखाई देती है! इस बात को राजनीतिक विश्लेषक और आप के सिद्धांतकार योगेंद्र यादव के शब्दों में कहें, तो जनांदोलनों की राजनीति को जो व्यवहार्यता और दृश्यता 30 साल के अपने काम में किशन पटनायाक सजप को नहीं दे पाए, वह आप ने दी।
यह भी सही है कि पार्टी के अंदर एक व्यक्ति की प्रसिद्धि पार्टी को आगे बढ़ाने में मदद देती है, लेकिन इससे कालांतर में व्यक्ति प्रमुख और पार्टी गौण हो जाती है। फिर लोग पार्टी को उसकी विचारधारा से नहीं, नेता के नाम से जानते हैं। मुलायम, लालू, मायावती की तरह आप केजरीवाल की पार्टी की तरह जानी जाने लगी।
मैं सजप का अनुभव साझा कर रहा हूं। हम लोग पिछले तीन विधानसभा चुनावों से मध्य प्रदेश के हरदा, घोड़ाडोंगरी, सिवनी-मालवा और टिमरनी विधानसभा क्षेत्र में हिस्सेदारी कर रहे हैं।
इसमें सजप की बड़ी उपलब्धि है, दबे हुए तबके को बदलाव की राजनीति में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना; उन्हें एहसास कराना कि दूसरे के कहने से वोट देना भर उसका काम नहीं है, बल्कि अपनी विचारधारा के लिए वोट मांगने का उसे भी बराबरी का हक है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, आदिवासी, दलितों और मजदूरों की बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करना।
ऐसा नहीं है कि सजप के पास ऐसी मध्यवर्गीय संघर्ष की छवि वाले लोग नहीं हैं, जो अरविंद केजरीवाल की तरह मध्यवर्ग और मीडिया को आकर्षित कर सकें।
लेकिन बदलाव की राजनीति में हमें व्यवहार्यता और दृश्यता के दबाव से बाहर आकर विचारधारा पर ध्यान देना होगा। दही के जामन की तरह खुद को बचाए रखना होगा- जमने की जल्दी नहीं करना है, क्योंकि स्थापित राजनीति का दही आज नहीं, तो कल खट्टा होने वाला है।