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विकास का इंजन बनेगा मुद्रा बैंक

Wed, 18 Mar 2015 11:36 PM IST
राजीव चंद्रशेखर
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देश के लोगों ने मई, 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के लिए जो भारी जनादेश दिया, वह यथास्थिति को तोड़ने और बदलाव के लिए था। लोग शासन और राजनीति में बदलाव के साथ आर्थिक ढांचे, विकास और समावेशन की प्रक्रिया में भी परिवर्तन चाहते थे। बेशक मोदी सरकार का पहला बजट यथास्थिति को बरकरार रखने वाला था, लेकिन इस सरकार का पहला पू्र्ण बजट देश की आर्थिक संरचना की नई रूपरेखा खींचने वाला है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना पिरामिड की तरह है, जिसके ऊपर के दो स्तर समृद्ध और मध्य वर्गों के हैं, जबकि निचला स्तर गरीब लोगों का है, जिस पर हमेशा राजनीतिक वर्ग का ध्यान रहता है और जो एक के बाद एक आने वाली सरकारों द्वारा खर्च किए जाने वाले हजारों करोड़ का 'नियत' लाभार्थी है। भ्रष्टाचार और रिसाव के बावजूद विभिन्न कार्यक्रमों पर खर्च मामूली या बिना बदलाव के जारी रहता है। हमारे देश में उद्यम के बजाय पात्रता की बढ़ती संस्कृति ने जड़ जमा लिया है। पर इस बजट ने जन-धन, आधार और मोबाइल (जेएएम यानी जाम) के जरिये इन खर्चों को प्रभावी ढंग से योजनाबद्ध और पुनर्गठित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इन तमाम वर्षों में आर्थिक पिरामिड के एक बड़े हिस्से को ऐसे खर्चों और भूलने की रणनीति के तहत नजरंदाज किया गया। विभिन्न उद्यमों में सैकड़ों करोड़ नौकरी देने और कठिन मेहनत करने वाला आबादी का यह हिस्सा गैर-निगमित या अनौपचारिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

पिछले कुछ दशकों से हमने इस क्षेत्र की कितनी उपेक्षा की है, उसका पता आर्थिक जनगणना सर्वेक्षण, 2012 से चलता है। हमारे देश में 5.77 करोड़ उद्यम हैं, जो 46 करोड़ लोगों के लिए रोजगार पैदा करते हैं। इसमें से 26.2 करोड़ लोग स्वरोजगार करते हैं। आगे के आंकड़े बताते हैं कि लंबे समय से उपेक्षित अनौपचारिक क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें गैर-कृषि कार्यबल का 90 फीसदी हिस्सा शामिल है, जो जीडीपी में 50 फीसदी का योगदान करता है और यह गैर-कृषि जीडीपी का 40 फीसदी है। यह अनौपचारिक जीडीपी प्रत्यक्ष कर के दायरे से लगभग बाहर है और मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में शामिल होने तथा विकास के लिए ऋण या जोखिम पूंजी का उपयोग करने की इसे औपचारिक अनुमति नहीं है। क्रेडिट सुइस की रिपोर्ट के मुताबिक, 'विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, जहां अनौपचारिकता कराधान या नियमों से बचने के लिए सोद्देश्य विकल्प है, भारत में यह ज्यादा संरचनात्मक, सरकार की सीमित पहुंच और विकास के अभाव को प्रतिबिंबित करता है।'
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इस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत की जीडीपी 15 फीसदी तक बढ़ सकती है, यदि अनौपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों को जीडीपी में शामिल किया जाए। फिर सिर्फ चार फीसदी उद्यमी ही संस्थागत ऋण का उपयोग कर पाते हैं, जो उन्हें साहूकारों के पास जाने के लिए मजबूर करता है। गैर-निगमित क्षेत्र को बड़ी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है और बुनियादी ढांचों और आसान कर्ज का अभाव उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। मशीनरी, उपकरण या कच्चे माल की खरीद के लिए उन्हें अक्सर पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के अभाव का सामना करना पड़ता है।

इस अनौपचारिक क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने से व्यवसाय और अर्थव्यवस्था, दोनों को कई लाभ हैं। पिछले छह दशकों से आर्थिक राडार से बाहर की इस बड़ी आबादी की सुध लेना बिल्कुल सही है। बजट में माइक्रो यूनिट डेवलपमेंट रिफाइनांस एजेंसी (मुद्रा) बैंक का प्रस्ताव रखा गया है, जो बीस हजार करोड़ के कोष और 30 हजार करोड़ के ऋण गारंटी कोष के साथ स्थापित किया जाएगा और यह लघुवित्त कंपनियों को ज्यादा कर्ज देने में मददगार होगा।

मुद्रा बैंक कर्ज को बढ़ावा देगा और नकदी की कमी से जूझ रहे घरेलू छोटे व्यवसायों के लिए कर्ज-लागत में कमी करेगा। यह एक ढांचा तैयार करके लघु वित्त संस्थानों को, जो विनिर्माण, व्यापार और सेवा क्षेत्र की छोटी एवं सूक्ष्म व्यावसायिक कारोबार में लगी कंपनियों को कर्ज देने के व्यवसाय में लगी हैं, पुनर्वित्त पूंजी उपलब्ध कराने के साथ उनका नियमन करेगा। यह वित्तीय पारिस्थितिकी का निर्माण एवं विस्तार करेगा, जो गैर बैंकिंग संस्थानों के लिए वित्त एवं पूंजी का स्रोत है। यह अंतिम वित्तदाता से लेकर लघु-सूक्ष्म उद्यमों के लिए पूंजी की लागत भी कम करेगा, जो ज्यादातर अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। हमारे आर्थिक ढांचे के लिए यह बदलाव गहरा और परिवर्तनकारी हो सकता है। यह वित्तरहित को वित्तीय सहायता देगा और देश में उद्यमियों एवं भावी करदाताओं का एक नया पुल तैयार करेगा।

यह माइक्रो फाइनांस को आर्थिक विकास के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है, जिसका लक्ष्य निम्न आय वर्ग के लोगों को लघु व्यवसाय बढ़ाने में मदद करना है, जिनमें से कई व्यवसायों के मालिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे पारंपरिक तौर पर वंचित समुदायों से आते हैं। इस क्षेत्र के करीब 60 फीसदी उद्यमों के मालिक यही लोग हैं। अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाने से टैक्स-जीडीपी अनुपात बढ़ेगा और करदाताओं की संख्या बढ़ेगी, जिससे सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी।

इस नए आर्थिक दर्शन का मूल तत्व जहां हमारी अर्थव्यवस्था के जरूरतमंद उद्यमों को सहायता देना है, वहीं गरीबों एवं जरूरतमंदों को बेहतर ढंग से योजनाबद्ध और समुचित संकल्पना के साथ सामाजिक सुरक्षा ढांचे को जारी रखना है। यह 'मनमोहनोमिक्स' के कॉरपोरेट सेक्टर संचालित विकास युग का अंत और व्यापक एवं गहरे उद्यम एवं उद्यमिता संचालित आर्थिक मॉडल की शुरुआत है। इस सरकार से जिस बदलाव की उम्मीद थी, यह उसी के अनुरूप है।
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-लेखक संसद सदस्य एवं प्रौद्योगिकी उद्यमी हैं।
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