देश में खेती योग्य जमीन लगातार कम हो रही है। पिछले 50 वर्षों में जमीन का रकबा प्रति व्यक्ति 2.63 हेक्टेयर से घटकर 0.8 हेक्टेयर रह गया है। अभी देश में सीमांत किसानों की संख्या लगभग 67 प्रतिशत है, जिनके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है। जबकि लगभग 18 प्रतिशत किसान ऐसे हैं, जिनके पास एक से दो हेक्टेयर जमीन है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक इत्यादि की कीमतों में लगातार इजाफे की वजह से कृषि लागत बढ़ती जा रही है। लिहाजा जरूरत उन तरीकों को अपनाने की है, जिससे कम क्षेत्रफल में भी अधिक पैदावार हो सके। इसके लिए कृषि प्रसार तंत्र को और अधिक सुदृढ़ करना होगा, जिससे किसानों, विशेषकर लघु व सीमांत कृषकों को नवीनतम तकनीकों का लाभ मिल सके।
उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कृषि के क्षेत्र में सराहनीय प्रगति हुई। खाद्यान्न तथा बागवानी के क्षेत्र में देश आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ अब कई कृषि उत्पादों का निर्यात भी कर रहा है। इस प्रगति में किसानों के साथ-साथ भारत सरकार की कृषि नीतियों, वैज्ञानिकों तथा प्रसार विशेषज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी कड़ी में देश के लगभग प्रत्येक जनपद में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य जनपद की कृषि संबंधी समस्याओं का राज्य सरकार के रेखीय विभागों के साथ मिलकर समाधान निकालना है। यह नवीनतम तकनीकों का खेतों मे प्रदर्शन भी करता है और तकनीकी रूप से किसानों को दक्ष भी बनाता है।
कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इन प्रयासों से देश में कृषि प्रसार को प्रभावी बनाने में सहायता मिली है, मगर कृषि के बदलते परिवेश में व्यावसायिक कृषि की अवधारणा को साकार करने के लिए प्रसार तंत्र को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है। लिहाजा कृषि विज्ञान केंद्र को आधुनिक बनाना समय की मांग है। जबकि अभी स्थिति यह है कि कृषि विज्ञान केंद्र के संसाधन अत्यंत सीमित हैं।
12वीं पंचवर्षीय योजना में इन केंद्रों को पर्याप्त बजट आवंटित करने की बात कही गई थी, पर अब तक ऐसा नहीं हो सका है। ऐसे वक्त में, जब नवीनतम तकनीकों के अभाव में लघु व सीमांत किसानों को अपेक्षित आय नहीं मिल रही, इन विज्ञान केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किए जाने की जरूरत है। इससे किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ होगा, क्योंकि खेती से अधिक लाभ कमाने के लिए किसानों को कृषि निवेशों, जैसे बीज, उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्वों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रों की समय पर उपलब्धता की जरूरत है, और यह कार्य राज्य सरकारों के रेखीय विभागों द्वारा किया जाता है। लिहाजा यदि समय पर किसानों को खेती में प्रयोग होने वाले निवेश उपलब्ध करा दिए जाएं, तो पैदावार जरूर बढ़ेगी।
हमें समझना होगा कि कृषि प्रसार किसानों को नवीनतम तकनीकों से जागरूक करने का एक सशक्त माध्यम है। लेकिन इसके साथ ही अनुसंधान संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिकों को भी किसानों की ज्वलंत समस्याओं को ध्यान मे रखकर शोध करना होगा। जरूरत किसानों को स्वयं सहायता समूह बनाकर काम करने की भी है, ताकि वे इन अनुसंधानों से विकसित व्यावहारिक तकनीकों का बड़े स्तर पर प्रयोग कर सकें, और एक 'दुधारू' उद्योग के रूप में कृषि की पुनर्स्थापना कर सकें।
-लेखक कृषि विज्ञान केंद्र, देहरादून के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक हैं।