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मुद्दा: क्या हर मानसून में बारिश ही दोषी है? नई सड़कें धंसने और शहरों के डूबने से निर्माण व्यवस्था पर उठे सवाल

मोनिका चौहान Published by: शिवम गर्ग Updated Sat, 08 Aug 2026 06:52 AM IST

सार

जब नई सड़क पहली ही बारिश में धंस जाए, शहर तालाब बन जाए और करोड़ों रुपये की परियोजनाएं पानी के साथ बहने लगें, तो इसे सिर्फ प्रकृति का प्रकोप नहीं माना जा सकता।
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बारिश से जलभराव - फोटो : अमर उजाला


वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचा, सुशासन और नागरिकों के विश्वास का वचन भी है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने एक्सप्रेसवे, मेट्रो, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और पुलों के निर्माण में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन, आज सबसे बड़ा प्रश्न निर्माण की गति नहीं, गुणवत्ता है। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे इसका ताजा उदाहरण है। हजारों करोड़ रुपये की लागत से बना यह आधुनिक मार्ग उद्घाटन के कुछ ही समय बाद अलग-अलग स्थानों पर धंसने की खबरों के कारण चर्चा में आ गया। जांच बैठी, अभियंताओं पर कार्रवाई हुई, पर क्या केवल निलंबन से जनता का विश्वास लौट आएगा? क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रुक जाएंगी? इन प्रश्नों के उत्तर केवल विभागीय कार्रवाई में नहीं, बल्कि पूरी निर्माण व्यवस्था की समीक्षा में छिपे हैं।


समस्या केवल एक एक्सप्रेसवे की नहीं है। हर मानसून में देश के अलग-अलग राज्यों से नई सड़कें टूटने, पुल क्षतिग्रस्त होने और निर्माणाधीन ढांचों के गिरने की खबरें आती हैं। यदि बारिश हर बार हमारी योजनाओं को विफल कर देती है, तो दोष हमारी तैयारी का है। सौ साल पहले जो रेल पुल, सड़कें और संरचनाएं बनीं, उनमें से अनेक आज भी खड़ी हैं। कोलकाता का हावड़ा ब्रिज, चेन्नई का नेपियर ब्रिज और ब्रिटिश काल के अनेक रेलवे पुल आज भी लाखों लोगों का भार उठा रहे हैं। उनका निर्माण सीमित तकनीक में हुआ था, फिर भी वे समय की कसौटी पर खरे उतरे। हमारे पास आधुनिक मशीनें हैं, उन्नत स्टील है, डिजिटल डिजाइन है, एआई है और विश्वस्तरीय इंजीनियर हैं। फिर भी, यदि नई सड़कें कुछ महीनों में मरम्मत मांगने लगें, तो समस्या तकनीक की नहीं, व्यवस्था की है।


असल में, यहां निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से ज्यादा उद्घाटन की चर्चा ज्यादा होती है। परियोजनाएं समय पर पूरी हों, यह जरूरी है, पर उससे भी आवश्यक यह है कि वे गुणवत्ता की कसौटी पर भी खरी उतरें। एक और गंभीर समस्या शहरों की जल निकासी व्यवस्था है। अतिक्रमण ने प्राकृतिक जल मार्गों को संकरा कर दिया है। नतीजतन, वर्षा का पानी सड़कों पर ठहरता है और उन्हें कमजोर कर देता है। यदि गुणवत्ता से समझौता होता है, मानकों का पालन नहीं होता और दोषियों को समयबद्ध एवं प्रभावी दंड नहीं मिलता, तो सबसे बड़ी कीमत जनता चुकाती है। अब निर्णय हमें करना है कि क्या हम हर मानसून के बाद बहाने खोजते रहेंगे, या फिर ऐसी व्यवस्था बनाएंगे, जहां बारिश सुर्खियां नहीं, बल्कि मजबूत भारत की गवाह बने? असल में, बारिश हमारी तैयारियों की पोल खोलती है।

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