काले धन के खिलाफ कदम उठाने का अर्थव्यवस्था पर चाहे जो भी असर पड़े, लेकिन इसने देश की राजनीति और सार्वजनिक बहस को उत्तेजित किया है। जिस तरह नकदी के अभाव में लोग परेशानी का अनुभव कर रहे हैं और एक एटीएम से दूसरे एटीएम तक पैसा पाने के लिए भागदौड़ कर रहे हैं, ताकि शादी और स्वास्थ्य खर्च के लिए पैसे जुटा सकें, उससे सरकार पर हमले तेज हो गए हैं। इसने विपक्ष को एक स्वर्णिम अवसर उपलब्ध कराया है। लेकिन सवाल है कि विपक्ष इसका कितना और किस तरह लाभ उठा पा रहा है। देश भर में नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को नोटबंदी का विरोध करने के लिए प्रेरित किया और बताया कि कैसे सरकार और भाजपा पर हमले करना है।
विपक्ष की बुनियादी बाधा है कि वह नोटबंदी के पीछे के उद्देश्यों का विरोध नहीं कर सकता। किसी भी तरह की आलोचना से उस पर काला धन रखने वालों और आतंकवादियों आदि के साथ होने का आरोप लग सकता है। इस आक्रामकता ने लोगों की परेशानियों को खत्म नहीं किया है। मोदी का रुख यह है कि उन्होंने अचानक यह फैसला लेकर भ्रष्टचारी, काला धन रखने वाले, आतंकी और काला बाजारी करने वालों को नुकसान पहुंचाया है। सरकार का यह रवैया उसकी ताकत को दर्शाता है, जबकि इसके जवाब में विपक्ष केवल आरोप लगा रहा है।
हर कोई जानता है कि सभी पार्टियां चुनाव के दौरान नकद में लेन-देन करती हैं। पर मोदी और उनकी सरकार दिखाना चाहती है कि वे इसमें शामिल नहीं हैं, सिर्फ नाराज विपक्षी पार्टियां ही ऐसा करती हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री का साथ देकर दोनों के बीच पैदा हुई एक गहरी खाई को पाट दिया है। दरअसल नीतीश अपने वरिष्ठ सहयोगी लालू यादव से परेशान हैं। बिहार और राष्ट्रीय स्तर पर लालू की छवि को देखते हुए नीतीश ने चतुराईपूर्वक लालू के साथ अपने गठबंधन को जोखिम में डाले बगैर पाला बदला है। राजनीतिक रूप से नीतीश सही हैं और लोगों की नजरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ दिखना चाहते हैं। वह जानते हैं कि जब नकदी का संकट खत्म हो जाएगा, तब नोटबंदी देश के लिए फायदेमंद हो सकती है। वह चीजों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर सोचते हैं, क्योंकि मौजूदा दौर के राजनेताओं में वह सबसे ज्यादा शिक्षित और मुखर हैं।
जिस तरह से यह नया समीकरण उभरा है, ऐसे में बाकी विपक्ष के लिए जगह कहां बचती है? विपक्ष के लिए अपना दम दिखाने का यह अच्छा मौका है, पर स्पष्ट है कि वह बंटा हुआ है और रणनीति को लेकर भ्रमित है। कुछ दल तो अपने हितों को देखते हुए काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी निराशा कांग्रेस की तरफ से देखने को मिली है। यदि राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, आनंद शर्मा और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के भाषण को छोड़ दें, तो संसद से बाहर पार्टी अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही है। राहुल गांधी के उभरने का यह अच्छा मौका हो सकता था, पर वह जनता की राजनीति करने के काबिल नहीं हैं। बेशक वह राष्ट्रपति भवन गए और बैंक की कतार में खड़े हुए। पर इसका सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व है। अरविंद केजरीवाल के साथ उन्होंने सरकार या भाजपा के बजाय मोदी पर हमला किया, पर इस आक्रामकता का कोई लाभ नहीं हुआ।
अभी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ धावा बोलना चाहिए था। यह काम ममता बनर्जी कर रही हैं। वह नवंबर में ज्यादातर कोलकाता से बाहर रहीं और नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर डटी रहीं। फिर वह लखनऊ और पटना गईं। चाहे उनका उद्देश्य जो भी रहा हो, पर उन्होंने विपक्ष की जगह हथिया ली। उन्होंने समाजवादियों और लालू प्रसाद के साथ दोस्ती की। नाराज ममता ने नीतीश पर हमला करते हुए बिना नाम लिए उन्हें 'गद्दार' कहा। और जद (यू) ने जवाबी हमला करते हुए कहा कि ममता को चिट फंड और अन्य घोटालों के बारे में जवाब देना होगा। ऐसा लगता है कि बिहार शीघ्र ही नीतीश और लालू के बीच टकराव की ओर बढ़ रहा है। नीतीश ने मोदी की तरफदारी कर अपना रास्ता सुरक्षित बना लिया है। हालांकि अभी यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि नीतीश के नेतृत्व में जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार बनेगी या लालू गठबंधन से बाहर हो जाएंगे।
ममता वाम दल या कांग्रेस के बजाय भाजपा को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानती हैं। यही वजह है कि वह मोदी के प्रति इतनी आक्रामक हैं। ऐसा लगता है कि दोनों नेता बंगाल में एक नए ध्रुवीकरण की तलाश में हैं और ममता इसे अपने तरीके से कर रही हैं। कोलकाता लौटते ही उन्होंने नियमित सैन्य अभ्यास को एक बड़ा मुद्दा बना दिया। उन्होंने दावा किया कि सेना द्वारा कोलकाता पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी गई, जिसे बाद में सेना ने खारिज कर दिया।
ममता ने लोगों को आकर्षित किया है और टीआरपी राजनीति में जीत गई हैं, जिसकी राहुल गांधी निंदा कर रहे हैं, क्योंकि वह इस चाल में विफल हुए हैं। कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के कारण फिर स्पष्ट हो गया है कि राष्ट्रीय स्तर राजनीतिक शून्य उभर रहा है। और इस खाली जगह को क्षेत्रीय दलों द्वारा भरे जाने की आवश्यकता है। कांग्रेस बिहार में गठबंधन कर अपना अस्तित्व बचा पाई और उत्तर प्रदेश में भी ऐसा कर सकती है। पर इस प्रक्रिया में वह कार्यकर्ताओं से लेकर वरिष्ठ नेताओं और ताकतवार सहयोगियों को गंवा रही है।
भारतीय राजनीति का इतिहास है कि जब राष्ट्रीय दल कमजोर होते हैं, तब खाली जगह को क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा भरा जाता है। ऐसा पहली बार संविद प्रयोग के दौरान देखा गया। वर्ष 1977 में भी कई पार्टियां जनता पार्टी के बैनर तले एकजुट हुई थीं, ऐसा फिर 1889-91 और फिर 1996-98 में दिखा था। तो क्या इतिहास अपने को दोहराएगा? यह दीवार पर लिखी इबारत है। अगले वर्ष की शुरुआत में उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव से 2019 के राष्ट्रीय दांव के लिए स्पष्ट संकेत मिलेगा।