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मोदी के पुराने विरोधियों ने अभी तक इस नए दौर को स्वीकारा नहीं है

तवलीन सिंह Published by: तवलीन सिंह Updated Mon, 03 Jun 2019 07:56 AM IST
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फाइल फोटो

पिछले सप्ताह नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के बाद नई सरकार का नया दौर शुरू हुआ है। लेकिन मोदी के पुराने विरोधियों ने अभी तक इस नए दौर को स्वीकारा नहीं है। मोदी से वे उतना ही वैर रखे हुए हैं, जितना उनके पिछले दौर में रखे हुए थे। सो शपथ ग्रहण से पहले ही मोदी पर हमले शुरू हो गए थे। वह प्रधानमंत्री बने भी नहीं थे कि उनके सिर पर चुनाव परिणाम आने के बाद मुसलमानों पर हुए हमलों की दो घटनाएं थोप दी गईं।

इनमें से एक घटना गुरुग्राम की थी, जहां एक मुस्लिम लड़के की टोपी किसी हिंदू लड़के ने जबर्दस्ती उतार दी थी और उसको पाकिस्तान जाने के लिए कहा था। दूसरी घटना बेगुसराय की थी, जहां किसी ने एक व्यक्ति पर सिर्फ इसलिए गोली चलाई, क्योंकि वह मुसलमान था। इन घटनाओं के बाद मोदी के विरोधियों ने ऊंची आवाजों में कहना शुरू कर दिया कि मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के कारण देश में फिर से नफरत फैलने लग गई है।



दिल्ली में मोदी के विरोधियों की एक बड़ी टोली है। इस टोली में बुद्धिजीवी हैं, जाने-माने लेखक और पत्रकार हैं, वामपंथी हैं और कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो कभी भाजपा में थे, लेकिन मोदी से वैर रखते हैं, क्योंकि मोदी ने उनको वह अहमियत नहीं दी है, जिसे वह अपना अधिकार समझते हैं।

इस टोली के कुछ सदस्य पिछले कुछ महीनों से राहुल गांधी के सलाहकार बने रहे। उनको पूरा विश्वास था कि इस बार मोदी सरकार नहीं बनेगी। उनका मानना था कि मोदी इस बार 180 सीटों से ज़्यादा नहीं ला पाएंगे, सो क्षेत्रीय दलों को समर्थन देकर दिल्ली में ऐसी सरकार बनेगी, जो कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर रहेगी। इनको पूरा विश्वास था कि राहुल गांधी का ‘टाइम’ आने वाला है।

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फाइल फोटो
पिछले सप्ताह नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के बाद नई सरकार का नया दौर शुरू हुआ है। लेकिन मोदी के पुराने विरोधियों ने अभी तक इस नए दौर को स्वीकारा नहीं है। मोदी से वे उतना ही वैर रखे हुए हैं, जितना उनके पिछले दौर में रखे हुए थे। सो शपथ ग्रहण से पहले ही मोदी पर हमले शुरू हो गए थे। वह प्रधानमंत्री बने भी नहीं थे कि उनके सिर पर चुनाव परिणाम आने के बाद मुसलमानों पर हुए हमलों की दो घटनाएं थोप दी गईं।

इनमें से एक घटना गुरुग्राम की थी, जहां एक मुस्लिम लड़के की टोपी किसी हिंदू लड़के ने जबर्दस्ती उतार दी थी और उसको पाकिस्तान जाने के लिए कहा था। दूसरी घटना बेगुसराय की थी, जहां किसी ने एक व्यक्ति पर सिर्फ इसलिए गोली चलाई, क्योंकि वह मुसलमान था। इन घटनाओं के बाद मोदी के विरोधियों ने ऊंची आवाजों में कहना शुरू कर दिया कि मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के कारण देश में फिर से नफरत फैलने लग गई है।

दिल्ली में मोदी के विरोधियों की एक बड़ी टोली है। इस टोली में बुद्धिजीवी हैं, जाने-माने लेखक और पत्रकार हैं, वामपंथी हैं और कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो कभी भाजपा में थे, लेकिन मोदी से वैर रखते हैं, क्योंकि मोदी ने उनको वह अहमियत नहीं दी है, जिसे वह अपना अधिकार समझते हैं।

इस टोली के कुछ सदस्य पिछले कुछ महीनों से राहुल गांधी के सलाहकार बने रहे। उनको पूरा विश्वास था कि इस बार मोदी सरकार नहीं बनेगी। उनका मानना था कि मोदी इस बार 180 सीटों से ज़्यादा नहीं ला पाएंगे, सो क्षेत्रीय दलों को समर्थन देकर दिल्ली में ऐसी सरकार बनेगी, जो कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर रहेगी। इनको पूरा विश्वास था कि राहुल गांधी का ‘टाइम’ आने वाला है।

जब ऐसा नहीं हुआ, तो ये लोग खुलकर मोदी से वैर जताने में लग गए हैं। इनमें से कुछ टीवी चर्चाओं में भाग लेने, कुछ अखबारों में लेख लिखने और कुछ दिल्ली में अफवाहें फैलाने का काम कर रहे हैं। इन अफवाहों को सोशल मीडिया द्वारा फैलाया जा रहा है और इनका मुख्य संदेश यही है कि अब देश में लोकतंत्र का अंतिम काल शुरू हो गया है।

यही बात ये लोग मोदी के पहले कार्यकाल में भी कहते आए थे, लेकिन अब अपनी डूबती नाव को देखकर और भी ज्यादा जोश से कहने लग गए हैं। इनकी बातों का असर इतना है कि अमर्त्य सेन जैसे विदेशों में रहने वाले भारतीय भी लिखने लग गए हैं कि भारत में अब लोकतंत्र के बचने की संभावनाएं कम हैं। यानी जो कहानी मोदी के पहले दौर में हमको सुनने को मिली थी, वह फिर से शुरू हो गई है।

पिछली बार यह कहानी तब शुरू हुई थी, जब दिल्ली में कुछ गिरजाघरों पर हमले हुए थे। तब तक मोदी पर इसका दोष लगाया गया, जब तक यह जानकारी नहीं मिली कि इन हमलों के पीछे चोर थे, संघ परिवार के समर्थक नहीं। इस कहानी को नया मोड़ तब दिया गया, जब मुसलमानों और दलितों पर गोरक्षकों ने हमले करने शुरू किए।

हर लिंचिंग का दोष मोदी के सिर थोपा गया और कुछ हद तक दुनिया की नजरों में मोदी की छवि कलंकित हुई भी, क्योंकि मोदी ने मौन रहने का निर्णय लिया। इस बार चुनाव जीतने के बाद मोदी ने अपने पहले भाषण में स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका पूरा इरादा है ‘सबका विश्वास’ जीतने का है, लेकिन उनके विरोधी अभी से उन पर हमले करने के लिए तैयार बैठे हुए हैं। नया दौर बेशक आया है, लेकिन इस नए दौर में भी मोदी के पुराने विरोधी वही हैं, जो उनके पिछले दौर में थे।
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