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दीदी के गढ़ में मोदी का रथ: दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आखिरी चरण में भी बंगाल हिंसा से मुक्त नहीं रहा

अजय बोस
Updated Mon, 20 May 2019 05:37 AM IST
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तृणमूल-भाजपा - फोटो : Amar Ujala

जब तक आप ये पंक्तियां पढ़ रहे होंगे, तब तक सात चरणों में फैला मतदान संपन्न हो चुका होगा। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आखिरी चरण में भी पश्चिम बंगाल हिंसा से मुक्त नहीं रह पाया।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके राजनीतिक सहयोगी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा किए गए आक्रामक प्रयास का नतीजा क्या होगा, यह देखना अभी बाकी है। राज्य के विभिन्न वर्गों में भाजपा के लिए भारी उत्साह देखा गया है। समाज के विभिन्न वर्गों में भाजपा की जो विराट छवि बनी है, कुछ महीने पहले तक उसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। इस परिस्थिति ने बंगाल की योद्धा रानी को रक्षात्मक होने के लिए विवश कर दिया है। इसके बावजूद तृणमूल के परास्त होने की संभावना अभी दूर की कौड़ी लगती है। पिछले दो महीने से निर्बाध, अथक प्रचार अभियान के बावजूद भाजपा 42 संसदीय सीटों में से एक दर्जन से अधिक सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती नहीं दे पाई। ऐसे में, वहां भाजपा को शानदार लाभ शायद ही मिल पाए,  जैसा कि उसके नेता और समर्थक दावा कर रहे हैं।

अलबत्ता यह उस राज्य में भाजपा की असाधारण प्रगति को कम करके आंकना नहीं है, जहां वह एक दशक पहले अस्तित्वहीन थी। वाम दल और कांग्रेस के आभासी पतन (ये दोनों पहले तृणमूल की मुख्य विरोधी पार्टियां थीं) और विशाल वित्तीय संसाधनों के जरिये मोदी और शाह की पार्टी ममता के शासन के विरोधियों में यह चर्चा पैदा कर, कि दिल्ली का दबंग बादशाह ममता को अपदस्थ करना चाहता है, भाजपा के लिए समर्थन बढ़ाने में सक्षम रही है।



यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी मोदी लहर पर सवार भाजपा पश्चिम बंगाल में अपने वोट शेयर को छह फीसदी से लगभग तीन गुना बढ़ाकर 17 फीसदी करने में सक्षम रही थी, लेकिन वह अपनी सीटों की संख्या एक से महज दो करने में ही सफल रही। इस बार के चुनाव में 2014 की तुलना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति देश भर में समर्थन में जहां कमी आई है, वहीं पश्चिम बंगाल में उनके प्रति समर्थन में तेजी आई है। ऐसे में अगर यह धारणा बनी है कि वह दीदी के गढ़ को भेदने वाले हैं, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।

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तृणमूल-भाजपा - फोटो : Amar Ujala
जब तक आप ये पंक्तियां पढ़ रहे होंगे, तब तक सात चरणों में फैला मतदान संपन्न हो चुका होगा। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आखिरी चरण में भी पश्चिम बंगाल हिंसा से मुक्त नहीं रह पाया।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके राजनीतिक सहयोगी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा किए गए आक्रामक प्रयास का नतीजा क्या होगा, यह देखना अभी बाकी है। राज्य के विभिन्न वर्गों में भाजपा के लिए भारी उत्साह देखा गया है। समाज के विभिन्न वर्गों में भाजपा की जो विराट छवि बनी है, कुछ महीने पहले तक उसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। इस परिस्थिति ने बंगाल की योद्धा रानी को रक्षात्मक होने के लिए विवश कर दिया है। इसके बावजूद तृणमूल के परास्त होने की संभावना अभी दूर की कौड़ी लगती है। पिछले दो महीने से निर्बाध, अथक प्रचार अभियान के बावजूद भाजपा 42 संसदीय सीटों में से एक दर्जन से अधिक सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती नहीं दे पाई। ऐसे में, वहां भाजपा को शानदार लाभ शायद ही मिल पाए,  जैसा कि उसके नेता और समर्थक दावा कर रहे हैं।

अलबत्ता यह उस राज्य में भाजपा की असाधारण प्रगति को कम करके आंकना नहीं है, जहां वह एक दशक पहले अस्तित्वहीन थी। वाम दल और कांग्रेस के आभासी पतन (ये दोनों पहले तृणमूल की मुख्य विरोधी पार्टियां थीं) और विशाल वित्तीय संसाधनों के जरिये मोदी और शाह की पार्टी ममता के शासन के विरोधियों में यह चर्चा पैदा कर, कि दिल्ली का दबंग बादशाह ममता को अपदस्थ करना चाहता है, भाजपा के लिए समर्थन बढ़ाने में सक्षम रही है।

यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी मोदी लहर पर सवार भाजपा पश्चिम बंगाल में अपने वोट शेयर को छह फीसदी से लगभग तीन गुना बढ़ाकर 17 फीसदी करने में सक्षम रही थी, लेकिन वह अपनी सीटों की संख्या एक से महज दो करने में ही सफल रही। इस बार के चुनाव में 2014 की तुलना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति देश भर में समर्थन में जहां कमी आई है, वहीं पश्चिम बंगाल में उनके प्रति समर्थन में तेजी आई है। ऐसे में अगर यह धारणा बनी है कि वह दीदी के गढ़ को भेदने वाले हैं, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
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