चुनाव परिणाम के बाद भी कुछ बड़े पत्रकार और बुद्धिजीवी नरेंद्र मोदी की छवि को ‘कॉरपोरेट निर्मित’ और उनकी पूरी राजनीति को ‘कॉरपोरेट पूंजी का जरखरीद’ बता रहे हैं। हद तो यह है कि ये बातें वे लोग धड़ल्ले से लिख-बोल रहे हैं! उन्हें अपनी ही बातों का अंतर्विरोध समझ में नहीं आता। ऐसे बुद्धिजीवियों ने अपने ही नारों और निर्मितियों से अपना माथा चकरा लिया है। नहीं तो वे समझ पाते कि जिस तरह उनके कॉरपोरेट मालिकों ने उन्हें छूट दे रखी है, उसी तरह दूसरे लोग भी स्वतंत्रतापूर्वक, अपनी बुद्धि से निर्णय लेकर मोदी का समर्थन भी कर सकते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे आत्ममुग्ध बुद्धिजीवियों द्वारा शिक्षित लोगों को जानकारी या स्वस्थ विचार-विमर्श देने के बदले कोरा राजनीतिक प्रचार यथावत चलाया जाता है। मानो यही उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो।
यदि क्षण भर के लिए मान लें कि मोदी की हवा ‘कॉरपोरेट’ ने बनाई, तो कृपया इस प्रश्न पर विचार करें कि वही हवा उन क्षेत्रों में क्यों नहीं चली, जहां भाजपा के उम्मीदवार हार गए। तो क्या यह मान लिया जाए कि उन क्षेत्रों के लोग पूरी तरह से कॉरपोरेट के दबाव से मुक्त हैं? यह खुले तौर पर उन करोड़ों मतदाताओं का अपमान भी है, जिन्होंने मोदी को वोट दिया। ऐसे मतदाता हर समूह, हर वर्ग के हैं, जिनमें असंख्य सुशिक्षित, बुद्धिमान, देश-दुनिया की पर्याप्त समझ रखने वाले लोग भी होंगे ही। मगर ऐसे रेडिकल मोदी-विरोधी बुद्धिजीवियों के अनुसार, उन लाखों, करोड़ों लोगों में स्व-विवेक से विचार करने की क्षमता ही नहीं है। इसीलिए उन सबों ने किन्हीं कथित ‘कॉरपोरेट के गुलाम’ को गलती से वोट दे दिया। वह गुलाम, नरेंद्र मोदी, भी गुलाम इसीलिए है, क्योंकि वह जिस हेलीकॉप्टर से चलता था, वह किसी कॉरपोरेट का था। इन बुद्धिजीवियों की नजरों में बस इतना ही उनके कॉरपोरेट का जरखरीद होने के लिए पर्याप्त तर्क हो गया! मानो वह हेलीकॉप्टर मुफ्त का था, मानो भारतीय राज्य-सत्ता अपने किसी मुख्यमंत्री को हेलीकॉप्टर से चलने का खर्चा नहीं उठा सकती! कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इस संकीर्ण विचार प्रणाली में तानाशाही की बू है, जो मोदी ही नहीं, सभी लोगों को बिक जाने और भेड़-बकरियों की तरह चराए जाने योग्य मानता है।
यह समझ विचित्र और घातक भी है, क्योंकि अनेक जाने-माने बुद्धिजीवी ‘कॉरपोरेट’ शब्द का उपयोग ‘अपराधी’ या ‘दुष्ट’ की तरह करते हैं। मानो ये सभी शब्द पर्यायवाची हों। ये बुद्धिजीवी कॉरपोरेट की चर्चा इस तरह करते हैं, मानो किसी शातिर और चालाक अपराधी की बात कर रहे हों। क्या कॉरपोरेट घराने के लोग इस देश के सम्मानित नागरिक नहीं हैं? क्या उन्हें वोट देने और अपनी पसंद के उम्मीदवार या दल को सहायता देने का सांविधानिक अधिकार नहीं है? क्या मोदी या भाजपा का विरोध करने वाले कोई सुपर-नागरिक हैं, जिन्हें मोदी का समर्थन करने वालों को नीच, गए-गुजरे बताने का विशेष अधिकार हासिल है? यदि यह सब नहीं है, तो महीनों, वर्षों से नरेंद्र मोदी, मनमोहन सिंह या किसी को भी ‘कॉरपोरेट का एजेंट’ कहकर बुरा-भला कहने का कोई अर्थ नहीं बनता।
देश के लाखों लोगों को रोजगार तथा करोड़ों देशवासियों को जरूरी वस्तुएं, सुविधाएं, सेवाएं, उपलब्ध कराने वाले ‘कॉरपोरेट’ जगत के स्वाभिमानी, परिश्रमी लोगों, घरानों को गाली देना क्या उचित है? स्तरीय, विचारोत्तेजक, विभिन्न मत-मतांतरों वाली सामग्री उपलब्ध कराने के बदले देश के करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं का प्रतीक बनकर उभरे नरेंद्र मोदी को कॉरपोरेट का जरखरीद बताना उन तमाम पाठकों के साथ भी अन्याय है, जो पत्र-पत्रिकाओं की पुरानी साख के नाम पर उसके ग्राहक हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों से सावधान रहने की जरूरत है।