फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एशिया के मर्मस्थल में मोदी

Thu, 09 Jul 2015 08:15 PM IST
पुष्पेश पंत
विज्ञापन
विज्ञापन
नरेंद्र मोदी की मध्य एशियाई देशों की यात्रा को सुर्खियों में वैसी तवज्जो नहीं मिल रही है, जैसी उनकी अब तक के राजनयिक दौरों को मिलती रही है। इसका एक कारण शायद यह है कि ललित मोदी प्रकरण तथा व्यापम घोटाले के सनसनीखेज खुलासों की वजह से भाजपा कठघरे में है और प्रधानमंत्री का 'मौन' इस राजनयिक पहल के विज्ञापन के लिए समुचित माहौल बनाने में योगदान नहीं दे पाया। एक दूसरा कारण यह लगता है कि इस बार भारतवंशी प्रवासी समाज मौजूद नहीं, जो जोश-ओ-खरोश का ज्वार पैदा कर सके!
विज्ञापन


जबकि मौजूदा दौरा कई मायनों में उल्लेखनीय है। उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते भले नगण्य नजर आते हों, इन देशों के संवेदनशील सामरिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता। बरसों बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री एक साथ इस क्षेत्र का दौरा कर रहा है, जिसे एशिया का मर्मस्थल कहा जा सकता है। कट्टरपंथी दहशतगर्दी में उफान के बाद इस्लामी दुनिया के इस उत्तरी छोर का भू-राजनीतिक महत्व जग जाहिर है। रूस और चीन की सरहद को छूने वाले ये गणराज्य उनके लिए खास अहमियत रखते हैं। शिया ईरान तथा अस्थिरता की चपेट में लहूलुहान अफगानिस्तान और पाकिस्तान का घटनाक्रम प्रभावित करने की संभावना यह भूभाग रखता है।

अगर आज तक हमारे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इन देशों की हिस्सेदारी सीमित रही है, तो इसके कारण सिर्फ भौगोलिक नहीं। जब तक वे सोवियत संघ का हिस्सा रहे, उनके साथ हमारे नातों की छत्रछाया उभयपक्षीय संबंधों को बौना बनाए रखती थी। परमाणविक ईंधन तथा अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में भारत-रूस सहयोग का अभिन्न अंग कजाखिस्तान रहा है। भविष्य में हमारी ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में भी अजरबैजान समेत इन सभी का महत्व कम नहीं। हां, कठिनाइयों को भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विज्ञापन


उभयपक्षी व्यापार के आंकड़े एक डेढ़ अरब डॉलर को ही छू सके हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि इसमें तत्काल इजाफा नहीं हो सकता। पशुपालन, दूरसंचार, औषधि उत्पादन, तकनीकी शिक्षा के साथ आयुर्वेद एवं योग के प्रति इन सभी देशों में गहरा आकर्षण है। मोदी ने अपने भाषणों में बारंबार ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों के साथ बॉलीवुड का भी जिक्र किया है। जिस नरम शक्ति की चर्चा इन दिनों गरम है, उसके प्रयोग के लिए यह मंच उपयुक्त लगता है। पर अतीत की धुंधलाती यादों की बुनियाद पर आज कोई भव्य भवन निर्मित नहीं हो सकता। इस सिलसिले में दो तीन बातें याद रखने लायक हैं।

पहली बात यह कि बहुत कम निवेश से भारत इन सभी देशों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के अलावा अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन भी कर सकता है। यदि हम ऐसा करने से चूकते हैं, तो इसका लाभ पाकिस्तान और चीन को होगा। समग्र दृष्टि ही सही नीति निर्धारण और सार्थक राजनय को संभव बना सकती है। प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भी इसी का प्रमाण है कि वह सुचिंतित कार्यक्रम के अनुसार विदेश यात्राएं कर रहे हैं। न तो वह किसी एक महाशक्ति से अभिभूत हैं और न भारत के सभी राजनयिक विकल्प एक टोकरी में डाल देने को मजबूर।

वह पाकिस्तान को सीधे ललकारे बिना अन्य मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले देशों में भारत के प्रति सद्भाव बढ़ाने में जुटे रहे हैं। अमेरिका हमें अफगानिस्तान में फंसाने को व्याकुल है, पर भारत बड़े कौशल से मध्य एशिया में पेशकदमी कर कहीं अधिक सामरिक गहराई हासिल कर सकता है। हालांकि अब तक चीन के मुस्लिम बहुल आबादी वाले शिंजियांग प्रांत को छोड़ उन्मादी जेहादी तेवर फिलहाल कहीं और देखने को नहीं मिले हैं। ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि हिंसक दहशतगर्दी का संक्रमण यहां नहीं हो सकता। हाल के दिनों में यह चिंताजनक समाचार मिले हैं कि बगदादी की खिलाफत के खूंखार समर्थक आईएस ने यहां से कुछ हजार रंगरूट भर्ती किए हैं! दूसरे छोर पर दागिस्तान एवं चेचेन्या का धधकता ज्वालामुखी है, जिसका विस्फोट कभी भी हो सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में कुछ विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी का मध्य एशिया दौरा प्रमुखत: कट्टरपंथी इस्लामी चुनौती की रोकथाम की दिशा में उठाया गया कदम है।

हाल के दिनों में चीन ने ऐतिहासिक रेशम राजमार्ग के पुनर्निर्माण की बेहद महत्वाकांक्षी योजना का अनावरण किया है। इसको लेकर सभी मध्य एशियाई देश उत्साहित हैं। अगर भारत इसे अपनी घेरेबंदी की साजिश का ही हिस्सा समझता है, तो बदलती स्थिति का लाभ नहीं उठा सकता। चीन निर्मित नए रेशम राजमार्ग के जरिये ही वह ईरान और ओमान के मार्फत अफगानिस्तान या पाकिस्तान के उपद्रवग्रस्त इलाके के सदाबहार सिरदर्द से मुक्त अपनी जरूरत की सामग्री हासिल कर सकता है। मोदी इस संभावना के प्रति लापरवाह नहीं। मजेदार बात यह है कि यूपीए की सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके एम के नारायणन मोदी को सलाह दे रहे हैं कि उन्हें मध्य एशिया नहीं, वरन पश्चिम एशिया यानी सीरिया, इराक, यमन, लेबनान की तरफ ज्यादा ध्यान देना चाहिए! पर यह सार्थक राजनय का दलगत पक्षधरताग्रस्त अवमूल्यन है।

इसी यात्रा में मोदी रूस भी गए हैं, जहां उनकी मुलाकात शी जिनपिंग तथा नवाज शरीफ से हुई है। शंघाई सहयोग संगठन में शिरकत के साथ साथ यह अवसर इस काम भी लाया जा सका कि बिना कड़वाहट बढ़ाए चीन के साथ शिकवे-शिकायत दर्ज किए जाएं। पाकिस्तान के साथ भी परोक्ष या प्रत्यक्ष वार्तालाप हुआ। ब्रिक्स के तत्वावधान में जिस एशिया विकास बैंक की स्थापना की गई है, उसको गतिशील बनाने के लिए भी भारत की सक्रियता परमावश्यक है। इन सबके मद्देनजर हफ्ते भर के इस दौरे को मोदी की पहले की बहुचर्चित विदेश यात्राओं से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें