प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार 'मन की बात' कार्यक्रम में कहा है कि जब दो अक्तूबर को महात्मा गांधी जी की 150वीं जयंती मनाई जाएगी, तो इस अवसर पर हम उन्हें न केवल खुले में शौच से मुक्त भारत समर्पित करेंगे, बल्कि उस दिन पूरे देश में प्लास्टिक के खिलाफ एक नए जनांदोलन की नींव भी रखेंगे।
एकल उपयोग प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म करने के प्रयास को एक जनांदोलन का रूप देना होगा। इस दिशा में समाज भी सजग हो रहा है। कई व्यापारियों ने तो अपनी दुकानों में तख्ती लगा दी है, जिसमें लिखा है कि प्रिय ग्राहक, अपना थैला साथ लेकर आएं, ताकि एकल उपयोग प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म किया जा सके। इससे पैसा भी बचेगा और पर्यावरण की रक्षा में सभी देशवासी अपना महत्वपूर्ण योगदान भी दे पाएंगे। देश के सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं, जिला पंचायतों, ग्राम पंचायतों, सरकारी, गैर सरकारी संस्थानों एवं प्रत्येक नागरिक से अनुरोध भी किया गया है कि प्लास्टिक कचरे के संग्रह के लिए उचित व्यवस्था की जाए। कॉरपोरेट सेक्टर से अपील की गई है कि जब ये सारा प्लास्टिक कचरा इकट्ठा हो जाए, तो इसके उचित विघटन के लिए वे भी आगे आएं।
प्लास्टिक, विशेष रूप से एकल उपयोग प्लास्टिक, देश के पर्यावरण, नागरिकों, पशु-पक्षियों, समुद्री जीवों, आदि के लिए कितना खतरनाक है, इस भयावह स्थिति को समझना बहुत आवश्यक है। दरअसल, प्लास्टिक आसानी से विघटित नहीं होता है एवं इसका स्वरूप लगभग हजार वर्षों तक बना रहता है। विश्व में प्लास्टिक का उपयोग इतना बढ़ता जा रहा है कि पिछले दस वर्षों के दौरान जितना प्लास्टिक का उत्पादन हुआ है, इतना पहले कभी नहीं हुआ। इन सभी प्लास्टिक उत्पादों में से 50 प्रतिशत प्लास्टिक उत्पाद केवल एक बार ही उपयोग कर फेंक दिए जाते हैं। प्रत्येक वर्ष इतना प्लास्टिक धरती एवं समुद्र में फेंका जाता है कि यदि ये पूरा प्लास्टिक एक कड़ी के रूप में जोड़ा जाए, तो इस कड़ी के माध्यम से भू-भाग के चार चक्कर लगाए जा सकते हैं। वर्तमान में केवल पांच प्रतिशत प्लास्टिक ही रिसाइकिल हो पाता है, शेष 95 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे का रूप ले लेता है। पूरे विश्व में लगभग 50,000 करोड़ प्लास्टिक की थैलियां प्रतिवर्ष उपयोग में आती हैं। सामान्यतः प्लास्टिक कचरे को समुद्र में फेंक दिया जाता है, इससे समुद्र के पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है एवं समुद्री जीव इसका शिकार हो रहे हैं। प्रतिवर्ष समुद्र में 10 लाख समुद्री पक्षी एवं एक लाख समुद्री स्तनपायी जीवों की जीवनलीला प्लास्टिक पदार्थ खाने से समाप्त हो जाती है।
भारत में तो कई पशु-पक्षी (गाय, भैंस आदि) प्लास्टिक के पदार्थों को खाकर अपनी जान गवां बैठते हैं। प्लास्टिक कचरे का भंडार हमारे देश के लिए भी एक गंभीर समस्या बन गया है। महानगरों, शहरों, एवं अब तो ग्रामीण इलाक़ों में भी प्लास्टिक कचरे के भंडार के पहाड़ आसानी से देखे जा सकते हैं।
हम नागरिकों की जिम्मेदारी तो अब शुरू होती है कि भविष्य में किस प्रकार हमारे जीवन में प्लास्टिक के उपयोग को सीमित किया जाए। हमें केवल कुछ आदतें अपने आप में विकसित करनी होंगी। यथा, जब भी हम सब्जी एवं किराने का सामान आदि खरीदने जाएं, तो कपड़े के थैलों का इस्तेमाल करें। रेलवे प्लेटफॉर्म एवं हवाई अड्डों पर भी अब चाय एवं कॉफी कुल्हड़ में परोसी जाने की व्यवस्था की जा रही है। अब समय आ गया है कि देश को प्लास्टिक कचरे से मुक्त कराया जाए, ताकि न केवल मासूम पशु-पक्षियों की जान बचाई जा सके, बल्कि पर्यावरण को बेहतर बनाया जा सके।