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मोबाइल है, स्कूल क्यों नहीं?

Sat, 02 Feb 2013 11:48 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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रंपरागत रूप से वंचित वर्गों के बीच भ्रष्टाचार के बारे में सुर्खियों में रही समाजशास्त्री आशीष नंदी की राय से हाल के दिनों में विश्लेषणों का एक हिमस्खलन हो गया है। भ्रष्टाचार न तो नया है और न ही देश के ज्यादातर लोग इससे अनजान हैं। मीडिया और ड्राइंग रूम में भावनात्मक रूप से तेज बहस चल रही है कि नंदी ने क्या कहा और क्या नहीं कहा। उनकी बात का क्या मतलब था? और क्या नहीं था।
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इस बीच, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि जयपुर साहित्य सम्मेलन में दिए गए बयान को लेकर नंदी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। मगर इस विवाद के जल्द खत्म होने के आसार नहीं हैं। करोड़ों दलित, आदिवासियों और अन्य तबकों, जिन्हें हम वंचित के रूप में वर्णित करते हैं, के लिए भ्रष्टाचार रोजमर्रा की जिंदगी में एक अपरिहार्य और पाशविक तथ्य है।
 
हम बहस कर सकते हैं, लेकिन समय यह देखने का है कि जमीनी स्तर पर वास्तव में क्या हो रहा है और वास्तविक मुद्दा क्या है, जिससे देश में लोगों को आंदोलित होना चाहिए। क्या उन्हें परंपरागत रूप से विशेषाधिकार प्राप्त हैं या वे परंपरागत रूप से वंचित हैं?
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योजना आयोग के अनुसार 2001 की जनगणना में अनुसूचित जाति या दलितों की आबादी कुल जनसंख्या की 16.2 फीसदी थी और 2011 की जनगणना में यह बढ़कर 16.9 फीसदी हो गई। अस्सी फीसदी अनूसूचित जाति से संबंधित आबादी गांवों में रहती है और उनकी आबादी का तकरीबन आधा हिस्सा केवल पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बिहार में निवास करता है।

वे ऐतिहासिक रूप से सामाजिक भेदभाव और इसी तरह शैक्षिक व आर्थिक वंचना का शिकार रहे हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्हें आगे बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान किए गए। लेकिन सुरक्षात्मक कानूनों की अधिकता और पिछले कुछ वर्षों के दौरान मजबूत दलित राजनेताओं के अभ्युदय के बावजूद इस वर्ग के खिलाफ होने वाले अत्याचार और अपराध जारी हैं और वे तकरीबन सभी विकास संकेतकों में लगातार पीछे रहे हैं।

अनुसूचित जनजातियों की बहुत बड़ी आबादी की स्थिति भी बेहतर नहीं है। देश की कुल जनसंख्या में इनकी हिस्सेदारी तकरीबन 8.2 फीसदी है। दलितों, जो पूरे देश में फैले हुए हैं, के विपरीत आदिवासी परंपरागत रूप से देश के तकरीबन 15 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र, मुख्य रूप से जंगली और पहाड़ी इलाके, में निवास करते हैं।

योजना आयोग का 12वीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज बताता है कि एक राष्ट्र के रूप में समाज के निचले तबके के लोगों को ऊपर उठाने के लिए हमें अभी कितना लंबा सफर तय करना है। देश में 66 फीसदी कुल पक्के मकानों की तुलना में तकरीबन आधे दलितों और एक तिहाई आदिवासियों को यह सुविधा हासिल है। समाज के अन्य समुदायों की तुलना में दलितों और आदिवासियों की स्वास्थ्य की स्थिति बेहद दयनीय है।

इनको मिलने वाली स्वास्थ्य सुरक्षा सीमित है। प्रसव पूर्व सुरक्षा के लिए दलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाली केवल 42 फीसदी गर्भवती महिलाओं को चिकित्सक का परामर्श और केवल 28 प्रतिशत महिलाओं को सहायक मिडवाइफ नर्स यानी एएनएम की सुविधा मिल पाती है। जबकि समाज के अन्य वर्गों की 64 फीसदी महिलाओं को यह सुविधा प्राप्त है। बात अगर आदिवासियों की करें तो उनकी हालत और भी बदतर है। अन्य तबकों की 51 फीसदी महिलाओं की तुलना में मुश्किल से 18 फीसदी आदिवासी महिलाओं की डिलिवरी स्वास्थ्य केंद्रों में होती है।
 
शिक्षा के मामले में भी हालात चिंताजनक हैं। सर्व शिक्षा अभियान की 16वीं संयुक्त समीक्षा मिशन की रिपोर्ट में पिछले साल चिंता जताई गई कि दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों के 6-14 आयु वर्ग वाले बच्चों के नामांकन में कमी आ रही है। दलितों के बच्चों का नामांकन 2009 के 19.81 फीसदी की तुलना में घटकर 2010-11 में 19.06 फीसदी रह गया।

जबकि इसी समयावधि के दौरान आदिवासी बच्चों का नामांकन 10.93 से गिरकर 10.70 फीसदी रह गया। ये आंकड़े बताते हैं कि दलितों और आदिवासियों की जिंदगी में सुधार के लिए भले ही कई प्रयास किए गए हों, लेकिन उनके नतीजे संतोषजनक स्थिति से काफी दूर हैं।

अगर मोबाइल फोन, सॉफ्ट ड्रिंक्स, टूथपेस्ट और अन्य वस्तुएं देश के बेहद सुदूर इलाकों में पहुंच सकती हैं, तो शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों नहीं? एक साहित्य सम्मेलन में किसी ने क्या कहा, उस पर लगातार गुस्सा दिखाने के बजाय दलितों और आदिवासियों के विकास को रोकने वाले कारणों पर आक्रोश दिखाना ज्यादा उपयोगी है।
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