हस्तिनापुर का राजकुमार विद्युच्चर कुसंग के कारण अपराधी प्रवृत्ति का बन गया था। उसने उच्छृंखल युवकों को इकट्ठा कर गिरोह बना लिया तथा डाका डालने लगा। वह गिरोह के साथ राजगृह नगर जा पहुंचा। उसे पता चला कि नगर के प्रमुख सेठ का युवा पुत्र जंबूकुमार बड़ी मुश्किल से वैराग्य का विचार त्यागकर विवाह करने वाला है। उसने विवाह के अगले दिन महल पर धावा बोलकर लूटपाट की योजना बना ली।
विवाह की रात विद्युच्चर जंबूकुमार के शयन कक्ष तक पहुंचा। उसने खिड़की से झांककर देखा कि जंबूकुमार पत्नी से कह रहे थे, मैं मुनियों के सत्संग के कारण धन-संपत्ति तथा संसार को असार मानने लगा हूं। केवल माता-पिता की आज्ञा मानने के लिए तुमसे विवाह किया है। मैं सूर्योदय होते ही सब कुछ त्यागकर मुनि वेश धारण कर लूंगा और यहां से प्रस्थान कर जाऊंगा।
विद्युच्चर ने जैसे ही ये शब्द सुने, उसकी अंतरात्मा जाग उठी। अपने पाप कर्मों के प्रति उसके हृदय में ग्लानि पैदा होने लगी। वह महल से लौट आया और अपने अस्त्र तालाब में फेंक दिए। सवेरे वह महल के द्वार पर जा पहुंचा। जैसे ही जंबूकुमार मुनि वेश धारण किए महल से बाहर आए, विद्युच्चर उनके पीछे चल दिए। जंबूकुमार के दूर से किए कुछ क्षणों के सत्संग ने ही उसका जीवन बदल दिया था। अब वह जंबूमुनि का शरणागत होकर डाकू से मुनि बन चुका था।