एक ऊबे हुए नेता ने पिछले दिनों अपने कोपभवन से निकल कर घोषणा की कि जनता का उनकी पार्टी से मोहभंग हो रहा है। वह बड़े नेता हैं। जब वह कुछ कहते हैं, तो उस पर यकीन करना ही पड़ता है, चाहे वह पूरा सच हो या नहीं। अभी कुछ वर्ष पहले वह वेटिंग रूम में बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।
तब उन्हें देश की जनता पर पूरा विश्वास था कि वह उन पर तथा उनके दल पर इस कदर मोहित है कि दिल्ली की राजगद्दी पर एक दिन उन्हें ही बिठाएगी। वह अपने गले में पहनने के लिए उपयुक्त फूलों का चयन करते ही रह गए और राजपाट का उनका सपना किसी और के लिए साकार हो गया।
जानकार बताते हैं कि राजगद्दी न मिलने के कारण पैदा हुई हताशा और क्षोभ ने ही उनसे यह कहलाया है। हालत यह है कि पार्टी का अदना आदमी भी आज उनकी बात सुनने को राजी नहीं है। कुछ लोग तो इतने नए और अनुभवहीन हैं कि उन्हें लौहपुरुष के विगत रौब-दाब के बारे में भी बहुत पता नहीं है।
वे सोचते होंगे, हताश चेहरे वाला यह नेता पहले भी इसी तरह सुस्त कदमों से चलता रहा होगा। इसके बावजूद उनके मुंह से ऐसी बात सुनकर पार्टी के पदाधिकारियों से लेकर अदना कारिंदा तक हैरान है। लौहपुरुष क्या कह रहे हैं! इतने भ्रष्टाचार के बावजूद सत्ताधारी दल से जनता का मोहभंग नहीं हुआ और मुख्य विपक्षी पार्टी से हो गया है।
उनकी पार्टी ने ऐसा कौन-सा गलत काम कर दिया। फिर मोह कोई कांच का मर्तबान तो होता नहीं कि जरा-सी ठोकर लगी और टूटकर बिखर गया। उनकी पार्टी में आज कांच जैसी पारदर्शिता भी तो नहीं रही। बल्कि सिद्धांत का ऐसा पतन है कि खुद को सबसे अलग बताने वाली पार्टी आज एक दबंग पहलवान को प्रधानमंत्री बनाने पर आमादा है। सीटों का अता-पता नहीं, और लोग उनके सामने इस तरह से बिछे जा रहे हैं, मानो पहलवान का प्रधानमंत्री बनना तय है।
हो सकता है, पहलवान की दबंगई को देखकर ही लौहपुरुष ने मोहभंग की बात की हो। क्या वह यह कहना चाह रहे हैं कि उनके लगभग हाशिये पर चले जाने के कारण ही उनकी पार्टी से जनता का मोहभंग हो गया है। यह जनता का मोहभंग है या अपनी पार्टी से खुद उनका! अब यह तो खुद लौहपुरुष ही बता सकते हैं, जो अब लोहा भी नहीं रह गए हैं।