भारत में आतंक का निर्यात करना पाकिस्तान की राजकीय नीति का हिस्सा बन गया है। वर्षों से कश्मीरी और खालिस्तानी अलगाववादियों की भर्ती, प्रशिक्षण, हथियार और समर्थन देना, आतंकवादी हमले करना, भारत को बदनाम करना और भारत में सांप्रदायिक तनाव भड़काना तथा प्रतिशोध को भड़काना उनके प्रयासों का हिस्सा रहे हैं। बीते 22 अप्रैल को पहलगाम में धर्म पूछकर निर्दोष पर्यटकों पर हमला योजनाबद्ध तरीके से किया गया था, जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति भारत में और प्रधानमंत्री मोदी सऊदी अरब में थे और हजारों पर्यटक वर्षों बाद घाटी में शांति और सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद कश्मीर आ रहे थे। जाहिर है, इसका मकसद तीन लक्ष्यों की पूर्ति करना था-पहला, शेष भारत और विश्व को यह संदेश देना कि सामान्य स्थिति के दावों के बावजूद जम्मू-कश्मीर में हालात ठीक नहीं हैं। दूसरा, अत्यंत आवश्यक पर्यटन की बहाली में बाधा डालना तथा हिंदुओं व मुसलमानों के बीच गुस्सा एवं अविश्वास पैदा करना और तीसरा, भारत को जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाना, जिससे पाकिस्तान के गंभीर घरेलू आर्थिक संकटों से ध्यान भटक जाए और कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ जाए। सौभाग्य से, कश्मीर घाटी और शेष भारत के सदमे और गुस्साए लोगों ने आतंकियों के इस मंसूबे को पूरा नहीं होने दिया।
इस बीच, भारत सरकार ने चार कूटनीतिक कदम उठाने की घोषणा की है: सिंधु जल संधि को निलंबित करना, अटारी सीमा चौकी को बंद करना, पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा न देना और पाकिस्तानी रक्षा सलाहकारों को निष्कासित करना तथा उच्चायोग के आकार को कम करना। इसके अलावा, पाकिस्तान से संचालित कई यूट्यूब चैनल को प्रतिबंधित कर डिजिटल लगाम कसी है। पाकिस्तान ने भी इसी तरह के कदम उठाए हैं। बिहार की एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने जोरदार घोषणा की है कि इस जघन्य अपराध के दोषियों, उनके समर्थकों और साजिश रचने वालों की पहचान कर उन्हें दंडित किया जाएगा तथा आतंकवादियों के बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया जाएगा। ‘मन की बात’ में भी प्रधानमंत्री ने दोहराया कि आतंकियों व उनके आकाओं को कठोरतम सजा देंगे। पाकिस्तान के संभावित जवाबी हमले, राजनीतिक दलों और आम जनता के मूड तथा संभावित वैश्विक प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए भारत की पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई बहुत कड़ी हो सकती है। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति, सभी राजनीतिक दल और पूरा देश इस जघन्य अपराध के अपराधियों को सबक सिखाने के लिए सरकार के साथ खड़ा है, ताकि वे भविष्य में ऐसा करने की कोशिश न करें। जाहिर है, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के शीर्ष अधिकारी सोच-समझकर कार्रवाई करेंगे, जो राष्ट्रीय हित में सबसे बेहतर होगी।
एक खुला और व्यापक संघर्ष किसी के भी हित में नहीं है; हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी देशों ने स्पष्ट रूप से और तत्काल आतंकवादी हमले की निंदा की है, लेकिन चीन और अमेरिका जैसे कुछ देश पाकिस्तान में अपने हितों को देखते हुए इससे पीछे हट सकते हैं। खाड़ी देशों सहित मुस्लिम देश खुद को तटस्थ रख सकते हैं। लेकिन हम तथ्यों को प्रभावशाली ढंग से सामने रख सकते हैं। कुछ मुद्दों पर हमारे मतभेदों के बावजूद, अमेरिका और चीन, दोनों ही भारत के साथ आर्थिक जुड़ाव बढ़ाने और कई वैश्विक मुद्दों को संबोधित करने के लिए सहयोग करने के स्पष्ट लाभ देख सकते हैं, बजाय इसके कि वे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का केंद्र और एक विफल देश का खुलकर साथ दें। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान सहित खाड़ी देश, जहां एक करोड़ भारतीय उनकी अर्थव्यवस्थाओं की मदद करने के लिए अथक परिश्रम करते हैं, भारत में निवेश की अपार संभावनाएं, द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग का विस्तार और इससे होने वाले लाभ को देखते हैं, जब भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) चालू हो जाएगा।
सटीक, घातक हमले को अंजाम देने के लिए हम अपने इस्राइली मित्रों से कुछ सीख ले सकते हैं, जिन्होंने तेहरान में वरिष्ठ हमास नेता इस्माइल हनिये और ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह को कंप्यूटरीकृत मशीनगन के जरिये मार डाला था। इसलिए, नागरिकों को नुकसान पहुंचाए बिना आतंकवादियों के मुख्यालयों और उनके आकाओं को नष्ट करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। मौजूदा पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर, जिन्होंने विभाजन और दो राष्ट्र सिद्धांत की याद दिलाते हुए एक भड़काऊ भाषण दिया था, को पहलगाम में आतंकवादी हमले को भड़काने/समर्थन देने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। उन्हें जनरल अयूब खान और जनरल मुशर्रफ की कहानी पर गौर करना चाहिए, जिन्होंने हार के बाद भारत से बातचीत की थी।
किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए इतने इशारे नहीं किए हैं, जितने नरेंद्र मोदी ने किए हैं। लेकिन सेना और आईएसआई ने 1947 के बाद से कोई सबक नहीं सीखा है और उन्होंने उन सभी नेक प्रयासों को विफल कर दिया है। वे हारे हुए हैं-जितनी जल्दी उन्हें यह एहसास हो जाए, उतना ही अच्छा होगा। पाकिस्तानी जनरलों को कुछ बुनियादी घरेलू सच्चाइयों को आत्मसात कर लेना चाहिए। भारत दूसरे विभाजन के लिए तैयार नहीं है; चाहे दिल्ली में कोई भी पार्टी सत्ता में हो, कोई भी सरकार कश्मीर नहीं लेने देगी। कश्मीर का भारत में विलय एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। भारत पर हमला करने के लिए पाकिस्तान जिन आतंकवादियों को पाल रहा है, वही एक दिन उसे निगल जाएंगे। भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें मूर्खतापूर्ण हैं। पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख को याद करना चाहिए कि वहां के सबसे बड़े शायर अल्लामा इकबाल ने भारत के बारे में क्या लिखा था: कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी/सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए जमां हमारा/सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।