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शांति के लिए भी एक मंत्रालय हो: सुरक्षा केवल मिसाइलों व टैंकों से नहीं, क्या अब साहस दिखाने का समय नहीं?

कुमार सिद्धार्थ
Updated Wed, 23 Sep 2026 07:00 AM IST

सार

यदि मानवता ने युद्ध के लिए मंत्रालय बनाए हैं, तो क्या अब समय नहीं आ गया कि वह शांति के लिए भी एक मंत्रालय बनाने का साहस दिखाए?
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अमेरिका-ईरान शांति समझौता - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


गांधीवादी चिंतक, पर्यावरणविद व लेखक सतीश कुमार ने ब्रिटिश पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में सवाल उठाया है कि जिस प्रकार लगभग हर देश में रक्षा मंत्रालय है, क्यों न उसी तरह प्रत्येक देश में ‘शांति मंत्रालय’ की स्थापना भी हो। ऐसा मंत्रालय समाज में संवाद, मध्यस्थता, शांति, अहिंसक प्रतिरोध, सामुदायिक मेल-मिलाप व वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देने का काम कर सकता है। पहली दृष्टि में यह विचार आदर्शवादी लग सकता है, पर वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में इसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुनिया के लगभग सभी देशों के पास रक्षा मंत्रालय, सेनाएं, युद्ध रणनीतियां और हथियारों के आधुनिकीकरण की योजनाएं हैं। किंतु, शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहां संवाद, मेल-मिलाप, संघर्ष-निवारण व शांति को बढ़ावा देने के लिए अलग से मंत्रालय हो।


स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया का कुल सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है, जो अब तक का सर्वाधिक है। यह लगातार 11वां साल है, जब इसमें बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत सबसे अधिक रक्षा व्यय करने वाले देशों में शामिल हैं। इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र की अनेक मानवीय और शांति-स्थापना एजेंसियां संसाधनों की कमी से जूझती रहती हैं। यह विरोधाभास बताता है कि विश्व राजनीति की प्राथमिकताएं किस दिशा में झुकी हुई हैं। रक्षा बजट का एक हिस्सा शांति निर्माण के लिए समर्पित होना चाहिए।


दरअसल, शांति को संस्थागत रूप देने का विचार बिल्कुल नया नहीं है। महात्मा गांधी ने कभी सुरक्षा का आधार सैन्य शक्ति को नहीं माना। उनके लिए स्थायी शांति का आधार सत्य, न्याय, संवाद और अहिंसा था। उनका स्वराज ऐसे समाज की परिकल्पना थी, जहां संघर्षों का समाधान संवाद और नैतिक शक्ति से हो। इसी गांधीवादी परंपरा को बाद में आचार्य विनोबा भावे, दादा धर्माधिकारी, जयप्रकाश नारायण और नारायण देसाई जैसे अनेक विचारकों ने आगे बढ़ाया। इन सभी का विश्वास था कि स्थायी सुरक्षा हथियारों से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज, लोकतांत्रिक भागीदारी और अहिंसक संस्कृति से आती है। इस दृष्टि से ‘शांति मंत्रालय’ का प्रस्ताव गांधीवादी चिंतन का समकालीन संस्थागत विस्तार प्रतीत होता है। यदि रक्षा के लिए मंत्रालय हो सकता है, तो शांति के लिए क्यों नहीं? द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अल्बर्ट आइंस्टीन और बर्ट्रेंड रसेल ने भी मानवता को यही चेतावनी दी थी। 1955 के प्रसिद्ध रसेल-आइंस्टीन घोषणापत्र  में उन्होंने विश्व नेताओं से आग्रह किया था कि वे युद्ध के बजाय मानव अस्तित्व को प्राथमिकता दें।


भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं से समझौता किए बिना भी शांति शिक्षा, संघर्ष-समाधान, मानवीय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के क्षेत्रों में नई पहल कर सकता है। यदि भारत ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ का संदेश विश्व समुदाय को दे सकता है, तो शांति को सार्वजनिक नीति का विषय बनाने की बहस का नेतृत्व भी कर सकता है। निस्संदेह, केवल एक नया मंत्रालय बना देने से युद्ध समाप्त नहीं होंगे, फिर भी संस्थाएं समाज की प्राथमिकताओं का प्रतीक होती हैं। जिस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग मंत्रालय बनने के बाद पर्यावरण नीति को नई पहचान मिली और आपदा प्रबंधन के लिए अलग संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई, उसी प्रकार शांति के लिए समर्पित संस्थान भी यह संदेश देंगे कि राष्ट्र केवल युद्ध जीतने की नहीं, बल्कि शांति स्थापित करने की तैयारी भी कर रहे हैं।


आज दुनिया को हथियारों से ज्यादा भरोसे की जरूरत है। सुरक्षा केवल मिसाइलों व टैंकों से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज, संवादशील राजनीति और मानवीय विश्वास से निर्मित होती है। यदि मानवता ने युद्ध के लिए मंत्रालय बनाए हैं, तो क्या अब समय नहीं आ गया कि वह शांति के लिए भी एक मंत्रालय बनाने का साहस दिखाए?  

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