भारतीय चुनावों से संबंधित एक शाश्वत सत्य यह है कि इनमें 'विशेषज्ञ' अक्सर गलत साबित हो जाते हैं। इसकी वजह स्पष्ट है। और सत्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के समय इसका जिक्र करना मौजूं भी है। जैसे कि उस दिन एक नामचीन टेलीविजन पत्रकार ने कहा, 'लोग कैमरे के सामने जो कुछ भी कहते हैं, अकेले में आमने-सामने मिलने पर उससे अलग बात कहते हैं।' भारतीय मतदाता, उनमें भी खासकर ग्रामीण मतदाता बहुत चालाक होते हैं।
वे जानते हैं कि चुनाव के समय अचानक उनके इलाके में टपक पड़ने वाले और उनसे राय मांगने वाले पत्रकारों को सच बताना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए वे जमीनी वास्तविकताएं बताने के बजाय यथास्थिति को स्वीकार करने को ही प्राथमिकता देते हैं। ग्रामीण मतदाता वोटिंग पैटर्न के बारे में बाहर से आए पत्रकारों को सच्चाई बताने का साहस नहीं करते, बल्कि ज्यादातर वही कहते हैं, जो पत्रकारों या वहां मजबूत राजनीतिक दल के अनुकूल हो।
इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि ट्रेन या बस में, या हाइवे पर स्थित चाय की दुकानों पर कोई मतदाता जो कुछ भी कहता है, वह अमूमन सच नहीं होता, क्योंकि जब वह पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहा होता है, तब आसपास खड़े और भी अनेक लोग उसे सुन रहे होते हैं। चूंकि उनमें से कुछ लोग उसके परिचित हो सकते हैं, इसलिए वह अपने मन की बात कहकर किसी से शत्रुता मोल नहीं ले सकता।
इसके विपरीत, एक पत्रकार का सच्चाई से सामना तब होता है, जब वह मुख्य सड़क को छोड़कर दूर के गांव में निकल जाता है और वहां लोगों से उनके घर में जाकर मिलता है। चूंकि घर के अंदर मौजूद लोग अपने ही होते हैं, लिहाजा वहां कही गई बातें अमूमन सच होती हैं। यह बात खासकर उन मतदाताओं के बारे में सच होती है, जो दबाव में होते हैं और समाज के हाशिये पर भी होते हैं। इनमें शहरी निम्न वर्ग के लोग, गरीब दलित, कर्ज में डूबे किसान के अलावा वे लोग भी होते हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जाती।
हाल में ही उत्तर प्रदेश में, जो कि देश के मतदाताओं का मिजाज मापने का बैरोमीटर है, एक लंबी सड़क यात्रा करते हुए, मुझे भी कई मूल्यवान सूत्र हाथ लगे। उसमें से एक बात यही है कि लोग क्या कह रहे हैं, वह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि वे कौन हैं, और कहां आपसे बात कर रहे हैं। और इसके बाद भी उनकी कथनी और करनी में फर्क हो सकता है। कोई कुछ भी कहे, सच्चाई तो आखिरकार 23 मई को ही सामने आएगी।