फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मोदी के रथ को रोक कर 2019 में गेम चेंजर साबित हो सकता है गठबंधन का जोड़

अजय बोस, बहनजी: अ पोलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक Published by: Raman Singh Updated Sat, 04 May 2019 07:26 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
गठबंधन का जोड़
चार चरणों के मतदान के बाद ऐसा लगता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने का जो साहसिक फैसला लिया था, वह उत्तर प्रदेश में जमीन पर काम कर रहा है। जमीनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि जाटवों का बसपा का मूल आधार आश्चर्यजनक रूप से सपा के यादवों के साथ सहयोग कर रहा है, जबकि अधिक दिन नहीं हुए वह इन्हें उत्पीड़क के रूप में देखता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटवों के एक और पूर्व उत्पीड़क जाटों के एक बड़े वर्ग और एकजुट मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से देश के सबसे अधिक आबादी वाले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में जो सामाजिक समूहों का असाधारण गठबंधन बना है, वह मोदी के रथ को रोक सकता है और 2019 के लोकसभा चुनाव में गेम चेंजर साबित हो सकता है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में दशकों के उतार-चढ़ाव से भरे सफर के बाद बहनजी ने अपना रुख बदलकर इस विश्वास के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया कि इससे उनकी पार्टी की संभावनाएं मजबूत होंगी। लिहाजा यह गठबंधन दलित नेता का एक बड़ा दांव है और अब तक इसे मिली सफलता मायावती के लिए सुखद आश्चर्य है और वह कभी राजनीतिक शत्रु रहे दूसरी पार्टी के नेता के साथ मंच साझा करने में असहज महसूस नहीं कर रही हैं। संयुक्त रैलियों में उनकी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की देह भाषा में यह साफ झलक भी रहा है।  


इस गठबंधन की सफलता की असली वजह दोनों नेताओं की निजी केमिस्ट्री नहीं, कुछ और है। लखनऊ में दलित कार्यकर्ता, सपा के मध्य क्रम के नेता और स्वतंत्र राजनीतिक पंडित इस बात पर एकमत थे कि जमीनी मजबूरी ने उन्हें गठबंधन के लिए विवश किया। उत्तर प्रदेश की राजनीति के वरिष्ठ पर्यवेक्षक और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रमेश दीक्षित जोर देकर कहते हैं, यह ऐसा गठबंधन है, जिसे खुद लोगों ने तैयार किया है और गठबंधन के नेता उनके दम पर ही इसे आगे बढ़ा रहे हैं। दलित कार्यकर्ता और डायनामिक ऐक्शन ग्रुप के संस्थापक राम कुमार कहते हैं, 'बसपा समर्थकों का दबाव था कि पार्टी भाजपा के तमाम विरोधियों से हाथ मिलाए और अभी यादवों और जाटों के बीच की कड़वाहट मायने नहीं रखती।'
विज्ञापन

गठबंधन का जोड़
चार चरणों के मतदान के बाद ऐसा लगता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने का जो साहसिक फैसला लिया था, वह उत्तर प्रदेश में जमीन पर काम कर रहा है। जमीनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि जाटवों का बसपा का मूल आधार आश्चर्यजनक रूप से सपा के यादवों के साथ सहयोग कर रहा है, जबकि अधिक दिन नहीं हुए वह इन्हें उत्पीड़क के रूप में देखता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटवों के एक और पूर्व उत्पीड़क जाटों के एक बड़े वर्ग और एकजुट मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से देश के सबसे अधिक आबादी वाले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में जो सामाजिक समूहों का असाधारण गठबंधन बना है, वह मोदी के रथ को रोक सकता है और 2019 के लोकसभा चुनाव में गेम चेंजर साबित हो सकता है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में दशकों के उतार-चढ़ाव से भरे सफर के बाद बहनजी ने अपना रुख बदलकर इस विश्वास के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया कि इससे उनकी पार्टी की संभावनाएं मजबूत होंगी। लिहाजा यह गठबंधन दलित नेता का एक बड़ा दांव है और अब तक इसे मिली सफलता मायावती के लिए सुखद आश्चर्य है और वह कभी राजनीतिक शत्रु रहे दूसरी पार्टी के नेता के साथ मंच साझा करने में असहज महसूस नहीं कर रही हैं। संयुक्त रैलियों में उनकी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की देह भाषा में यह साफ झलक भी रहा है।  

इस गठबंधन की सफलता की असली वजह दोनों नेताओं की निजी केमिस्ट्री नहीं, कुछ और है। लखनऊ में दलित कार्यकर्ता, सपा के मध्य क्रम के नेता और स्वतंत्र राजनीतिक पंडित इस बात पर एकमत थे कि जमीनी मजबूरी ने उन्हें गठबंधन के लिए विवश किया। उत्तर प्रदेश की राजनीति के वरिष्ठ पर्यवेक्षक और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रमेश दीक्षित जोर देकर कहते हैं, यह ऐसा गठबंधन है, जिसे खुद लोगों ने तैयार किया है और गठबंधन के नेता उनके दम पर ही इसे आगे बढ़ा रहे हैं। दलित कार्यकर्ता और डायनामिक ऐक्शन ग्रुप के संस्थापक राम कुमार कहते हैं, 'बसपा समर्थकों का दबाव था कि पार्टी भाजपा के तमाम विरोधियों से हाथ मिलाए और अभी यादवों और जाटों के बीच की कड़वाहट मायने नहीं रखती।'

समाजवादी पार्टी के समर्थक भी स्वीकार करते हैं कि यदि दो बड़े समर्थक समूहों यादवों और मुस्लिमों की ओर से जाटवों के साथ गठबंधन का दबाव नहीं होता, तो उनके नेता अखिलेश के लिए गठबंधन को व्यावहारिक बनाना मुश्किल हो जाता। हाल ही में मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव और मायावती की संयुक्त रैली में यादव ने अपने समर्थकों से दलित नेता के पैर छूने के लिए कहा, जो राज्य की सामाजिक गतिकी में आए अद्भुत बदलाव और राजनीतिक समीकरणों में इसके प्रभाव को दिखाता है। विभिन्न सामाजिक समूहों के साथ आने और ऐसा गठबंधन बनाने के पीछे कई कारण हैं, जिसने चुनाव को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण में परिवर्तित करने की भाजपा की योजना पर पानी फेर दिया है।

बहनजी की एकल सोशल इंजीनियरिंग की नाकामी के चलते बसपा को लगातार चुनावी हार देखनी पड़ी, जिससे जाटव में तेजी से मायूसी फैल रही थी। लेकिन सपा के साथ गठबंधन से उनकी नेता और उनकी पार्टी के पुनरुत्थान को लेकर नई उम्मीद जगी है। राज्य में कुछ वर्ष पूर्व सपा के शासन के दौरान यादवों के उत्पीड़न से जाटवों में जो कड़वाहट पैदा हो गई थी, वह न सिर्फ मायावती के प्रति अखिलेश के आदरभाव से खत्म हुई है, बल्कि जमीन पर भी उसका असर दिख रहा है। राम कुमार कहते हैं, सपा के यादव समर्थकों के जाटवों की शहरी कॉलोनियों और ग्रामीण बस्ती में जाकर हाथ जोड़ने और भाईचारे की पेशकश करने से दोनों समुदायों के रिश्तों में काफी बदलाव आया है।

हालांकि दलित कार्यकर्ता महूसस करते हैं कि उनके समुदाय में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए सभी वर्गों का सहयोग लेने का विचार पिछले वर्ष एससी/एसटी उत्पीड़न अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट के संशोधन के खिलाफ उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में हुए आंदोलन को कठोरता के साथ कुचल देने से उपजा। इसके साथ ही उच्च न्यायालयों द्वारा सरकारी शैक्षणिक संस्थानों और विभागों में आरक्षण पर दिए फैसले से जाटवों के साथ ही भाजपा की ओर पारंपरिक झुकाव रखने वाले पासी और वाल्मिकी जैसे समुदायों में भी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ी।

ठीक इसी तरह से योगी आदित्यनाथ के लखनऊ की सत्ता की कमान हाथ में लेने के बाद से यादव खुद को उत्पीड़ित महसूस कर रहे हैं। लखनऊ में सेंटर ऑफ ऑब्जेक्टिव रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट का संचालन करने वाले सपा समर्थक अतहर सिद्दिकी कहते हैं, 'योगी सरकार ने दो वर्ष पूर्व सत्ता में आने के बाद से नागरिक प्रशासन और पुलिस के महत्वपूर्ण पदों से यादवों, यहां तक कि अन्य पिछड़ी जाति के लोगों को हटाने के प्रयास किए हैं। इसलिए मुस्लिमों और दलितों जैसे वंचित तबकों से उनके हाथ मिलाने में हैरत नहीं है।

इससे उच्च जाति के प्रोजेक्ट के रूप में हिंदुत्व का चेहरा सामने आया है।' सपा की ओर झुकाव के बावजूद पिछले चुनावों में बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट करने वाले मुस्लिम केंद्र और राज्य की सरकारों की आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति के कारण बड़ी संख्या में पहली बार रणनीतिक रूप से एक दिशा में मत डाल सकते हैं। अपने वोट न बंटने देने के मुस्लिमों का यह मौन संकल्प सहारनपुर में कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद का भविष्य तय करेगा, क्योंकि कुछ हफ्ते पहले यह माना जा रहा था कि उनके कारण मुस्लिमों और जाटव वोट का विभाजन होगा।

लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस समूह के वोट गठबंधन को मिल सकते हैं। कहा जाता है कि मुरादाबाद में गठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मुस्लिमों के झुकाव के कारण राज बब्बर ने मुस्लिम नेताओं की सलाह पर फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ा। इसमें संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री की अगुआई और संसाधनों से लैस भाजपा की चुनावी मशीन को उत्तर प्रदेश में महज छह महीने पहले गठबंधन से चुनौती मिल रही है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next