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मलाईदार नहीं रहा दुग्ध उत्पादन

Tue, 08 Jan 2013 09:37 PM IST
देविंदर शर्मा
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डेयरी किसान ऊंची लागत और दूध के घटते दामों के चलते संकट में हैं। इन हालात का सामना करने में नाकामयाब रहने वाले कई डेयरी फार्म तो पहले ही बंद हो चुके हैं। पिछले महीने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर हुई बहस के दौरान राकांपा के मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने बड़े जोश के साथ कहा था कि महाराष्ट्र के बारामती में कृषि मंत्री शरद यादव ने यह सुनिश्चित किया था कि किसानों को न्यूनतम 20 रुपये प्रति लीटर मिले। मगर यह किसानों के साथ अन्याय है। बल्कि ऐसा लगता है कि मंत्री डेयरी किसानों के हितों से वाकिफ ही नहीं हैं।
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मलाई रहित दुग्ध पाउडर के विशाल भंडार और इसके निर्यात पर लगे प्रतिबंध के चलते डेयरी उद्योग अपने नुकसान को न्यूनतम करने की कोशिश में लगा हुआ है। लिहाजा प्राथमिक उत्पादकों को भी नुकसान हो रहा है। ऐसे हालात केवल भारत के लिए अजीब नहीं हैं। आइए, यह समझने की कोशिश करते हैं कि दूध के मूल्यों में गिरावट पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की क्या प्रतिक्रिया है?

कैलिफोर्निया का उदाहरण लें, तो 2009 में वहां के कुल 1,800 डेयरी फार्मों में से लगभग 20 प्रतिशत को ऊंचे चारा मूल्य और परिवहन लागतों के कारण बंद करना पड़ा। इसी तरह जब 2009 में दूध के अंतरराष्ट्रीय मूल्य लगातार नीचे बने हुए थे, तब यूरोपीय संघ ने विश्व व्यापार संगठन को चुनौती देते हुए दुग्ध उत्पादों पर फिर से अनुदान व्यवस्था लागू की। इसी के तहत संघ ने अपने डेयरी किसानों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 3,600 करोड़ रुपये का अनुदान दिया।
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जहां अमेरिका और यूरोपीय संघ ने हमेशा अपने डेयरी किसानों को वित्तीय संकट से उबारने की कोशिश की है, वहीं हमारे यहां डेयरी उत्पादों के मूल्यों में गिरावट के कारण डेयरी किसानों को उनके हाल पर छोड़ देना समझ से परे है, जबकि इसके लिए वे जिम्मेदार भी नहीं हैं। जब निजी और सहकारी डेयरी उद्योग दूध के मूल्यों को 20.50 रुपये प्रति लीटर तक ले आए हैं, ऐसे में एक डेयरी फार्म खोलना आर्थिक तौर पर वाकई कठिन साबित होने वाला होगा। पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में कई डेयरी फार्म बंद हो चुके हैं।

आखिर यूरोप ने इस संकट का सामना कैसे किया? यूरोपीय संघ में 10 लाख डेयरी किसान हैं। वे सामूहिक तौर पर भारत और अमेरिका की तुलना में कहीं ज्यादा दूध का उत्पादन करते हैं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के  मानकों के अनुसार, यूरोपीय संघ से अपेक्षा थी कि वह साझा कृषिगत नीति (सीएपी) के तहत दी जा रही सब्सिडी पर रोक लगाए। लेकिन जब घरेलू हितों की बात आती है, तो इन मानकों की कौन परवाह करता है? यूरोपीय संघ ने आर्थिक संकट के दौर में अपने दुग्ध उत्पादों के उत्पादन और निर्यात को सहारा देने के लिए अनुदानों की बहाली की। इसी का नतीजा है कि डेयरी उत्पादों के वैश्विक बाजार के 32 प्रतिशत भाग पर इसी का कब्जा है। कनाडा के डेयरी किसानों के संघ (डीएफए) की मानें, तो यूरोपीय संघ के डेयरी किसान हर वर्ष लगभग 3.96 लाख करोड़ रुपये का अनुदान प्राप्त करते हैं।

अनुदानों की इस विशाल राशि के कारण ही बाजार की अस्थिरता से डेयरी किसानों की सुरक्षा हो पाती है और वे अनुदानित दूध को विकासशील देशों में सस्ते दामों पर बेच पाते हैं। 1999-2000 में भारत ने शून्य टैरिफ पर 1,30,000 टन मलाई रहित दुग्ध पाउडर का आयात किया। इसके एक बड़े भाग के पंजाब आने पर इसका भारी विरोध हुआ। नतीजतन, दूध पर टैरिफ को बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया गया। लेकिन एक बार फिर यूरोपीय संघ अपनी ताकत दिखाते हुए प्रस्तावित यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के तहत दूध पर टैरिफ में 90 प्रतिशत की कटौती की मांग कर रहा है। यूरोपीय संघ भारत को अपने दुग्ध और दुग्ध उत्पादों के लिए एक बड़े बाजार की तरह देख रहा है और इस बात के पूरे संकेत हैं कि भारत अपने घरेलू डेयरी बाजार को यूरोपीय संघ आयातों के लिए खोलेगा।

दूसरी ओर अमेरिका में डेयरी फार्मों की संख्या में 1992 की तुलना में 61 प्रतिशत की कमी आई है। वर्तमान में वहां केवल 51,481 डेयरी फार्म ही बचे हैं। ये फार्म 2009 से 27,500 करोड़ रुपयों की सब्सिडी प्राप्त कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि अमेरिका में दुग्ध मूल्यों का एक-तिहाई हिस्सा अनुदानित है। बाजार अर्थव्यवस्था के दौर में अमूमन यह माना जाता है कि अमेरिका या यूरोप के किसान निजी आपूर्ति शृंखला पर पूरी तरह आश्रित होते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। यूरोपीय संघ ने मार्च, 2009 के बाद से डेयरी किसानों से अधिक्य वाले मक्खन और दुग्ध को क्रमशः 2,218 और 1,698 यूरो प्रति टन के हिसाब से खरीदना प्रारंभ किया।

अमेरिका में मिल्क प्राइस सपोर्ट प्रोग्राम के तहत यह तय किया गया है कि सरकार चीज, मक्खन और वसाविहीन दुग्ध उत्पादों के आधिक्य को एक न्यूनतम मूल्य पर खरीदेगी। आखिर इसकी क्या वजह है कि हमारी राज्य सरकारें मूल्यों में गिरावट आने पर अपने डेयरी किसानों को सहारा देने के लिए ऐसे ही अनुदान नहीं दे सकतीं?

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारों के पास संसाधनों की कमी है। पंजाब ने भटिंडा रिफाइनरी में निवेश करने के लिए इस्पात किंग लक्ष्मी मित्तल को पांच वर्षों में 1,250 करोड़ रुपयों का ब्याज मुक्त कर्ज और 15 वर्षों का कर्ज अवकाश दिया है। ऐसे में यह मानने की कोई बड़ी वजह नहीं है कि राज्य सरकारें अपने लगातार कम होते छोटे डेयरी किसानों को नया जीवन नहीं दे सकतीं। इसके लिए सबसे पहले राज्य सरकारों को दूध के सरकारी खरीद मूल्य को कम से कम 25 रुपये प्रति लीटर करने के लिए सहकारी संघों को अनुदान देने पर विचार करना होगा। इसके अलावा इन किसानों के लिए बैंक ऋणों पर ब्याज की दर भी कम की जानी चाहिए।
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