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मंजिलें और भी हैं: खोए बच्चों को परिवार से मिलाकर मिलता है सुकून

माइक मूर्ति Published by: माइक मूर्ति Updated Mon, 16 Sep 2019 03:41 AM IST
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Mike Murthy - फोटो : अमर उजाला

मूर्ति मेरा नाम है, पर इसके आगे माइक लगना दिलचस्प होने के साथ रोचकता से भरा है। मैं तमिलनाडु के रामेश्वरम का रहने वाला हूं। बचपन से ही मेरी आवाज थोड़ी तेज और भारी थी। यह तकरीबन पचपन वर्ष पहले की बात है। मैं रामेश्वरम में एक होटल में बैठा था। मैंने खाने के लिए कुछ मंगाने हेतु आवाज दी। उस दौरान होटल वाले के साथ मेरी कुछ बात हुई। मेरी टेबल के पीछे एक पुलिसकर्मी बैठा हुआ था।

मेरी आवाज से आकर्षित होकर पुलिसकर्मीं ने मेलों और उत्सवों के दौरान खोए बच्चों की उद्घोषणा करने के लिए पुलिस विभाग में मुझे नौकरी का प्रस्ताव दिया। मैं चूंकि तब काम की तलाश में था, इसलिए तैयार हो गया। हालांकि तब तक मैंने सोचा भी नहीं था कि यह काम मेरे जीवन का उद्देश्य बनने जा रहा है। जब मैंने एक उत्सव के दौरान पहली बार माइक संभाला और पूरे दिन में तकरीबन बीस बच्चों को उनके परिजनों से मिलवाया, तो आईजी ने खुश होकर मुझे कुछ रुपये दिए।



उस समय वह एक बड़ी रकम थी। तब से पुलिस विभाग की ओर से मैं हर तरह के छोटे-बड़े कार्यक्रमों और धार्मिक उत्सवों में भीड़-भाड़ के दौरान बिछड़ने वाले लोगों और बच्चों को उनके परिजनों से मिलाने के लिए उद्घोषक का काम करने लगा। पचास वर्ष से ज्यादा वक्त के सफर में मैंने तमिल, अंग्रेजी, मराठी, हिंदी, कई भाषाओं में घोषणा करना सीख लिया, जिस कारण रामेश्वरम जैसे मशहूर तीर्थस्थल पर भी मुझे बुलाया जाने लगा।

इस सफर में मुझे मीठे और कड़वे, दोनों ही तरह के अनुभव हुए। जैसे, मुझे इसका दुख है कि मैं खोए हुए सभी बच्चों को उनके मां-बाप और परिवार से नहीं मिला पाया। एक बार एक मेले में एक लड़की खो गई, जिसके लिए पूरे दिन मैंने भूखे रहकर घोषणा की। लेकिन शाम को उसका शव मंदिर के पास के तालाब में तैरता हुआ मिला। उस घटना के बाद मैं कुछ दिन तक बेहद परेशान रहा। मैं अपने काम के मूल्य को जानता हूं, और इसके सेवा भाव को महसूस भी करता हूं।

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Mike Murthy - फोटो : अमर उजाला
मूर्ति मेरा नाम है, पर इसके आगे माइक लगना दिलचस्प होने के साथ रोचकता से भरा है। मैं तमिलनाडु के रामेश्वरम का रहने वाला हूं। बचपन से ही मेरी आवाज थोड़ी तेज और भारी थी। यह तकरीबन पचपन वर्ष पहले की बात है। मैं रामेश्वरम में एक होटल में बैठा था। मैंने खाने के लिए कुछ मंगाने हेतु आवाज दी। उस दौरान होटल वाले के साथ मेरी कुछ बात हुई। मेरी टेबल के पीछे एक पुलिसकर्मी बैठा हुआ था।

मेरी आवाज से आकर्षित होकर पुलिसकर्मीं ने मेलों और उत्सवों के दौरान खोए बच्चों की उद्घोषणा करने के लिए पुलिस विभाग में मुझे नौकरी का प्रस्ताव दिया। मैं चूंकि तब काम की तलाश में था, इसलिए तैयार हो गया। हालांकि तब तक मैंने सोचा भी नहीं था कि यह काम मेरे जीवन का उद्देश्य बनने जा रहा है। जब मैंने एक उत्सव के दौरान पहली बार माइक संभाला और पूरे दिन में तकरीबन बीस बच्चों को उनके परिजनों से मिलवाया, तो आईजी ने खुश होकर मुझे कुछ रुपये दिए।

उस समय वह एक बड़ी रकम थी। तब से पुलिस विभाग की ओर से मैं हर तरह के छोटे-बड़े कार्यक्रमों और धार्मिक उत्सवों में भीड़-भाड़ के दौरान बिछड़ने वाले लोगों और बच्चों को उनके परिजनों से मिलाने के लिए उद्घोषक का काम करने लगा। पचास वर्ष से ज्यादा वक्त के सफर में मैंने तमिल, अंग्रेजी, मराठी, हिंदी, कई भाषाओं में घोषणा करना सीख लिया, जिस कारण रामेश्वरम जैसे मशहूर तीर्थस्थल पर भी मुझे बुलाया जाने लगा।

इस सफर में मुझे मीठे और कड़वे, दोनों ही तरह के अनुभव हुए। जैसे, मुझे इसका दुख है कि मैं खोए हुए सभी बच्चों को उनके मां-बाप और परिवार से नहीं मिला पाया। एक बार एक मेले में एक लड़की खो गई, जिसके लिए पूरे दिन मैंने भूखे रहकर घोषणा की। लेकिन शाम को उसका शव मंदिर के पास के तालाब में तैरता हुआ मिला। उस घटना के बाद मैं कुछ दिन तक बेहद परेशान रहा। मैं अपने काम के मूल्य को जानता हूं, और इसके सेवा भाव को महसूस भी करता हूं।

मैं उद्घोषक तो हूं ही, कई बार बच्चों की खोजबीन में पुलिस की मदद भी करता हूं। एक त्योहार की भीड़-भाड़ में तीन साल का एक बच्चा खो गया। मैंने शाम तक उसका इंतजार किया, जब वह नहीं आया तो मैं पुलिस के साथ मिलकर आसपास के गांव में बच्चे को ढूंढने लगा। आखिरकार देर रात एक घर में बच्चा सुरक्षित मिल गया, दरअसल सुन व बोल न पाने के कारण बच्चा अपने माता-पिता के बारे में कुछ बता नहीं पा रहा था।

बड़े उत्सवों में भीड़ के चलते कई बार मुझे जान का जोखिम भी उठाना पड़ा। कई बार लोगों के बीच झगड़े और विवाद की स्थिति आ गई, पर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए मैं वहां मौजूद रहा। यह काम अब मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और मैंने खुद को इसमें ढाल लिया है।

पिछले पचास साल में मैंने तकरीबन अड़तालीस हजार बच्चों को उनके परिवारों से मिलवाया है। मेरे लिए वह पल बहुत संतोषप्रद होता है, जब खोया हुआ बच्चा अपने माता-पिता से मिलता है। उस बच्चे और उसके परिजनों की आंखों में सुकून देखकर मेरे दिल को भी सुकून मिलता है। यही वजह है कि मैं इस काम को ताउम्र करते रहना चाहता हूं।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)
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