मूर्ति मेरा नाम है, पर इसके आगे माइक लगना दिलचस्प होने के साथ रोचकता से भरा है। मैं तमिलनाडु के रामेश्वरम का रहने वाला हूं। बचपन से ही मेरी आवाज थोड़ी तेज और भारी थी। यह तकरीबन पचपन वर्ष पहले की बात है। मैं रामेश्वरम में एक होटल में बैठा था। मैंने खाने के लिए कुछ मंगाने हेतु आवाज दी। उस दौरान होटल वाले के साथ मेरी कुछ बात हुई। मेरी टेबल के पीछे एक पुलिसकर्मी बैठा हुआ था।
मेरी आवाज से आकर्षित होकर पुलिसकर्मीं ने मेलों और उत्सवों के दौरान खोए बच्चों की उद्घोषणा करने के लिए पुलिस विभाग में मुझे नौकरी का प्रस्ताव दिया। मैं चूंकि तब काम की तलाश में था, इसलिए तैयार हो गया। हालांकि तब तक मैंने सोचा भी नहीं था कि यह काम मेरे जीवन का उद्देश्य बनने जा रहा है। जब मैंने एक उत्सव के दौरान पहली बार माइक संभाला और पूरे दिन में तकरीबन बीस बच्चों को उनके परिजनों से मिलवाया, तो आईजी ने खुश होकर मुझे कुछ रुपये दिए।