पलायन उत्तराखंड में एक बेहद भावनात्मक मुद्दा है और इस बात पर उल्लेखनीय रूप से आम सहमति है कि यह राज्य के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है। उत्तराखंड में यह कहावत बेहद आम है कि, 'पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहां के काम नहीं आती'। गहरे तक पैठ गई इस भावना के जवाब के रूप में उत्तराखंड सरकार ने पिछले साल ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग का गठन किया था, जो कि देश में अपने तरह की पहली संस्था है। इसे अन्य चीजों के अलावा राज्य के विभिन्न हिस्सों से होने वाले पलायन की व्यापकता और परिमाण का आकलन करना था। इस आयोग ने हाल ही में उत्तराखंड सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी है।
आखिर यह रिपोर्ट हमें राज्य में पलायन के बारे में क्या बताती है?
इस रिपोर्ट के फौरी अध्ययन से दो व्यापक निष्कर्ष उभरकर सामने आते हैं। पहला, वृहत राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो पलायन का मुद्दा देश के बाकी हिस्से से अलग नहीं लगता। लिहाजा लोकप्रिय नजरिया और कथानक इस समस्या की गंभीरता को प्रतिबिंबित नहीं करते। दूसरा, पलायन के कारणों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव के बारे में यह रिपोर्ट हमें कुछ भी नई जानकारी नहीं देती; यह सिर्फ उन्हीं बातों की पुष्टि करती है, जिनके बारे में हम सब जानते हैं। इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा लाभ और योगदान यह है कि यह ऐसे अनेक दावों को आंकड़ों से पुष्ट करती है।
इन दोनों निष्कर्षों को यहां समझने की कोशिश की गई है। उत्तराखंड में पलायन की स्थिति कैसी है और दूसरे राज्यों से खासतौर से पड़ोसी हिमालयी प्रदेश हिमाचल प्रदेश से इसकी तुलना किस तरह की जा सकती है? प्रति हजार आबादी में पलायन से संबंधित एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन) के 2007-08 के आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि ऐसे 17 राज्यों में, जिनके आंकड़े प्रस्तुत किए गए, उत्तराखंड 486 अंकों के साथ हिमाचल प्रदेश (532 अंक) के बाद दूसरे नंबर पर है। उच्च अंक वाले कुछ अन्य राज्य इस तरह से हैं- छत्तीसगढ़ (452), ओडिशा (442), महाराष्ट्र (421) और आंध्र प्रदेश (400)। उल्लेखनीय है कि इन सभी राज्यों में पलायन करने वाली महिलाओं की संख्या पलायन करने वाले पुरुषों से अधिक है।
महिलाओं के पलायन की वजह निरपवाद रूप से विवाह संबंधी अधिक है, बजाय बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश के। पुरुषों के पलायन की सर्वाधिक दर हिमाचल (455) में है, जबकि उत्तराखंड (397) उसके बाद दूसरे नंबर पर है। हालांकि उत्तराखंड में पुरुष पलायन की दर उच्च है, लेकिन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्थिति कोई बहुत भिन्न नहीं है। इसलिए इस संबंध में उत्तराखंड को सबसे अलग नहीं माना जा सकता; यानी पलायन की स्थिति कई अन्य राज्यों में कमोबेश एक जैसी है। दिलचस्प यह है कि पलायन की दर हिमाचल प्रदेश में सर्वाधिक है, लेकिन उत्तराखंड की तरह वहां इसे बड़ा मुद्दा नहीं माना जाता।
उत्तराखंड पलायन आयोग द्वारा ग्राम पंचायत स्तर पर एकत्र किए गए प्राथमिक आंकड़े राज्य में पलायन का अपेक्षाकृत कम स्तर दिखाते हैं। पलायन को अर्द्ध स्थायी और स्थायी वर्गों में बांटा गया है। अर्द्ध स्थायी प्रवासियों को ऐसे लोगों से परिभाषित किया गया है, जो कि राज्य से अस्थायी तौर पर बाहर रहते हैं और नियमित अंतराल के बाद अपने घर आते रहते हैं। दूसरी ओर स्थायी प्रवासी ऐसे लोग हैं, जो स्थायी तौर पर अपने गांवों से पलायन कर चुके हों या जो कभी-कभार ही अपने गांव आते हों। आयोग ने अनुमान लगाया कि दस वर्ष की अवधि में 6,338 ग्राम पंचायतों से कुल 3,83,726 लोगों ने अर्ध स्थायी तौर पर पलायन किया और 3,946 ग्राम पंचायतों से कुल 1,18,981 लोगों ने स्थायी तौर पर पलायन किया। यानी एक ग्राम पंचायत से औसतन दस वर्ष के दौरान 30 या एक वर्ष में तीन पलायन हुआ।
2011 की जनगणना के अनुपात में देखें, तो दस वर्ष की अवधि में राज्य में स्थायी प्रवासन की संख्या 1.18 फीसदी और अर्ध स्थायी प्रवासन की संख्या 3.8 फीसदी थी। दोनों को मिला दिया जाए, तो दस वर्ष की अवधि में राज्य की पांच फीसदी आबादी ने पलायन किया। इसे उच्च नहीं माना जा सकता और न ही यह चिंता का कारण है।
अगला प्रश्न थाः आखिर लोग पलायन क्यों करते हैं? पलायन आयोग की रिपोर्ट इस संबंध में कुछ भी नई जानकारी नहीं देती। यह उन्हीं बातों की पुष्टि करती है, जिसके बारे में सब जानते हैं। आयोग के आंकड़े से पलायन के जो मुख्य कारण उभरकर सामने आते हैं, उनमें जीवन-यापन/रोजगार के बेहतर अवसर, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएं प्रमुख हैं। ये तीनों ही कारण राज्य से होने वाले तीन चौथाई पलायन के लिए जिम्मेदार हैं। बेहतर जीवन-यापन की चाहत और रोजगार के बेहतर अवसर विभिन्न जिलों से होने वाले पलायन के लिए 41 से 77 फीसदी तक जिम्मेदार हैं। प्रतिभागियों के मुताबिक, राज्य में छह फीसदी पलायन की वजह जंगली जानवरों का आतंक है। पहाड़ी जिलों की तुलना में उधम सिंह नगर और हरिद्वार जैसे मैदानी जिलों में पलायन काफी कम है।
सार रूप में देखें, तो पलायन पर उत्तराखंड में गठित अपने तरह के इस पहले आयोग की रिपोर्ट कीमती प्राथमिक जानकारी उपलब्ध कराती है, लेकिन इसमें विश्लेषण की कमी है। यह रिपोर्ट पलायन के कारणों पर कोई खास जानकारी नहीं देती। आंखें खोल देने वाली बात यह है कि पलायन वास्तव में उतना गंभीर मुद्दा नहीं है, जैसा कि सामान्य तौर पर आम चर्चा या राजनीतिक बहसों में माना जाता है। सो, कोई यह पूछ सकता है, तो फिर इतना हंगामा क्यों बरपा है? क्या हमें पलायन को भूलकर राज्य के विकास के लिए नहीं जुट जाना चाहिए?
-लेखक देहरादून स्थित दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर के मानद निदेशक हैं।