फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बलात्कार के झूठे आरोप का दंश झेलते पुरुष

Mon, 10 Nov 2014 07:33 PM IST
क्षमा शर्मा
विज्ञापन
विज्ञापन
दिल्ली की एक बहू ने अपने ससुर पर छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। बहू की शिकायत सुनकर सास-ससुर दंग रह गए, क्योंकि महिला द्वारा शिकायत दर्ज कराने से कई साल पहले ही उन्होंने बहू और बेटे के खिलाफ शिकायत स्थानीय थाने और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराई थी। उस शिकायत की प्रति सास ने ढूंढ़ निकाली और अदालत के सामने प्रस्तुत की। इसमें कहा गया था कि बहू उन्हें धमकी देती है कि अगर सास-ससुर ने अपनी संपत्ति उसके नाम नहीं की, तो वह उन पर आरोप लगाकर उन्हें जेल भिजवा देगी। इस शिकायत के आधार पर अदालत ने ससुर को जमानत दे दी।
विज्ञापन


ऐसी ही एक दूसरी घटना पश्चिमी दिल्ली की है। यहां के एक प्रॉपर्टी डीलर पर उसकी भाभी ने दुष्कर्म का आरोप लगाया। आरोपी तीन छोटे बच्चों का पिता है। उसका अपने भाई के साथ पैसे के लेन-देन का विवाद चल रहा था। भाभी के आरोप के कारण वह चार महीने जेल में रहा। दो साल मुकदमा भी चला। पिछले हफ्ते जब अदालत ने उसे बाइज्जत बरी किया, तो उसने कहा-भले ही अदालत ने मुझे बाइज्जत बरी कर दिया है, मगर मुझ पर क्या बीती, यह मैं ही जानता हूं। मैं घर-बाहर कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहा। हालांकि अदालत ने उसकी भाभी और भाई के खिलाफ झूठे आरोप लगाने और झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने के कारण कार्रवाई करने की बात कही है। बल्कि उसने यह भी कहा कि दुष्कर्म की शिकार लड़की को जब रेप सरवाइवर कहा जाता है, तो इस तरह के मुकदमों से बाइज्जत बरी हुए पुरुषों को रेप केस सरवाइवर कहा जाना चाहिए। ऐसे मामलों में पुरुषों को जिस पीड़ा, चिंता और मुसीबत से गुजरना पड़ता है, आखिर उस तरफ किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता? एक तरफ समाज में ऐसे दरिंदे हैं, जिनके लिए छह महीने की बच्ची, दो साल की लड़की या अस्सी साल की महिला सहज शिकार हैं। दूसरी तरफ वे चालाक और धूर्त किस्म की औरतें हैं, जो अपने निजी स्वार्थ के कारण झूठा आरोप लगाने से भी बाज नहीं आतीं।

कानून के इस दुरुपयोग के कारण सैकड़ों की संख्या में सताई गई या बलात्कार की शिकार लड़कियों का भारी नुकसान हो रहा है। झूठे आरोप लगाने वाली औरतों के कारण उन्हें भी लोग शक की नजर से देखते हैं। इसलिए स्त्रियों के लिए काम करने वाले लोगों और संगठनों की यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि वे कानून के सही इस्तेमाल के लिए औरतों को जागरूक करें। वैसे यह मानी हुई बात है कि जब भी कानून एकपक्षीय होता है या एक पक्ष को ही सारे अधिकार देता है, तो उसका दुरुपयोग होना निश्चित है। अब यह बात भी गए जमाने की हो गई है कि औरत किसी पर झूठे बलात्कार का आरोप लगाकर, अपनी प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगा सकती। ऐसे ही कुछ मामलों में जब किसी पुरुष को अदालत बरी करती है, तो कुछ लोग कहते हैं कि यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि अदालतें पितृसत्ता से संचालित हैं। अगर बहुत से पुरुष मात्र पितृसत्ता के कारण छूट जाते हैं, तो उन पुरुषों का क्या, जिन्हें पुलिस समय रहते पकड़ती है और अदालतें कठोर सजा देती हैं। तब यह तर्क कहां जाता है?
विज्ञापन
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें