गिरीश कारनाड एक महामानव थे। पिछले हफ्ते बंगलूरू में सोते समय उनका निधन हो गया। कारनाड ने चार तरह का करियर चुना और वह उन सबमें उत्कृष्ट थे। वह तार्किक रूप से आजादी के बाद भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली नाटककार थे, जिनका रचनात्मक योगदान अपने विषयगत और लौकिक श्रेणी में आश्चर्यजनक रूप से व्यापक था। उन्होंने आधा दर्जन शानदार नाटक लिखे; इनमें राजनीतिक दृष्टांत तुगलक, सामाजिक सुधारवादी तलेदंड और गहरा हास्य व्यंग्य ओदकलू बिम्ब शामिल था। (मूलतः ये सभी कन्नड़ में लिखे गए और इनमें से सभी का आठवीं अनुसूची में शामिल प्रायः अधिकांश भाषाओं में प्रदर्शन हुआ)।
वह एक असाधारण अभिनेता थे, जैसा कि श्याम बेनेगल की शुरुआती हिंदी फिल्मों में और पट्टाभिराम रेड्डी की कन्नड़ क्लासिक संस्कार में वह नजर आए थे। वह एक कुशल निर्देशक थे और उन्होंने के वी पुत्तप्पा और एस एल भाइरप्पा के प्रमुख उपन्यासों पर फिल्में बनाई। वह फिल्म ऐंड टेलीविजिन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे (एफटीआईआई), संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली और नेहरू सेंटर, लंदन के काबिल प्रशासक थे। एफटीआईआई में उन्होंने अन्य लोगों के साथ ही नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी और टॉम आल्टर को तराशा।
एक बार मैं बंगलूरू से मुंबई जा रहा था। कारनाड भी उसी फ्लाइट में मुझसे कुछ आगे की पंक्ति पर बैठे हुए थे। जैसे ही मैं उनके पास से गुजरा तो वह कागज के दस्ते पर पेन से कुछ कर रहे थे। मैंने जब उनसे पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो उन्होंने बताया कि वह अपने नए नाटक के मराठी अनुवाद का प्रूफ देख रहे हैं। कारनाड के प्रति मेरे मन में पहले ही बहुत सम्मान था और इसके बाद वह और बढ़ गया। एक शख्स जिसकी मातृभाषा कोंकणी थी और जो कन्नड़ में लिखता था, धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलता था और वह मराठी में भी पूरी तरह से सहज था।