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गिरीश कारनाड से जुड़ी यादें : उन्होंने कभी भी अपनी देशभक्ति और एक्टिविज्म का प्रदर्शन नहीं किया

 रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 16 Jun 2019 01:53 AM IST
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Girish Karnad - फोटो : social media
गिरीश कारनाड एक महामानव थे। पिछले हफ्ते बंगलूरू में सोते समय उनका निधन हो गया। कारनाड ने चार तरह का करियर चुना और वह उन सबमें उत्कृष्ट थे। वह तार्किक रूप से आजादी के बाद भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली नाटककार थे, जिनका रचनात्मक योगदान अपने विषयगत और लौकिक श्रेणी में आश्चर्यजनक रूप से व्यापक था। उन्होंने आधा दर्जन शानदार नाटक लिखे; इनमें राजनीतिक दृष्टांत तुगलक, सामाजिक सुधारवादी तलेदंड और गहरा हास्य व्यंग्य ओदकलू बिम्ब शामिल था। (मूलतः ये सभी कन्नड़ में लिखे गए और इनमें से सभी का आठवीं अनुसूची में शामिल प्रायः अधिकांश भाषाओं में प्रदर्शन हुआ)। 

वह एक असाधारण अभिनेता थे, जैसा कि श्याम बेनेगल की शुरुआती हिंदी फिल्मों में और पट्टाभिराम रेड्डी की कन्नड़ क्लासिक संस्कार में वह नजर आए थे। वह एक कुशल निर्देशक थे और उन्होंने के वी पुत्तप्पा और एस एल भाइरप्पा के प्रमुख उपन्यासों पर फिल्में बनाई। वह फिल्म ऐंड टेलीविजिन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे (एफटीआईआई), संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली और नेहरू सेंटर, लंदन के काबिल प्रशासक थे। एफटीआईआई में उन्होंने अन्य लोगों के साथ ही नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी और टॉम आल्टर को तराशा।


एक बार मैं बंगलूरू से मुंबई जा रहा था। कारनाड भी उसी फ्लाइट में मुझसे कुछ आगे की पंक्ति पर बैठे हुए थे। जैसे ही मैं उनके पास से गुजरा तो वह कागज के दस्ते पर पेन से कुछ कर रहे थे। मैंने जब उनसे पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो उन्होंने बताया कि वह अपने नए नाटक के मराठी अनुवाद का प्रूफ देख रहे हैं। कारनाड के प्रति मेरे मन में पहले ही बहुत सम्मान था और इसके बाद वह और बढ़ गया। एक शख्स जिसकी मातृभाषा कोंकणी थी और जो कन्नड़ में लिखता था, धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलता था और वह मराठी में भी पूरी तरह से सहज था।
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Girish Karnad - फोटो : social media
गिरीश कारनाड एक महामानव थे। पिछले हफ्ते बंगलूरू में सोते समय उनका निधन हो गया। कारनाड ने चार तरह का करियर चुना और वह उन सबमें उत्कृष्ट थे। वह तार्किक रूप से आजादी के बाद भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली नाटककार थे, जिनका रचनात्मक योगदान अपने विषयगत और लौकिक श्रेणी में आश्चर्यजनक रूप से व्यापक था। उन्होंने आधा दर्जन शानदार नाटक लिखे; इनमें राजनीतिक दृष्टांत तुगलक, सामाजिक सुधारवादी तलेदंड और गहरा हास्य व्यंग्य ओदकलू बिम्ब शामिल था। (मूलतः ये सभी कन्नड़ में लिखे गए और इनमें से सभी का आठवीं अनुसूची में शामिल प्रायः अधिकांश भाषाओं में प्रदर्शन हुआ)। 

वह एक असाधारण अभिनेता थे, जैसा कि श्याम बेनेगल की शुरुआती हिंदी फिल्मों में और पट्टाभिराम रेड्डी की कन्नड़ क्लासिक संस्कार में वह नजर आए थे। वह एक कुशल निर्देशक थे और उन्होंने के वी पुत्तप्पा और एस एल भाइरप्पा के प्रमुख उपन्यासों पर फिल्में बनाई। वह फिल्म ऐंड टेलीविजिन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे (एफटीआईआई), संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली और नेहरू सेंटर, लंदन के काबिल प्रशासक थे। एफटीआईआई में उन्होंने अन्य लोगों के साथ ही नसीरूद्दीन शाह, ओम पुरी और टॉम आल्टर को तराशा।

एक बार मैं बंगलूरू से मुंबई जा रहा था। कारनाड भी उसी फ्लाइट में मुझसे कुछ आगे की पंक्ति पर बैठे हुए थे। जैसे ही मैं उनके पास से गुजरा तो वह कागज के दस्ते पर पेन से कुछ कर रहे थे। मैंने जब उनसे पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो उन्होंने बताया कि वह अपने नए नाटक के मराठी अनुवाद का प्रूफ देख रहे हैं। कारनाड के प्रति मेरे मन में पहले ही बहुत सम्मान था और इसके बाद वह और बढ़ गया। एक शख्स जिसकी मातृभाषा कोंकणी थी और जो कन्नड़ में लिखता था, धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलता था और वह मराठी में भी पूरी तरह से सहज था।

कारनाड सिर्फ अनेक भाषाओं में दक्षता के कारण ही अन्य लेखकों और कलाकारों से अलग नहीं थे। मैं ऐसे किसी और शख्स को नहीं जानता, जो इतनी उदारता के साथ अपने शरीर और अपनी आत्मा में भारतीय सभ्यता को लेकर इतना समृद्ध और परिपूर्ण हो और वह भी खुद को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरते बिना।

अपने जीवन और काम में वह उत्तर और दक्षिण, लोक और शास्त्रीय, लोकगत और विद्धता में पूरी तरह से घुले मिले रहे। वह केसरबाई केरकर और मोहम्मद रफी के संगीत पर, बालासरस्वती और फराह खान के नृत्य पर तथा बासवा और आंबेडकर के नैतिक दर्शन पर बोलते हुए भी इसी तरह से काफी सहज रहते थे। वह शेक्सपीयर और फिलिप लार्किन की अंतर्दृष्टि पर भी बात कर सकते थे।

सितंबर, 2017 में जब गौरी लंकेश की हत्या हुई थी, तब यह अफवाह उड़ी थी कि आतंकियों की हिट लिस्ट में अगले लेखक के रूप में गिरीश कारनाड हो सकते हैं। मैंने एक सुबह गिरीश को फोन किया और उनसे पूछा कि क्या मैं दोपहर में उनसे मिल सकता हूं। मेरे घर से उनकी दूरी तय करने में एक घंटे लगते हैं और उनकी प्रतिबद्धताओं को देखते हुए मैं उनसे मुलाकात के लिए अक्सर कई दिन पहले उन्हें मेल करता था।

गिरीश ने अचानक आए मेरे फोन को सहजता से लिया और मुझे अपने घर बुलाया। मैं ड्राइव करता हुए निर्जन शहर को पार कर कारनाड के घर जेपी नगर पहुंचा। घर के बाहर लेखक की 'सुरक्षा' में तैनात वर्दीधारी गार्ड कुर्सी पर उनींदा बैठा हुआ था। जैसे ही मेरी कार वहां रुकी वह खड़ा हो गया और मुझे अंदर लेकर गया।

मैं वहां आधा घंटा बिताने के इरादे से गया था, लेकिन चार घंटे तक हम बात करते रहे। बेशक, हमने गौरी लंकेश के साथ ही अन्य मुद्दों पर भी बात की, जिसमें हमारे अपने जीवन के उतार-चढ़ाव भी शामिल थे। मैंने गिरीश से धारवाड़ के उनके शुरुआती दिनों के बारे में पूछा, तो उन्होंने देहरादून में मेरे बचपन के बारे में बात की। हम दोनों छोटे शहरों से महानगरों तक पहुंचे थे; बंगलूरू आने से पहले वह मुंबई गए थे और मैं दिल्ली।

पहले बंगलूरू को हम एक कस्बे के तौर पर जानते थे और जब यहां हम रहने आए तो यह अच्छा खासा शहर बन चुका था। हमने अपने भाई-बहनों और ऐसे अन्य विषयों पर बात की जो अन्यथा हमारी साहित्यिक और बौद्धिक बातचीत का हिस्सा नहीं बनते। उनके भाई संगीतकार हैं, और मेरी बहन डॉक्टर हैं।

जब रात होने लगी तो मैं वापस जाने के लिए उठा। गिरीश चलकर मुझे मेरी कार तक छोड़ने आए। तब वहां सिक्योरिटी गॉर्ड कहीं नहीं था। गिरीश ने मुझे अचानक हुए मेरे प्रवास के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि उन्हें और उनकी डॉक्टर पत्नी सारस को अच्छा लगा। मैंने कहा, 'मुझे लगता है कि एक ही शहर में रहने वाले दो लेखकों को एक-दूसरे की जरूरत तब पड़ी जब एक साथी लेखक की हत्या हो गई।' 

सांस से संबंधित बीमारी के कारण कारनाड खुद भी काफी अस्वस्थ थे। उसके बाद आई जनवरी में वह धारवाड़ गए थे और वह जानते थे कि यह उस शहर की उनकी अंतिम यात्रा थी, जहां वह बड़े हुए, पढ़ाई की और अपने शुरुआती नाटक लिखे थे। उन्होंने मुझे साथ चलने के लिए कहा था। मैं उनके साथ गया। इस तरह मुझे गिरीश कारनाड की अपने गृह नगर की अंतिम यात्रा में जाने का दुर्लभ अवसर मिला। लेकिन यह अवर्णनीय रूप से दुखी करने वाला था। धारवाड़ में सुभाष रोड पर स्थित लक्ष्मी भवन की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैं उनके साथ उनके लंबे समय तक प्रकाशक रहे मनोहर ग्रंथ माला के कार्यालय भी गया, जो वहां का उनका अंतिम प्रवास था।  

कारनाड में उच्च स्तर की सामाजिक चेतना थी और अपने देश के प्रति उनमें गहरा प्रेम था। लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी देशभक्ति और एक्टिविज्म का प्रदर्शन नहीं किया। उनकी मर्यादा और उनकी सादगी ने इसकी इजाजत नहीं दी। उन्होंने निर्देश दिया था कि उनकी मौत के बाद उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान से न की जाए। वह जानते थे कि भांति-भांति के राजनेता वहां आना चाहेंगे और उनकी पार्थिव देह के साथ तस्वीरें खिंचवाएंगे और एक ऐसे शख्स के साथ खुद को जोड़कर अपना पाप धोने की कोशिश करेंगे जो कि महान कन्नड़ लेखक ही नहीं था, बल्कि अपने युग का महान कन्नदिगा (महान सपूत) भी था।  

अवसरवादियों और कट्टरपंथियों का साहस के साथ सामना करने वाले कारनाड को एक एक्टिविस्ट या पब्लिक इंटलैक्चुअल के रूप में देखना उन्हें पूरी तरह न समझ पाने और उनका कद कम करने जैसा है। इसके बजाय हमें उन्हें एक महान नाटककार, शानदार अभिनेता और एक गंभीर शिष्ट व्यक्ति के रूप में याद करना चाहिए, जिन्होंने भारतीय संस्कृति के बारे में उतना ज्ञान तो विस्मृत कर दिया होगा जितना कि भारतीय संस्कृति के आज के रक्षक जानते भी न हों।
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