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सिर्फ एक अफसाना बाकी रह गया

Sat, 30 Mar 2013 10:56 PM IST
ख्वाजा अहमद अब्बास
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मेरी फिल्म ''चार दिल चार राहें'' की शूटिंग का पहला दिन था। बारिश मूसलाधार हो रही थी। पिछले बारह घंटे से लगातार बारिश होती रही थी। रात भर में एक पल के लिए भी झड़ी बंद नहीं हुई थी। मेरा उसूल है कि जिस दिन शूटिंग हो, सुबह-सवेरे ही स्टूडियो पहुंच जाता हूं।
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उस दिन भी मैं किसी तरह मॉडर्न स्टूडियो तक पहुंच गया। सड़कें पानी में डूबी हुई थीं। टैक्सी सड़क पर ऐसे चल रही थी, जैसे नदी में नाव चलती है। एक बार इंजन में पानी चला गया और टैक्सी रुक गई। किसी तरह ड्राइवर ने इंजन को फिर चालू किया और स्टूडियो के दरवाजे तक पहुंचा दिया, मगर अंदर आने से उसने साफ इन्कार कर दिया। स्टूडियो के अंदर तो सड़क का नामो-निशान ही नहीं था।

सारा कम्पाउंड एक तालाब बना हुआ था। मैंने पतलून के पायचे घुटनों तक चढ़ा लिए। जूते उतार कर हाथ में लिए और पानी में उतर पड़ा। पानी में सराबोर स्टूडियो के अंदर गया, तो देखा कि आग जला कर गीले सेट को सुखाया जा रहा है। उस वक्त तक मेरा कोई असिस्टेंट भी नहीं आया था। सिर्फ मेकअप-रूम में पिंडरी जूकर अपनी दुकान लगाए बैठा था। पिंडरी ने कहा था, 'अब्बास साहब, आज तो आपको शूटिंग कैंसिल करनी पड़ेगी। ऐसी बरसात में कौन हीरोइन अपने घर से निकलेगी'?
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मैंने कहा, 'शूटिंग का पहला दिन है। हीरोइन की परीक्षा भी हो जाएगी।' पिंडरी ने पूछा, हीरोइन ने कितने बजे आने को कहा था? मैंने जवाब दिया, 'साढ़े सात बजे, क्योंकि मैंने उसे बता दिया है कि शूटिंग का वक्त साढ़े नौ बजे से है, मगर काला मेकअप करने में दो घंटे लगेंगे।' पिंडरी ने अपनी कलाई पर लगी हुई घड़ी देखकर कहा, 'साढ़े सात तो बज गए।'

ठीक उस वक्त मूसलाधार पानी गिरने की आवाज को चीरता हुआ एक मोटर का हॉर्न सुनाई दिया और एक मोटर पानी में तैरती हुई मेकअप रूम की सीढ़ियों के पास आकर रुक गई, मगर वह सीढ़ियां खुद पानी में डूबी हुई थी। अब मोटर में से पहले हीरोइन के दो नंगे, गोरे-गोरे, कोमल से पांव बाहर निकले। फिर दो हाथ निकले, जिनमें वह अपनी चप्पल संभाले हुए थी। फिर सफेद सूती साड़ी पहने, सिर पर एक बड़ा सा तौलिया ओढे़ हुए हीरोइन बाहर आयी और बेझिझक पानी में से होती हुई अपने मेकअप रूम तक पहुंच गई।

'आदाब-अर्ज, मुझे देर तो नहीं हुई', उसने कहा और आईने के सामने मेकअप करने बैठ गयी, 'डॉयलाग मैंने याद कर लिए हैं। इतने अच्छे लिखे हैं आपने कि याद करने में कोई दिक्कत नहीं हुई, मगर हरियाणा की देहातिन कैसे बोलती है, वह अंदाज और वह लहजा आपको सिखाना होगा', वह हीरोइन थी-मीना कुमारी।

हीरोइन नंबर वन
हमारी ‘नया संसार’ की यूनिट में वह ''हीरोइन नंबर वन'' कहलाती थी और कहलाती रहेंगी। ''चार दिल, चार राहें'' में तीन हीरोइन थीं, मीना कुमारी, निम्मी, कुमकुम। हर एक ने अपनी-अपनी कहानी में लाजवाब काम किया था, लेकिन हमारे स्टाफ के सब लोग हीरोइन नंबर वन मीनाकुमारी को कहते थे। क्यों? यह किसी को नहीं मालूम था। बस कहने लगे थे। शायद इसलिए कि वह किसी तरह से भी हीरोइन नहीं लगती थी।

फिल्म स्टारों जैसे भड़कदार कपड़े नहीं पहनती थी। सफेद क्लिप लगी कॉटन की साड़ी उसका पसंदीदा लिबास था। फिल्म स्टारों की तरह इठला कर बात नहीं करती थी। फिल्म स्टारों की तरह नखरे नहीं करती थी। डायलॉग घर से याद कर के आती। आते ही यह नहीं पूछती थी कि आज कौन सा सीन करना है? या आपने जो डायलॉग के कागज भिजवाए थे, वह तो मैं घर भूल आई हूं। इस हीरोइन से सब लोग बहुत खुश रहते थे।

‘चार दिल चार राहें’ की कहानी जब मैंने उसे और उसके शौहर अपने पुराने दोस्त कमाल अमरोही को सुनाई तो मेरी हार्दिक इच्छा थी कि वह ''चावली देहातिन'' का कैरेक्टर करे, मगर मैंने कहा, 'आप तीनों में से किसी एक कैरेक्टर को पसंद कर लीजिए। दूसरी हीरोइनों का चुनाव बाद में होगा।' कहानी सुनने के बाद ही उसने फौरन कहा, मैं ''चावली देहातिन'' का कैरेक्टर करुंगी। कमाल अमरोही ने मुस्कुरा कर कहा, 'कैरेक्टर तो सचमुच वही तुम्हारे काबिल है। शर्त यह है कि जैसे अब्बास साहब ने अपनी कहानी में लिखा है, काली-कलूटी का मेकअप करना होगा।' मीना कुमारी ने कहा, 'वह तो करना ही होगा, इसलिए तो मैंने यह कैरेक्टर अपने लिए चुना है।'

एक गोरी, एक काली
एक दिन ऐसा आया कि शूटिंग हो रही थी कि सेट पर कोई साहब तशरीफ लाए। कहने लगे, सुना है, मीनाकुमारी इस फिल्म की हीरोइन है। मैंने कुछ आश्चर्य से उनकी तरफ देखा और पूछा, ‘आप मीना कुमारी को पहचानते हैं?’ क्यों नहीं? दर्जनों फिल्मों में देखा है। फिर जिंदगी में भी दो-चार फिल्मों के सेट पर देख चुका हूं। मैं मुस्कुरा कर खामोश हो गया। फिर वे बोले, वह कोने में काली-कलोटी सी कौन बैठी है? तब मैंने जवाब दिया,  ‘जी, वह काली-कलोटी, ''चावली देहातिन'' है, जो इस कहानी का केंद्रीय किरदार है, जो इस फिल्म की हीरोइन है और जिसे दुनिया मीना कुमारी के नाम से जानती है।

आज वह इस दुनिया में नहीं है, तो मुझे महसूस होता है कि सारी उम्र मीनाकुमारी उसी महजबीं को तलाश करती रही। वह मासूम बच्ची जो उसके मन के अंधेरे में छुपी बैठी रही और जिस बच्ची के मन में न जाने कितने सपने कितनी आरजू, कितनी उमंगें छुपी थी और शायद मीनाकुमारी की रूह की बेचैनी उसकी शायराना बादाख्वारी, उसकी गुमअंगेज तल्ख मुस्कुराहट उसकी अदाकारी में जो गहराई, संजीदगी और ठहराव था, वह सब उसी तलाश की देन थी। मगर आज वह तलाश खत्म हो गई है। मीनाकुमारी और महजबीं मर कर एक हो गई हैं। सिर्फ एक अफसाना बाकी रह गया है और चंद दिलकश उदास यादें।
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(दिवंगत महान फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास के इस संस्मरण का उर्दू से हिंदी अनुवाद किया है सुरजीत ने।)
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