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अदालतें बदल सकती हैं तस्वीर

Fri, 29 Mar 2013 11:16 PM IST
अरुण नेहरू
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आने वाला हफ्ता दो मछुआरों की हत्या के आरोपी इतालवी नौसैनिकों पर केंद्रित हो सकता है। सच तो यह है कि शायद ही किसी को उनके लौटने की उम्मीद थी और गाहे-बगाहे विपक्ष को एक मुद्दा मिल गया था। अफवाहों के साथ आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया था, लेकिन अब यह सब कुछ एकदम बदल गया है, क्योंकि घटनाक्रम में नाटकीय बदलाव आया है और आरोपी नौसैनिक वापस भारत लौट आए हैं।
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एक राष्ट्र के रूप में हम अक्सर नकारात्मक चीजों को अपनाते हैं, क्योंकि हम सुनी-सुनाई बातों पर निष्कर्ष निकाल लेते हैं और हर कोई इसमें अपने ढंग से नमक-मिर्च लगाता है। इस तरह हम सकारात्मक चीजों पर लीपापोती करते हुए लगते हैं। इस मसले पर प्रधानमंत्री एवं सोनिया गांधी ने आक्रामक तेवर अपनाए। सोनिया गांधी ने तब राष्ट्रीय भावना का ही इजहार किया था, जब उन्होंने कहा कि कोई हमें हलके में नहीं ले सकता। इस मामले में प्रधान न्यायाधीश ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया जताई, जिसके चलते नौसैनिकों की वापसी संभव हुई। वास्तव में शीर्ष अदालत ने हमें गौरवान्वित किया है।

जब हम घटनाओं पर फैसला करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि आज हमारे पास एक गठबंधन सरकार है, जिसमें कई सत्ता केंद्र हैं। हमें इसका सम्मान करना चाहिए। हमारी कूटनीतिक जीत तभी हुई, जब इटली को इस बात का एहसास हुआ कि दबाव की रणनीति काम नहीं आने वाली। उन्होंने हर चाल चली और इसके लिए यूरोपीय संघ का भी इस्तेमाल किया, और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। एक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में हम सभी को कुछ संयम दिखाना होगा। हर मसले पर युद्ध नहीं कर सकते। जब कूटनीति काम कर रही है और हमने बिल्कुल शांतिपूर्वक अच्छा काम किया है, तो ऐसे हालात में गोपनीयता बहुत महत्वपूर्ण है।
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मैंने पहले भी कहा है और आगे भी कहूंगा कि शीर्ष अदालत के कुछेक सकारात्मक फैसले चरम नकारात्मकता को सकारात्मक बना सकते हैं। प्रधान न्यायाधीश द्वारा उठाए गए मसले को प्रधानमंत्री एवं कांग्रेस अध्यक्ष ने गंभीरता से लिया और हर स्तर पर कड़ा संदेश दिया। मौजूदा हालात में हम स्वयं को विजेता या पराजित के रूप में नहीं देख रहे हैं, बल्कि हमने एक परिपक्व राष्ट्र के रूप में काम किया है। अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक विचार के अनुकूल लगने वाले निष्कर्ष निकालकर हमें इसे अब नष्ट नहीं करना चाहिए।

माहौल में बदलाव की प्रबल संभावना है और एक घटना के बाद घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है, नतीजतन सकारात्मक घटनाओं की शृंखला बनती है। सामूहिक बलात्कार की बर्बरता कोई नई बात नहीं है। ऐसी घटनाएं पहले भी होती थीं और आज भी हो रही हैं, पर दिल्ली में हुई दरिंदगी के बाद एक नया कानून बना, त्वरित अदालतें बनीं और महिलाओं के खिलाफ अपराध के प्रति जागरूकता आई।

संजय दत्त वाले मामले ने एक बार फिर हमारी न्याय-व्यवस्था पर लोगों का ध्यान केंद्रित किया है। इससे न्यायिक सुधारों को लेकर माहौल बन रहा है और मुझे हैरानी नहीं होगी, अगर शीर्ष अदालत इस दिशा में कोई पहल करे। हाल के महीनों में हमने देखा ही है कि कई संदिग्ध 'आतंकी' छह महीने से लेकर दस वर्ष तक जेल में काटने के बाद रिहा किए गए। बेशक मैं इसके कारणों पर टिप्पणी करने के काबिल नहीं हूं, पर तथ्य है कि हमारी व्यवस्था में कुछ गंभीर खामियां हैं। हम एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं और इस तरह मुद्दे को भुला देते हैं।

हम चुनावी वर्ष से गुजर रहे हैं और राजनीतिक दुर्घटनाएं इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। हर दुर्घटना एक राजनीतिक तूफान पैदा करती है और कई लोग इस समय भावी गठबंधन ढांचे के बदलते स्वरूप का संकेत करते हैं। सपा और बसपा का कांग्रेस को समर्थन कोई अचरज की बात नहीं है और इस तस्वीर में किसी न किसी रूप में जद(यू) एवं तृणमूल कांग्रेस को भी देखकर मैं हैरान नहीं था।

गठबंधन राजनीति में कड़े रुख का कोई मतलब नहीं होता, बल्कि रणनीतिक समझौता ही मायने रखता है, क्योंकि हालात पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। मैंने पहले भी लिखा है कि ममता बनर्जी एवं तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ अपने गठजोड़ को तोड़ दिया, जिसका लाभ माकपा उठाने को तैयार है। मुझे उम्मीद है कि दोनों ओर के लोग शांति से इस पर विचार करेंगे, क्योंकि 13 मई को वहां स्थानीय निकाय के चुनाव हो रहे हैं। हम केंद्र या राज्य में शीर्ष नेताओं की तलाश नहीं कर रहे, बल्कि व्यावहारिक गठजोड़ की बात कर रहे हैं।

उधर, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ लंदन से वतन लौट आए हैं। हम केवल उनके लौटने के कारणों का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन सच तो यह है कि वतन लौटने पर उन्हें बहुत कम तवज्जो मिली है। उनकी जनसभा से भी यही संकेत मिला कि उनकी छवि ऐसी नहीं है कि लोग उन पर ज्यादा ध्यान दें। यह सैन्य तानाशाह जिस तरह से सत्ता में आया था, उसी तरह चला भी गया।

आगामी चुनाव में भी उसे मुंह की खानी पड़ेगी, क्योंकि उसके हाथ खून से रंगेे हैं। किसी न किसी रूप में किए की सजा जरूर मिलती है। पाकिस्तान के घटनाक्रम को हम केवल देख ही सकते हैं। वहां रोज आत्मघाती बम धमाके जारी हैं और पूरे देश में अनिश्चितता है। संभव है कि ब्रिटेन ने इस पूर्व तानाशाह को चार वर्षों तक शरण देने के बाद आगे शरण देने से मना कर दिया हो।
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