हाल ही में के चिकित्सा की पहुंच के अध्ययन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के उच्च स्तरीय दल ने अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट जारी की है। इस दल में भारत की दिग्गज फार्मा कंपनी के चेयरमैन यूसुफ हामिद, ऑस्ट्रेलिया के न्यायविद मिशेल किर्बी, ग्लैक्सोस्मिथक्लिन के मुख्य कार्यकारी एंड्रयू विटी, जाने-माने अर्थशास्त्री साकिको फुकुदा जैसे प्रमुख लोग शामिल थे। किसी भी विषय से संबंधित कोई लंबी रिपोर्ट अक्सक उबाई पैदा करती हैं, लेकिन इस रिपोर्ट की हम उपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसा क्यों?
अंतरराष्ट्रीय मानवीय संस्था डॉक्टर्स विदाउट बार्डर्स के साथ जन-स्वास्थ्य पेशेवर के रूप में काम करने वाली वकील लीना मेघानी इसे विस्तार से समझाती हैं। उनके मुताबिक, कई कारणों से यह रिपोर्ट भारत के लिए महत्वपूर्ण है। पहला, संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट तैयार करने वाले दल में दुनियाभर के विशेषज्ञ शामिल थे और यह रिपोर्ट स्पष्ट तौर पर पश्चिमी सरकारों और वहां की फार्मा कंपनियों द्वारा विकासशील देशों पर डाले जा रहे राजनीतिक और आर्थिक दबावों को रेखांकित करती है। उनकी कोशिश होती है कि वे कम कीमत की जेनेरिक दवाओं तक पहुंच और उनके संरक्षण से संबंधित विकासशील देशों के कानूनों और नीतियों को बेअसर करें। दल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि यह दबाव मानवाधिकार और जन-स्वास्थ्य की बाध्यताओं को पूरा करने की राह में रोड़े अटकाता है।
भारत हाल में अमेरिकी दबाव के निशाने पर था। मेघानी कहती हैं कि भारत को अमेरिका की बिजनेस लॉबी और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों की ओर से पड़ने वाले दोहरे दबाव का प्रतिकार करने के लिए इस रिपोर्ट का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि अपनी पेटेंट व्यवस्था में वह जन-स्वास्थ्य से जुड़े संरक्षण पर अमल कर सके। दूसरा, यह रिपोर्ट विभिन्न व्यापार समझौतों खासतौर से यूरोपीय संघ-भारत एफटीए (मुक्त व्यापार समझौता) और हाल की आरसीईपी वार्ता (रिजनल कॉम्प्रहेनशिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप) में अपना पक्ष रखने की भारत की स्थिति को मजबूत करती है। आरसीईपी एक बहु क्षेत्रीय समझौता है, जिस पर 10 आसियान देशों और छह एफटीए सहयोगियों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया) के बीच बातचीत चल रही है।
भारत निरंतर बौद्धिक संपदा अधिकार से संबंधित 'ट्रिप्स प्लस' (द एग्रीमेंट ऑन ट्रेड रिलेटेड ऑसपेक्ट्स ऑफ इंटलेक्चुअल प्रापर्टी राइट्स) के उन उपायों को खारिज करता आया है, जिनके जरिये कम कीमत की जेनेरिक दवाओं की कीमत पर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां अपना एकाधिकार थोपना चाहती हैं। विश्व व्यापार संगठन द्वारा लागू ट्रिप्स दुनिया में आज बौद्धिक संपदा के संरक्षण का स्वीकार्य मानक है। बौद्धिक संपदा (आईपी) में विकसित देशों द्वारा जो कड़े प्रावधान लादे जा रहे हैं, उसे ही ट्रिप्स प्लस कहा जाता है।
आरसीईपी वार्ता अगले महीने अक्तूूबर में तय हैं, जिनमें आईपी से संबंधित अहम वार्ता भी शामिल होगी। भारतीय वार्ताकार इसमें संयुक्त राष्ट्र के उच्च स्तरीय दल की इस रिपोर्ट का उपयोग कर सकते हैं, जो स्पष्ट तौर पर कहती है कि द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार तथा निवेश संबंधी संधियों में शामिल सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन समझौतों में ऐसे प्रावधानों को नहीं शामिल होना चाहिए, जो कि उनके स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों को पूर्ण करने की बाध्यताओं में रोड़े अटकाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया को इस पर गौर करना चाहिए कि यदि वहन करने लायक कीमत की जेनेरिक दवाओं को भारतीय बाजारों में रोकने से संबंधित आईपी के प्रावधानों को आरसीईपी में शामिल किया जाता है, तो विकसित देशों की लाखों जिंदगियां खतरे में पड़ जाएंगी। अंत में, यह रिपोर्ट एक आरऐंडडी ट्रिटी (रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट संधि) पर काम किए जाने पर जोर देती है, जिससे भारत सहित अन्य विकसित देशों के करोड़ों लोगों को लाभ हो सके। इस रिपोर्ट में नवोन्मेष की लागत को मूल्य से पृथक करने से संबंधित एक वैश्विक आरऐंडडी समझौते के लिए अंतर-सरकारी वार्ता की सिफारिश की गई है। एक बड़ा दवा उत्पादक देश और दवाओं का शीर्ष बाजार होने के नाते भारत इस मुद्दे पर नेतृत्व कर सकता है।
भारतीय सिविल सोसाइटी तथा थिंक टैंक्स ने संयुक्त राष्ट्र के इस दल के समक्ष अपने पक्ष रखे हैं। बौद्धिक संपदा से संबंधित मुद्दों पर भारत की स्थिति को अब विभिन्न देशों का समर्थन भी मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र के उच्च स्तरीय दल ने विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों से आग्रह किया है कि वे ट्रिप्स समझौते के अनुच्छेद 27 में दिए गए प्रावधानों का फायदा उठाकर अपने देश के जन-स्वास्थ्य तथा वहां के निवासियों के सर्वश्रेष्ठ हितों में नवोन्मेष तथा पेटेंट संबंधी अधिकारों तथा परिभाषाओं को अपने जरूरतों के अनुसार लागू करे। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के मुताबिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद जैसे राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के साथ साझेदारी कर रिपोर्ट में दिए गए सिद्धांतों को अमल में लाना चाहिए। सारे अनुसंधान और विकास से जुड़े संस्थानों के लिए संहिता बनाई जा सकती है और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि नवोन्मेष से ऐसे उत्पाद तैयार हों, जिनकी कीमत कम हो और उनकी सब तक पहुंच हो।
बड़ी फार्मा कंपनियों को संयुक्त राष्ट्र के दल की ये सिफारिशें नागवार गुजर रही हैं। जाहिर है, आगे टकराव बढ़ सकता है। भारत को सस्ती दवाओं तक पहुंच बनाने के लिए लड़ाई जारी रखनी चाहिए। थिंक टैंक रिसर्च ऐंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (आरआईएस) से जुड़े प्रोफेसर टीसी जेम्स कहते हैं, 'अमेरिका अनुसंधान और नवोन्मेष पर भारी खर्च करता है। यदि भारत भी अनुसंधान और विकास पर निवेश करे तो कोई भी देश इसका विरोध नहीं करेगा।