मीडिया जब अदालत की भूमिका अदा करने लगे, जैसे बीते दिनों उसने इंद्राणी मुखर्जी के मामले किया, तो यह अच्छी बात होती है या बुरी? खूब चर्चा हुई है देश में इस सवाल पर, लेकिन इस पर जितनी भी चर्चा हो, वह कम होगी, क्योंकि कई पहलू हैं इस सवाल के, जिन पर चर्चा होनी चाहिए। याकूब मेमन को फांसी हुई पिछले दिनों उस अपराध के लिए, जो उसने 1993 में किया था। अंसल बंधुओं का ही मामला ले लीजिए, जिन्हें अब शायद जुर्माना ही होगा, जेल नहीं, क्योंकि इतना लंबा अर्सा गुजर गया है उपहार सिनेमा हॉल की दुर्घटना के बाद, जिसमें उनसठ बेगुनाह लोग अंसल बंधुओं की लापरवाही के कारण मारे गए थे। उपहार सिनेमा हॉल के दरवाजे ही अगर खुले होते आग लगने के बाद, तो शायद कोई न मरता। लेकिन उनको खोलने का भी इंतजाम नहीं था। ज्यादातर लोगों की मौत, जिनमें कई छोटे बच्चे भी थे, दम घुटने के कारण हुई थी। बंद सिनेमा हॉल के अंदर भर गया था काला जहरीला धुआं। उस समय मीडिया अगर इतना ताकतवर होता, जितना आज है, तो यह मामला इतने धीमे रफ्तार से नहीं चलता।
मेरी राय में इंद्राणी मुखर्जी के मीडिया ट्रायल ने शीना को न्याय दिलाने में मदद की है। पुलिस की तरफ से शीना की मां की गिरफ्तारी की खबर दी गई थी शीना की हत्या के आरोप को लेकर। पुलिस ने जानकारी यह भी दी कि गिरफ्तारी इस आधार पर हुई है कि इंद्राणी मुखर्जी के ड्राइवर ने शीना की हत्या का जुर्म स्वीकार किया है यह कहते हुए कि हत्या उसने इंद्राणी के कहने पर की थी। ड्राइवर किसी और जुर्म में पुलिस हिरासत में था।
इंद्राणी की गिरफ्तारी के बाद मीडिया ने बिना पुलिस की मदद के शीना के भाई को खोज निकाला गुवाहाटी में और उसके बयान पेश किए मीडिया की अदालत में। शीना के भाई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इंद्राणी से जब उसने शीना के बारे में पूछा, तो वह गुस्सा होकर बोली कि अगर वह इस तरह के सवाल करता रहा, तो वह उसको पैसा भेजना बंद कर देगी। इंद्राणी के पति पीटर मुखर्जी के बयान पेश किए हैं टीवी चैनलों ने, जिसमें उन्होंने माना कि उन्हें इतना भी मालूम नहीं था कि शीना उनकी सौतेली बेटी थी, साली नहीं। मीडिया की तहकीकात ने खोज निकाले ऐसे दोस्त और रिश्तेदार मुखर्जी दंपति के, जिन्होंने कहा कि उनको भी नहीं मालूम था कि शीना बेटी थी इंद्राणी की। यह सब करके क्या मीडिया ने पुलिस की मदद नहीं की है? क्या उस लड़की को न्याय दिलाने में मीडिया ने मदद नहीं की है, जो तीन साल पहले दुनिया से अचानक गायब हो गई थी।
कई जाने-माने वकीलों और सामाजिक पंडितों ने पिछले सप्ताह इंद्राणी मुखर्जी के तथाकथित मीडिया ट्रायल पर ऐतराज इस आधार पर जताया कि अब उस पर अदालत में जो मुकदमा चलेगा, तो न्याय मिलने की संभावना कम हो जाएगी। शायद भूल गए थे ये विशेषज्ञ कि अगर मीडिया ट्रायल न होता जेसिका लाल मामले में, तो मनु शर्मा कभी जेल न जाते। अदालत ने तो उसे बरी कर दिया था ठोस सुबूतों के अभाव में। अगर मीडिया न सक्रिय होता, तो जेसिका लाल को न्याय नहीं मिलता। यही बात कही जा सकती है शीना के लिए। शीना की हत्या का कोई गवाह नहीं था। ऐसे में मीडिया की भूमिका फायदेमंद साबित हुई है। उसी की सक्रियता से कई ऐसे तथ्य बहुत जल्दी सामने आए हैं, जिस आधार पर अब दोषियों को सख्त सजा मिलनी तय है।