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इस गठजोड़ का मतलब

एस डी मुनि Updated Sun, 25 Feb 2018 06:31 PM IST
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ओली एवं प्रचंड

अब तक इकतालीस प्रधानमंत्री देखने वाले नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता वहां की समस्याओं की बड़ी वजह है। हालांकि नए संविधान के प्रावधानों के मुताबिक, अब नई सरकार के खिलाफ दो साल से पहले किसी भी तरह का अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। नेपाल के स्थानीय मीडिया में कई रिपोर्टे आईं, जिनमें दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों को एक साथ लाने में चीन के हस्तक्षेप की बात कही गई। चर्चाएं आम रहीं कि चीन ने नेपाल में कम्युनिस्ट सत्ता के उभार के लिए कूटनीतिक चालों के साथ आर्थिक लालच देने का भी सहारा लिया। सत्ता के लिए भले ही नेपाल में इन दोनों दलों का मिलन हो गया हो, लेकिन अतीत को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि अवसर की नजाकत वाला यह मिलन अनिश्चितताओं भरा है। इसकी पहली झलक मंत्रालय बंटवारे के कुछ दिनों के बाद देखने को मिल सकती है।



नेपाल के नए प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद शर्मा ओली ने पिछले दिनों एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने चीन के साथ नेपाल के रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह चीन के साथ संबंधों को प्रगाढ़ कर नए अवसर तलाशेंगे और भारत के साथ समझौतों में अधिक फायदा लेंगे। चीन के प्रति झुकाव वाले वामपंथी नेपाली प्रधानमंत्री ओली का यह बयान स्वाभाविक तो जरूर है, लेकिन बचकाना भी है। नेपाल के प्रधानमंत्री को भारतीय हितों पर असर डालने वाला ऐसा कोई भी बयान देने से बचना चाहिए था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पिछली नेपाल यात्रा का उद्देश्य यही था कि राजनीतिक रूप से नए-नवेले नेपाल में वैसी कोई भी आशंका पैदा होने देने से रोकी जाए, जो भारत के खिलाफ हो।


काठमांडू में यह नई हलचल अनायास नहीं है। दरअसल इसके लिए काफी हद तक भारत भी जिम्मेदार है। नेपाल की वर्तमान परिस्थितियां अतीत में अनिश्चितता का पर्याय रही नेपाली राजनीति में भारत की कई कोशिशों का परिणाम भी हो सकती हैं। वर्ष 2015 में भारत की ओर से प्रचंड को 'अपना' बनाने के विफल प्रयास में तत्कालीन ओली सरकार को सत्ता से दूर होना पड़ा था, जबकि कहा जा सकता है कि ओली के प्रथम कार्यकाल में भारत के प्रति उनका स्पष्ट झुकाव था और वह चीन के प्रति इतने सकारात्मक नहीं दिखे थे। अब जब प्रचंड और ओली ने गठबंधन कर नेपाल की सत्ता पर कब्जा जमा लिया है, तब नेपाल को थामने के भारत के सभी प्रयास बेकार माने जा सकते हैं। भारत को यह समझ लेना चाहिए कि अवसरवादिता नेपाली राजनीति की फितरत रही है। दक्षिण एशिया के बदलते परिदृश्य के मद्देनजर नेपाल ही क्यों, किसी भी पड़ोसी राष्ट्र से केवल सांस्कृतिक आधार पर संबंध बरकरार रहने के मुगालते में नहीं रहना चाहिए।


नेपाल नया है, नेपाली आकांक्षाएं भी नई हैं। लंबे हिंसक संघर्ष के बाद संविधान निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया के बाद लोकतंत्र स्थापना के लिए नेपाल ने बड़ी कीमत अदा की है। भारत को नेपाली जनमानस की भावनाएं समझनी होंगी। भारत से नेपाल जिस सहयोग की उम्मीद करता है, बीजिंग वह सहयोग हिमालय चीरकर नेपाल तक पहुंचाने के लिए तैयार बैठा है। कूटनीतिक रूप से चीन इस मामले में हमसे काफी तेज है। श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के मामले में हम यह देख चुके हैं। चूंकि सांस्कृतिक और भौगोलिक कारणों के कारण किसी भी देश के मुकाबले नेपाल-भारत के संबंधों की तुलना नहीं की जा सकती, इसलिए नेपाल अब तक भारत के लिए वैसा खतरा नहीं रहा है।


फिर भी भारत को अपना अगला कदम संभल कर उठाना होगा। चीन हमारा भी वाणिज्यिक भागीदार है, इसलिए नेपाल में उसकी बढ़ती मौजूदगी को हम सीधे तौर पर रोक नहीं सकते। नेपाल के प्रति भारत को अपना ढीला-ढाला रवैया छोड़ना होगा। नेपाल के विकास के लिए भारत ने जो भी वायदे किए हैं, उन्हें याद करने का वक्त आ गया है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि भारत ने नेपाल की मदद नहीं की। विध्वंसकारी भूकंप के बाद नेपाल के पुनर्निमाण में भारत की सक्रियता पूरी दुनिया ने देखी है। उस वक्त भारत ने न सिर्फ नेपाल का आर्थिक रूप से सहयोग किया, बल्कि सेना की मदद से युद्ध स्तर पर राहत कार्यक्रम भी चलाया। लेकिन कुछ ही वक्त बाद नेपाल के नए संविधान को लेकर भारतीय आपत्तियों, मधेसी आंदोलन और उसके फलस्वरूप उपजी कथित नाकेबंदी ने भारत-नेपाल संबंधों को ऐतिहासिक रूप से बिगाड़ कर रख दिया।


वैसे तो दक्षिण एशिया के किसी भी देश में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा है, लेकिन नेपाल में भ्रष्टाचार अलग ही स्तर पर है। नेपाल की समस्याओं के पीछे वहां की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था भी काफी हद तक दोषी है। भारत और चीन के बीच झूलने के बजाय नेपाल को अपनी स्वतंत्र धाक भी विकसित करने के प्रयास करने चाहिए। यह दिखना चाहिए कि यदि वह भारत को किसी भी आंतरिक हस्तक्षेप से रोकने की बात करता है, तो उसका अर्थ किसी दूसरे देश के लिए मौके के रूप में न निकले। सच तो यह भी है कि देश के भीतर की संभावनाओं के बारे में किसी भी नेपाली सरकार ने ईमानदारी से प्रयास नहीं किया है। पर्यटन के सिवा नेपाल में पनबिजली के क्षेत्र में काफी कुछ किया जा सकता है।


यह सही है कि देश के पुनर्निमाण के लिए नेपाल को किसी न किसी की मदद चाहिए होगी, मगर इसके लिए चीन की गोद में बैठकर ऐसे किसी भी कृत्य से बचना चाहिए, जिससे भारत से उसके संबंधों पर असर पड़े। बिना देरी किए नेपाल के वर्तमान हालात समझते हुए, भारत को नेपाली प्रधानमंत्री के साथ मिलकर दोनों देशों के संबंध और बेहतर करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए, जिससे दोनों पड़ोसियों के बीच पुराना विश्वास बहाल हो सके। 

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