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सवाल: समाज में बदलते जा रहे सही और गलत के मायने, क्या किसी को कोई फर्क पड़ता है?

नंदितेश निलय Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 12 Nov 2024 06:59 AM IST

सार

चाहे किसी और की गलती से इंजन और बोगी के बीच पिसा रेलकर्मी हो, कोयला खदानों के मजदूर हों, सीवेज में जान गंवाने वाले सफाईकर्मी हों या पहाड़ से खाई में समा गए नागरिक हों या यमुना के झाग में सूरज को पूजती माताएं-बहनें हों, सवाल यह है कि क्या आज किसी के नुकसान से किसी को कोई फर्क पड़ता है।
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बरौनी ट्रेन हादसा। - फोटो : amar ujala digital


क्या हम मान लें कि कोई और ऐसी त्रासदी का भविष्य में शिकार नहीं होगा? और यह भी कि क्या इस घटना से समाज उद्वेलित होगा, क्योंकि हर दिन अखबार में किसी के मरने या मारने की ही कहानियां होती हैं। लेकिन लगता है, जैसे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहे कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूर हों, सीवेज साफ करते वक्त जान गंवाने वाले सफाईकर्मी हों, पन्ना की जमीन में हीरा ढूंढते और बरसों-बरस गरीब होते मनुष्य हों, दीपावली के दिन रंगोली बनाते निष्ठुरता से कुचले गए बच्चे हों, पहाड़ से खाई में समा गए नागरिक हों, और इस समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता की लंबी लिस्ट में यमुना के झागों में, प्रदूषण के पीछे फंसे सूरज को पूजती माताएं व बहनें हों या बमों के धमाकों में मरते लोग हों, आज किसी को किसी के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप मरें या मारें, आज के नागरिक को कोई शिकन नहीं आती। दुख, संवेदना, दया और आंसू अब सबके नहीं रहे। बहुत एकल और धुंधले होते हुए संसार में अच्छाई और बुराई या सही और गलत के मायने पूरी तरह से बदलते जा रहे हैं। और बदल रहा है वह मनुष्य, जिसे कुछ ज्यादा संवेदनशील होना था। आखिर क्यों?


ऐसा तो नहीं कि आजादी के बाद भारतीय मध्यम वर्ग ने एक अलग तरह की हीनता और श्रेष्ठता ग्रंथि को चुना, जिसमें कुछ और बनने की चाह में वह बुनियादी मनुष्यता को ही खो बैठा। अपने-अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैठकर सभी, सभी  से, धीरे-धीरे अलग हो रहे हैं। और हम ‘कोई और या कुछ और’ बनते जा रहे हैं-मनुष्य कम और मैनेजर ज्यादा। आज हीनता और श्रेष्ठता की भावना ने इस वर्ग को नागरिक से ज्यादा प्रबंधकीय वर्ग का प्रतिनिधि बना दिया है। समाज के हर तबके में यह मानसिकता हावी हो रही है। यहां तक कि लोकतंत्र में कई बार ‘वोट बैंक’ भी प्रबंधित लोकतंत्र में बदल जाता है। धीरे-धीरे मनुष्य रिसोर्सफुल बनता गया और ह्यूमन बहुत पीछे छूट गया। ऐसे में संसाधन बना मनुष्य भला कैसे देखता उस अमर को, जो ट्रेन से चिपक चुका था। क्या हम द्रवित हुए? क्या हम मान लें कि निष्ठुरता का समाज में सामान्यीकरण हो चुका है?


प्रबंधक का अर्थ है वह व्यक्ति, जो किसी संस्थागत लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तमाम संसाधनों को उपयोग में लाता है। और उन संसाधनों में मनुष्य भी होता है। मनुष्य प्रबंधन (मैनेज) करते-करते संबंधों के भावनात्मक पहलू से आज बहुत दूर निकल चुका है। इसका कारण है मैनेजर की कार्य-प्रक्रिया और श्रम की अनुपस्थिति। हुआ यह कि श्रम का मूल्य निम्न वर्ग के हिस्से चला गया और संसाधन की चमक मध्यम और उच्च वर्ग के पास। वह श्रम, जो एक इन्सान को मांजता है और सर्विस सेंटर की भूमिका निभाता है, मध्यम वर्ग के मैनेजर द्वारा ठुकरा दिया गया। आज इस युग में सभी मैनेजर हैं। और इस प्रबंधकीय मध्यम वर्ग ने मेहनत की जगह काम और रिश्ते को प्रबंधित करना चुना। इसलिए स्वतंत्रता के बाद, संसाधन संपन्न वर्ग व्यक्तिगत और संगठनात्मक लाभ के लिए कुछ भी और सब कुछ प्रबंधित करना सीखने लगा और लाभ के इर्द-गिर्द उसकी दुनिया ठहर गई। स्वाभाविक रूप से वह दुनिया निष्ठुर होनी ही थी।


मनुष्य जब संसाधन बनता गया, तो भला वह दुख कहां से फूटता, जो मनुष्य बने रहने के लिए बहुत ही जरूरी है। यह दुख और आत्मग्लानि का ही तो भाव था, जिसने कलिंग युद्ध के बाद अशोक को अहिंसा और धर्म का सम्राट बना दिया, मदर टेरेसा को सात समंदर पार कर कुष्ट रोगियों की सेवा से जोड़ दिया। वह दुख और दया का ही तो भाव था, जिसने मोहनदास को महात्मा गांधी बनाया और भगत सिंह को नास्तिक। क्या आज के जनमानस में उस दुख और दया की कोई जगह बनती है?


सुकरात को यह पता था कि उन्हें कुछ नहीं पता, क्योंकि यह पता करना ही सुकरात या बुद्ध बनना होता है। लेकिन आज के मैनेजर को सब कुछ पता है। और जिनको सब पता होता है, वहां हर विचार या सवाल लाभ को अधिकतम करने के इर्द-गिर्द ही रह जाता है। हालांकि लाभ आर्थिक विकास के लिए अच्छा है, लेकिन जिस आर्थिक विकास ने सामाजिक संवेदना को केंद्र में नहीं रखा, उसे क्या फर्क पड़ेगा कि कोई मारे या कोई मरे। हर किसी को बस अपना घर सुरक्षित चाहिए। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि आज भी ऐसे बहुत सारे ‘अज्ञात’ नायक हैं, जो श्रम के भाव से काम कर रहे हैं। लेकिन सामाजिक व्यवहार तो उस भाव-शून्यता का ही है।


आज के व्यक्ति के लिए एकल परिवार और अस्तित्व के आसपास का लाभ जीवन का केंद्र बन गया है। जहां निम्न वर्ग के कामकाजी जोड़ों का एक समूह हर रोज शहर के जीवन को रिपोर्ट करता रहा, वहीं मध्यम वर्ग के कामकाजी जोड़ों का एक और समूह है, जो आसपास की चीजों को संभालने में व्यस्त रहता है। इस तरह एक प्रबंधक की इस प्रोफाइल ने मनुष्य को एक संसाधन बना डाला। इस मध्यम वर्ग के लिए समीक्षा, रिपोर्टिंग, प्रबंधन, नियंत्रण, आउटपुट, परिणाम आदि मानवीय मूल्यों के उन सभी पहलुओं पर हावी हो गए, जो एक संवेदनशील समाज के बनने के लिए जरूरी हैं।
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आज यह मानसिकता हमें उस दिशा में ले जा रही है, जहां विश्वास और सेवा के मूल्य ब्रांड और बाजार से अधिक प्रभावित होते हैं, न कि मनुष्य रूपी रचना से और न ही उन पारिवारिक मूल्यों से, जो दुख और दया की दुनिया को समझते और समझाते हैं। स्वामी विवेकानंद लिखते हैं, ‘मेरी मां ने मुझे जो प्यार दिया है, उसने मुझे वह बनाया है, जो मैं हूं, और मैं उनका ऋणी हूं, जिसे मैं कभी नहीं चुका सकता।’ इसलिए यह समझना जरूरी है कि खतरे में धर्म नहीं, बल्कि इन्सान और इन्सानियत है। समाज की यही ज्वलंत समस्या है और अगर इनको-उनको कोई फर्क नहीं पड़ता, तो फिर पूछिए साहिर से कि ‘जिन्हें नाज है हिंद पर, वो कहां हैं?’

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