पश्चिम बंगाल में मुहर्रम के दिन यानी एक अक्टूबर को दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान कहीं से अप्रिय समाचार नहीं मिला। राज्य सरकार ने मुहर्रम पर प्रतिमा-विसर्जन पर रोक लगा दी गई थी। हालांकि कोलकाता हाई कोर्ट ने रोक हटाते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई कि समाज को बांटने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। सरकार ने पिछले साल भी रोक लगाई थी। तब कोर्ट ने इसे ‘मनमाना’ और ‘अल्पसंख्यकों को खुश करने का राज्य द्वारा स्पष्ट प्रयास’ करार दिया था। न पिछले साल कोई सामाजिक, सांप्रदायिक तनाव बना, न ही इस साल।
फिर क्या वजह है कि पश्चिम बंगाल सरकार दो साल से ऐसे फरमान यह पता होते हुए भी जारी कर रही है कि कोर्ट ऐसा होने नहीं देगा? इसे समझना मुश्किल नहीं है। कोलकाता हाईकोर्ट के दोनों साल के फैसलों में की गई टिप्पणियां इसी तरफ इशारा कर रही हैं। पश्चिम बंगाल में अगले विधानसभा चुनाव 2021 में होंगे, जो अभी दूर है। लेकिन मोदी-शाह के उभार के बाद अब वहां मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के इरादे से उल्टी सियासत शुरू हो गई है। तृणमूल कांग्रेस भाजपा पर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के आरोप लगाती रही है, लेकिन अब वह खुद भी ऐसा ही कर रही है। भाजपा का ग्राफ जैसे-जैसे ऊपर बढ़ रहा है, बहुत से शब्दों के मायने भी बदलते जा रहे हैं। ऐसे ही शब्द हैं- ध्रुवीकरण और सांप्रदायिकता। कई शब्दों के अर्थ बिल्कुल उलटते भी जा रहे हैं, जैसे- तुष्टीकरण।
चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पश्चिम बंगाल, असम और केरल के मुस्लिम बहुल इलाकों में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ रहा है। पश्चिम बंगाल की 65 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का असर है। 2011 के चुनाव में भाजपा को इन इलाकों में कोई सीट नहीं मिली, लेकिन वोट 4.6 फीसदी मिले। वहीं 2016 में उसे 9.6 फीसदी वोट के साथ एक सीट भी मिली। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने इन 65 सीटों में से 2011 में 30 और 2016 में 38 सीटें जीतीं। 2011 में 29.3 फ़ीसदी के मुकाबले तृणमूल कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़कर 41 फीसदी हो गया। जाहिर है कि ममता बनर्जी वहां पकड़ ढीली नहीं करना चाहेंगी।
इन आंकड़ों ने कथित रूप से खुद को सेकुलर बताने वाली पार्टियों में खलबली मचा दी है। कुछ सियासी पंडित इसे धर्मनिरपेक्षवादियों के संप्रदायीकरण के रूप में देख रहे हैं। इस लिहाज से मोदी-शाह की सियासत का जमीन पकड़ना समाजशात्रीय और राजनीतिशात्रीय नजरिये से दक्षिण एशिया में सामाजिक सोच में बदलाव की बड़ी परिघटना कही जा सकती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस तरह मुस्लिम वोटों के तुष्टीकरण की कोशिशें कामयाब हो पाएंगी?
पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का एक वाकया साबित करता है कि राजनीतिक पार्टियों की ऐसी कोशिशें अंतत: कामयाब नहीं होतीं। मुस्लिम बहुल शोखपुरा गांव में दो-तीन हिंदू परिवार रहते हैं। इसी साल 26 अप्रैल को वहां विश्वजीत रजक नाम के लड़के की मृत्यु हो गई। अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में गांव के मुस्लिम युवा आगे आए। हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार का सारा इंतजाम किया गया और चिता बाकायदा कंधों पर रखकर आठ किलोमीटर दूर श्मशान घाट पहुंचाई। इस दौरान वे ‘हरि-हरि बोल’ का जाप भी करते रहे। यह घटना बताती है कि बहुत से हिंदू-मुस्लिम अनपढ़ होने या गरीबी की वजह से सियासी असामाजिक साजिशों के शिकार हो जाते हैं, पर इंसानियत की मूल भावना को कोई भी साजिश राह से भटका नहीं सकती।