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'आत्मनिर्भरता' के चयन के मायने

उमेश चतुर्वेदी Published by: उमेश चतुर्वेदी Updated Tue, 09 Feb 2021 01:44 AM IST
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Oxford Dictionary में शामिल हिंदी शब्द: आत्मनिर्भर भारत - फोटो : अमर उजाला/iStock

कथा सम्राट प्रेमचंद ने अपने एक निबंध में साहित्य को राजनीति से आगे-आगे चलने वाली मशाल माना है। बेशक राजनीति की निर्भरता ज्यादातर तात्कालिक मुद्दों पर होती है। इन अर्थों में कहा जा सकता है कि राजनीति तात्कालिकता से प्रभावित होती है। इसके ठीक उलट साहित्य और संस्कृति की दुनिया ऐसे मूल्यों को रचने और उन मूल्यों पर चलने को प्रेरित करती है, जो शाश्वत  होते हैं। इसके बावजूद इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि तात्कालिकता पर निर्भर राजनीति और शाश्वत बोध की वाहक संस्कृति में कोई रिश्ता नहीं होता। अगर यह रिश्ता नहीं होता तो तात्कालिक राजनीति की जरूरत के हिसाब से कोरोना काल के दौरान भारतीय जनमानस में गहरे तक पैठ बना चुका शब्द ‘आत्मनिर्भरता’ प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड शब्दकोश द्वारा वर्ष के शब्द के तौर पर नहीं चुना जाता।



साहित्य और राजनीति का यह अन्योन्याश्रय संबंध ही है कि जब कोरोना संकट के चलते भारत की राजनीतिक व्यवस्था बड़े समूह के निशाने पर रही, तब उसी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा चलाए गए शब्द 'आत्मनिर्भरता' को ऑक्सफोर्ड शब्दकोश साल के शब्द के तौर पर स्वीकार करता है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के मुताबिक, साल का शब्द वह होता है, जो बीते साल के स्वभाव और  स्थिति को तो बताता ही है, उसका उस साल में सांस्कृतिक महत्व भी होता है। जाहिर है कि वर्ष 2020 के लिए जिस ‘आत्मनिर्भरता’ शब्द को चुना गया है, वह इन मानकों पर खरा उतरता है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस हर साल अपने शब्दकोश के लिए वर्ष का शब्द चुनता है। उसने वर्ष 2019 के लिए 'संविधान' को ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के लिए चुना था। 


‘संविधान’ शब्द को चुनते वक्त ऑक्सफोर्ड ने कहा था, 'यह ऐसा शब्द है, जो बीते हुए साल की प्रकृति, मिजाज, माहौल और मानसिकता को व्यक्त करता है। इसके अलावा इसके स्थायी सांस्कृतिक महत्व की वजह से इसे चुना गया है।' वर्ष 2018 में इसी तरह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने 'नारी शक्ति' को साल का हिंदी शब्द चुना था। तब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने इसकी वजह बताते हुए कहा था, 'संस्कृत से लिया गया शब्द 'नारी' का अर्थ महिला और शक्ति का अर्थ ताकत है। आज यह शब्द अपनी जिंदगी का भार उठाने वाली महिलाओं का सूचक है।' ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस पहले हर साल अंग्रेजी भाषा में से वर्ष का शब्द चुनती रही है। बाद में हिंदी की बढ़ती ताकत और बढ़ते प्रसार को देखते हुए उसने हिंदी में भी यह प्रक्रिया शुरू की। यह मामूली बात नहीं है। हिंदी के लोग वैसे भी हीनता बोध और यूरोपोन्मुखी चलन से ग्रस्त रहे हैं। ऐसे में अगर ऑक्सफोर्ड प्रेस की तरफ से हिंदी के शब्दों का चयन होता है, तो इसके मोटे तौर पर दो नतीजे दिखते हैं। पहला तो यह कि हिंदी की जहां प्रतिष्ठा बढ़ती है, वहीं हीनताबोध से ग्रस्त हिंदी समाज को आत्मबल भी मिलता है।


संभवत: लंबी गुलामी की वजह से अपने मूल्यों, अपनी मान्यताओं और अपने श्रेष्ठ पारंपरिक साहित्य एवं ज्ञान परंपरा को भी समाज तभी स्वीकार कर पाता है, जब पश्चिमी समाज उसे मान्यता दे या उसे स्वीकार करे। समाजवादी नेता किशन पटनायक ने निबंध ‘अयोध्या और उसके आगे’ में भारतीय बौद्धिक समाज के साथ ही यूरोपीय बौद्धिकता पर जबर्दस्त टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है, 'यूरोप के बुद्धिजीवी, विशेषककर विश्वविद्यालयों से संबंधित बुद्धिजीवियों का हमेशा यह रुख रहा है कि गैर यूरोपीय जनसमूहों के लोग अपना कोई स्वतंत्र ज्ञान विकसित न करें।' जाहिर है कि ऐसे समाज के लोग अगर भारतीय संस्कृति और राजनीति को प्रभावित करने वाले शब्द का चयन करेंगे, तो निश्चित तौर पर वह हमारी इस सोच को ही संतुष्ट करता है। इन सब बातों को दरकिनार करते हुए हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए किऑक्सफोर्ड की इस प्रक्रिया का एक दूरगामी प्रभाव जरूर नजर आता है। वह यह कि आने वाले दिनों में हिंदी की ताकत को वैश्विक स्वीकार्यता मिलेगी। इस बहाने हमारा भाषायी आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।

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