पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर और एक भारतीय पत्रकार की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कथित तौर पर देहाती औरत कहा जाना (हालांकि इसे लेकर विवाद है कि उन्होंने ऐसा कहा या नहीं) और इस मुद्दे को नरेंद्र मोदी के तूल देने से देहाती औरत का सवाल केंद्र में है।
लोकतंत्र में लोक, प्रधानमंत्री से महत्वपूर्ण होता है। लोक अपनी सत्ता उस तंत्र को सौंपता है, जिसके प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री मात्र गण होते हैं। लोक की आधी आबादी इन्हीं देहाती महिलाओं की है। शायद नमो की गलती नहीं है। जिस आधुनिकता और विकास का प्रतीक गुजरात के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, वह आधुनिकता और विकास, आक्रामक, वैभवशाली, आडंबरी, विश्वविजयी और गर्व का बोध कराने वाला है।
मगर भारत देश या किसी भी देश की देहाती औरत कमजोर नहीं है। वह कर्मठ है, दूसरों का ध्यान रखती है, प्रेम करती और करना सिखाती है, गोदान की धनिया की तरह होरी को लड़ना सिखाती है, वह बदलाव का स्रोत है, जहां आदमी को आगे आने देती है। वह पुरुष की सहकर्मी है, उसकी महत्वाकांक्षाओं को आईना दिखाती है। सहती है, फिर आवाज उठाती है, फिर पुरुष को आगे कर, घर संभालती है। वह अथक, बलशाली और अपने जीवन की नायिका है। वह अन्न उगाती है, उसे छान-साफ कर पकाती है और फिर प्रेम से खिलाती है। खुद बचा-खुचा खाती है।
गुजरात में तो विकास के चलते अन्न उगाना कम हो गया और गुजरात अपनी आवश्यकता का 40 प्रतिशत से अधिक अन्न, अन्य राज्यों से आयातित करता है। पर गुजरात के देहात की महिला उतनी ही कर्मठ है, अग्रणी है। सेवा संस्था से जुड़ी इलाबेन ही नहीं, संस्था में हर देहाती महिला, मुख्यमंत्री तक बनने की कुव्वत रखती है, पर वह महत्वाकांक्षी नहीं है। गुजरात ही नहीं, दुनिया की देहाती महिलाओं ने खूब कमाल किया है। सब से बड़ा उदाहरण तो गुजरात की महिलाओं के मजदूर संघ 'सेवा' का है, जिसकी 10 लाख सदस्य हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में उत्पादन से लेकर उसे बड़े-बाजारों में बेचने तक का काम करती हैं। हरेक देहाती महिला उनमें जागरूक, कर्मठ और शक्तिशाली है।
देहाती महिला में जीवट है। प्रधानमंत्री आज की राजनीति में वह सब करने के लिए विवश हैं, जिससे देहाती महिला बहुत दूर रहती है। राग-द्वेष, कृपणता, बांह मरोड़ना, साम-दाम, दंड, भेद, सब करना होता है। और मीनाक्षी लेखी और अंबिका सोनी जैसी नगरीय महिलाएं उस पर पर्दा डालती या पर्दाफाश करती हैं। पर देहाती महिला तो सीधी-साधी, कर्मठ और विवेकशील होती है। सतत संघर्ष करती रहती है। आधुनिक मन का प्रपंच उसमें नहीं है।
आज राजनीति वर्चुअल (आभासी) चमक-दमक के दौर से गुजर रही है। चमक-दमक ऐसी कि यथार्थ हो भी, तो यथार्थ न लगे। जहां यथार्थ से जुड़ने का, गुरबत की बात करना, किसान-मजदूर की बात करना, उनको सक्रिय राजनीति में स्थान देना व्यवहारिक नहीं माना जाता और यही नहीं ऐसी बातों को ही ढोंग और पाखंड समझा जाता है। उसका मजाक उड़ाया जाता है। यह विकास गरीब और मजदूर का न होकर चमकती सड़कों, मॉल एवं लकदक गाड़ियों के शोर से भरा विकास है। यही देहाती औरत के साथ होता है।
भला हो नवाज शरीफ या जिसका भी, वह उसे विमर्श में तो लेकर आया। केबल टेलीविजन जनमानस पर खूब छा रहा है। और आभासी चमक-दमक के साथ नेता पटल पर जल्दी-जल्दी आते-जाते बोलते जाते हैं। जो भी विज्ञापन की आवाज और उसी की तरह धारदार बोले, उसी का बोलबाला होता है। मोदी ने ऐसे बोलने का बहुत प्रयास किया है और बहुत प्रभावशाली वक्तव्य देते हैं। बीच-बीच में पड़ती तालियां वैसी ही होती हैं, जैसी किसी सीरियल में तलवार जैसी धारदार आवाज। देहाती महिला भी ऐसे ही आती और चली जाती है। देहाती महिला को छोटा और अकर्मण्य मानना बड़ी भूल है। बहुत गर्व होगा, अगर हमारा प्रधानमंत्री ‘देहाती महिला’ जैसे माननीय गुणों वाला एवं सहज, सीधा हो। वैसा ही जीवट भरा हो।
(लेखक गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक हैं।)