एक भाषण का ही तो सवाल है। लाल किले से हो या और कहीं और से, भाषण रहेगा तो भाषण ही। फिर मुल्क में डेमोक्रेसी है और डेमोक्रेसी और कुछ दे न दे, भाषण का अधिकार तो सबको देती ही है। बहिनजी ने आखिर कोई चांद तो मांग नहीं लिया न। लाल किले से एक भाषण का ही तो सवाल है। फिर भी लोग नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं। ऐसी अनुदारता भी किस काम की। लेकिन सवर्ण समाज अपने से निचले तबकों के लिए हमेशा ऐसी ही मानसिकता का परिचय देता आया है।
फिर बहिनजी लाल किले का भाषण कोई सेंत में तो मांग नहीं रहीं। उन्होंने तो अभी से अपने बंदों से कह दिया है कि पब्लिक की सेवा में जुट जाएं और लोकसभा चुनाव में बहिनजी को खूब सीटें दिलवाएं। आखिर तभी तो उन्हें लाल किले से भाषण देने का अवसर मिल पाएगा। लेकिन उनकी इस ईमानदारी की भी लोग आलोचना करने लगे हैं। यह कोई न भूले कि बहिनजी से कम क्षमता और लोकप्रियता वाले लोग भी लाल किले से लंबे-लंबे भाषण दे गए हैं। अपनी सीट जीतने का भी जिनका डौल नहीं था, वे भी। फिर बहिनजी ही क्यों नहीं? उनका और उनकी पार्टी का प्रदर्शन किसी से कम नहीं।
बहिनजी वैसे भी कौन-से अपने शौक के लिए लाल किले से भाषण देना चाहती हैं। वह तो सिर्फ इसलिए लाल किला जाना चाहती हैं कि इससे समाज में एक बेहतर संदेश जाए। पर एक बात समझ में नहीं आई। बहिनजी ने अपने भगतों को बिकाऊ माल न बनने का जो संदेश दिया, उसकी भला क्या जरूरत थी? उन्होंने चेताया है कि दूसरी पार्टियों वाले बाजार में खरीदार बनकर आएंगे, पर वे बिकने से इनकार कर दें। पर क्या यह बाजार का अपमान नहीं होगा! खरीद सकते नहीं हैं और बिकना है नहीं, तो फिर बहुजन बाजार में क्या करेंगे? और जो बाजार में नहीं है, उसका होना भी कोई होना है लल्लू!
जो लोग बहिनजी पर प्रधानमंत्री पद की लालसा का आरोप लगाते हैं, वे नासमझ हैं। बहिनजी ने कम से कम प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का श्रीगणेश तो किया। सुना है कि स्वामी रामदेव ने भी लोकसभा चुनाव के लिए अपना कौपीन मैदान में फेंक दिया है। राहुल भैया अब और नहीं, नहीं नहीं कर सकते। नरेंद्र मोदी की टांग खींचने वाले भी उनका रास्ता नहीं रोक सकते। लोकसभा चुनाव तो जब होगा तब होगा, पर कम से कम प्रधानमंत्री पद का मुकाबला तो अब शुरू हो जाएगा।